सोमवार, 31 अगस्त 2009

यात्रा वृतान्त-पल्चित्रिया के बहाने आदिवासी बलिदान तक:

सड़क मार्ग द्वारा दिनांक 10 जुलाई 2006 को मैं जयपुर से चलकर शाम उदयपुर पहुँचा। दरअसल, राजस्थान के बाँसवाड़ा जिला के मानगढ़ पर्वत पर सन् 1913 में हुए महान् आदिवासी बलिदान-स्थल एवं इर्द-गिर्द के अंचल की यात्रा के दौरान मुझे जानकारी मिली थी कि उदयपुर सीमावर्Ÿाी गुजरात में अवस्थित पालचिŸारिया गाँव में भी मानगढ़ की ही तरह अंग्रेेजी व रियासती फौजों से लड़ते हुए काफी संख्या में आदिवासी शहीद हुए थे। मानगढ़ की यात्रा अगस्त सन् 2001 में की थी। गत पाँच वर्षो से यह प्रबल इच्छा थी कि मैं आदिवासियों के उस बलिदान स्थल की यात्रा करूँ, लोगों से मिलूँ और जो कुछ भी प्रामाणिक व आधिकारिक तथ्य सामने आये, उन्हंे इकट्ठा करूँ। राजकीय सेवा और घर-परिवार की व्यस्तताओं के चलते यात्रारम्भ का संयोग इस तरह अब जाकर बना। सावन के इन दिनों के जैसे पंख लगे हुए थे और मानसून के बादलों के पाँवों में मेंहदी। इस बार भी राजस्थान में यत्र-तत्र हल्की फुहारें पड़ी। मानसून की व्यापक वर्षा का अभी भी इन्तजार ही था। यूँ मुम्बई मे दो बार भीषण बारिष ने जन-जीवन अस्त-व्यस्त किया मगर वहीं से मानसून का वह जोर दोनों ही बार न जाने कहाँ गायब हो गया। उदयपुर की शाम मेरे एक मित्र डी.एस. पालीवाल के साथ गुजरी। हम दोनों ने आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर खूब चर्चा की। डी.एस. काफी अर्से से आदिवासियों में जागृति के लिए प्रतिबद्ध होकर उदयपुर अंचल में कार्य कर रहे हैं। डी.एस से मेरी पहली मुलाकात करीब साढ़े चार साल पहले जयपुर के पिंकसिटी प्रेस क्लब में हुई थी। तब मैंने महसूस किया कि वैचारिक धरातल पर हम दोनों काफी निकट हैं। करीब छः माह बाद उनसे जयपुर में ही दूसरी भेंट हुई तब वे जापान की फुकुई यूनिवर्सिटी में भूगोल के सहायक प्रोफेसर सुकिहारा तोषीहीरो के साथ मिले थे। तोषीहीरो पष्चिमी राजस्थान के भेड़ पालकों पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। इस सन्दर्भ में उनकी प्रमुख रूचि भेड़ पालकों के यायावरी जीवन और दूरदराज के इलाकों में भेड़ों के विचरण तथा इस दरम्यान आने वाली कठिनाईयों मे थी। इस का एक पहलू सरकारी दृष्टिकोण व नीति तथा स्थानीय लोगों द्वारा बाहरी भेड़ों के आवागमन का विरोध भी था। तोशीहीरो और डी.एस. के साथ भेड़ों पर हुई चर्चा के दौरान मैंने भी अपनी ननिहाल के गाँव का अस्सी बरस पुराना एक वाकिया बताया था, जिसे तोशीहीरो ने ध्यानपूर्वक सुना और उसे नोट भी किया। किस्सा कुछ इस तरह था कि मारवाड़ के रेबारी भेड़ों का रेवड़ लेकर उस गाँव से गुजर रहे थे। भेड़ों द्वारा घास एवं कुछ हद तक फसलों को नुकसान पहुँचा दिया। इस पर ग्रामीणों एवं भेड़ पालकों के बीच जमकर लाठियां चली। दोनों ओर से करीब आधा दर्जन आदमी मारे गये और इससे कई गुना घायल हुए। अकाल के दिनों में तो भेड़पालक मध्यप्रदेश के मालवा अंचल और उधर ,उत्तरप्रदेश में गंगा के मैदानों तक चले जाते हैं। पराई भौम में इन भेड़पालकों को कैसे-कैसे खतरे झेलने पड़ते हैं, उक्त घटना का महत्वपूर्ण पक्ष यह था, जिसे तोशीहीरो ने अपने अध्ययन में समाविष्ट करने के लिए आत्मसात् किया। आदिवासियों के परिप्रेक्ष्य में अगर भेड़पालक रेबारियों के जीवन-दर्शन पर तनिक सोचा जाय तो निष्कर्ष निकलेगा कि भेड़पालक अपनी भेड़ों के भरण-पोषण के लिए अपनी जन्म-भूमि से सैंकड़ो- सैंकड़ों कोस दूर जाकर जान जोखिम में डालने का खतरा मोल लेते है और इधर, आदिवासी अपनी भौम को छोड़कर मरे-मारे कहीं भी न जायंे। ये लोग अपने जल-जंगल-जमीन के लिए किसी भी तरह का खतरा उठाने को तैयार रहते हैं। जल और जमीन तो जंगल का ही हिस्सा है इसलिए महत्वपूर्ण तो जंगल ही है और आदिवासी जंगल के एकमात्र हकदार। देर रात तक उदयपुर के सर्किट हाउस में मेरी और डी. एस. की चर्चा का केन्द्रीय विषय ब्रिटिश कालीन आदिवासी संघर्ष रहा। सौ ना-नुकर के बावजूद मैंने आखिर डी. एस. को पालचित्तरिया साथ चलने के लिए राजी कर लिया। अगले दिन सुबह सात बजे के आसपास हम दोनों कार द्वारा उदयपुर से रवाना हो गये। साथ में था, कार टैक्सी चालक ड्राइवर राजू, जो उदयपुर से आगे आदिवासी बेल्ट में पहली बार निकला था। उदयपुर से अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर हमारी कार तेजी से दौड़ रही थी। यह सारा पहाड़ी क्षेत्र है लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग होने की वजह से सड़क काफी हद तक सीधी व सपाट थी। कहीं-कहीं घुमाव भी थे तो वहाँ दुर्घटना से बचने के लिए चेतावनी-पट्ट रोपे हुए थे। इस यात्रा-मार्ग के दोनो तरफ दूर-दूर छोटी-छोटी पहाड़ियां थी। अरावली पर्वत श्रृंखला के ऊँचे पहाड़ इस अंचल में नहीं थे। रास्ते में आये आबादी क्षेत्रों में गेैर आदिवासी जनसंख्या प्रमुख रूप से थी। आदिवासी-जन की बसावट पहाड़ी ढलानों पर एकल झोंपड़ियों के रूप में दिखाई दी। करीब घण्टा भर में हम खेरवाड़ा कस्बे में पहुँच गये। खेरवाड़ा वह जगह है, जहाँ सन् 1841 में अँग्रेजों ने फौजी छावनी स्थापित की थी। उन दिनों विशेष रूप से सन् 1820 और 1830 के दशकों में हुए आदिवासी विद्रोहों की पृष्ठभूमि में विद्रोहों की सम्भावनाओं को देखते हुए वागड़ और मेवाड़ अंचल में ंजगह-जगह इस तरह की फौजी छावनियां स्थापित की गई थी और उनमें आदिवासी युवकों को भर्ती किया जाकर आदिवासी विद्रोहों को दबाने का प्रशिक्षण दिया जाता था। अँग्रेजों और रियासती गठजोड़ी सŸाा की यह वह रणनीति थी, जिसके तहत भाई को भाई के विरूद्ध लड़ाकर उस कौम की ताकत को कमजोर किया जा सके और शोषणकारी सŸाा की यथास्थिति को बरकरार रखा जा सके। ऊबड़-खाबड़ पठारी क्षेत्र में बनी हुई मेवाड़ भील कोर के मुख्यालय परिसर में हमने प्रवेश किया। यहाँ के कमाण्डेंट भंवरसिंह को हमने उदयपुर से पूर्व में फोन पर हमारे कार्यक्रम की सूचना दे दी थी और बीच में यात्रा के दौरान मोबाइल फोन से हम सम्पर्क में थे। कमाण्डेंट भंवरसिंह अपने कार्यालय में हमारा इन्तजार कर रहे थे। इस अंचल में गत 1 जुलाई को अच्छी बरसात हो गई थी और तीन चार दिन से रूक-रूक कर सावनी फुहारें भी पड़ी थी। आज भी सुबह हल्की फुहारें पड़ी, जिससे जमीन गीली हो गई। चारों ओर परिसर में हरी घास और जंगली पौधे उगे हुए थे। शीशम, नीम, जामून, बरगद, इमली, महुआ, आम के दरख्त अपनी सघनता की छवि बिखेरते यहाँ-वहाँ खड़े थे। बिना वक्त गँवाये, ‘चाय-पानी की बाद में देखेंगे’, कहकर हमने छावनी परिसर का राउण्ड लिया। कमाण्डेंट भंवरसिंह व उनके सहयोगी डी.वाई.एस.पी. प्यारेलाल ने हमें कोर की विभिन्न शाखाओं के भवनों को दूर से दिखाया। हम इन भवनों को बड़े गौर से देख रहे थे। सभी भवन ब्रिटिश कालीन निर्माण-शैली से बने हुए थे और अधिकांश छावनी-स्थापना काल के थे। बाद में अर्थात् उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो भी विस्तार हुआ, वह भी शिल्प के उसी तारतम्य में था। पत्थर की पक्की दीवारें , उन पर लकड़ी का जाल और जाल पर कोल्हू की छत। सभी भवनों की छतें तीखे ढलान वाली। आवासीय भवनों के आगे जो बरामदे, या पोर्च थे, उनके खम्भे भी सागोन की लकड़ी के थे। ऐसे ही भवनों के लिए ब्रिटिश काल में यहाँ के जंगलों को काट कर भारी मात्रा में लकड़ी यहाँ इस्तेमाल की गई थी और उस लकड़ी का निर्यात भी इंग्लैण्ड व अन्य देशों में किया गया था। मेवाड़ भील कोर के म्यूजियम में सन् 1892 का बांगड़, भौमट व मेवाड़ क्षेत्र का एक बड़ा मानचित्र दीवार पर टंगा हुआ था। यद्यपि गाँवों के अक्षर बारीक थे लेकिन सम्पूर्ण क्षेत्र की प्राकृतिक, भौगोलिक व राजनैतिक जानकारी उपलब्ध थी। गुजरात की तत्कालीन विजयनगर रियासत दर्शायी हुई थी, जो उदयपुर राज्य का सीमावर्ती क्षेत्र था, मगर पालचित्तरिया कहीं नजर नहीं आ रहा था। बालेटा और कोडियावाड़ा के नाम लिखे हुये थे। कोर के एक हवलदार बंशीलाल ने हमे बताया कि ‘पालचित्तरिया कोडियावाड़ा के निकट है। छोटा गाँव होने की वजह से शायद इस नक्शे में उसका नाम अंकित नहीं हुआ होगा।’ इस म्यूजियम में कोर द्वारा विगत अर्से में जीती हुई विभिन्न खेल-कूद प्रतियोगिताओं की ट्राॅफी रखी हुई थी। पुराने जमाने में पहनी जाने वाली वर्दी के नमूने लटकाये हुये थे। अब तक के बैज एवं मैडलों के नमूने भी सजा-सँवार कर रखे हुए थे। मेवाड़ भील कोर का कलर प्रमुखता से प्रदर्शित किया हुआ था। ब्रिटिश काल में संधारित की जाने वाली ‘परमानेंट आर्डर बुक’ यहाँ उपलब्ध थी। हमने उसे बहुत ध्यान से देखा। सन् 1891 से 1938 तक की कुछ एण्ट्रीज इसमें लिखी हुई थी। लैटिन लिपि में अंगे्रजी भाषा की सुन्दर हस्त-लिखावट, लेकिन पालचित्तरिया के बारे में कोई जिक्र यहाँ नहीं मिला। मैं यह जानता था कि उस घटना में जो आदिवासी हताहत हुए , उनका तो जिक्र नहीं होगा चूँकि घटना के तथ्यों को दबाया गया था लेकिन फौज की तादाद और हथियार-गोला-बारूद की रवानगी और आमद का जिक्र जरूर मिलना चाहिए और अगर यह मिल जाता है तो यह पता लगाना संभव होगा कि कितना असलाह काम में लिया गया। प्रयुक्त गोला-बारूद से हताहतों की संख्या का अनुमान संभव है पर ऐसा कुछ नहीं मिला। डी.वाई.एस.पी. प्यारेलाल ने बताया कि ‘साहब, परमानेंट आॅडर बुक में तो विशेष आदेशों का विवरण होता था , जैसे वर्तमान में डिस्ट्रिक्ट आॅडर बुक डी.ओ.बी. में अंकित किया जाता है ; यथा नियुक्ति, स्थानान्तरण-पदस्थापन, प्रशंसा-पत्र, सजा, निलम्बन, सेवा-च्युति, सेवानिवृति आदि। फोर्स की रवानगी वगैरह तो रूटीन का काम है, जो रोजनामचा आम में अंकित किया जाता होगा।’ ‘‘प्यारेलालजी, आर यू श्योर कि ब्रिटिश काल में रोजनामचा आम संधारित किया जाता था ?’’ ‘‘ऐसा कोई रिकार्ड तो यहां नहीं मिला लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था जरूर रही होगी’’ -प्यारेलालजी ने अत्यंत विश्वास के साथ मेरे सवाल का जवाब दिया, जिसको कमाण्डेंट भंवरंिसंह ने भी यह कहकर समर्थन किया कि- ‘‘सर, जैसे वर्तमान में हमारे यहाँ संधारित किया जाने वाला रोजनामचा-आम स्थायी रिकार्ड नहीं माना जाता और उसे तीन साल बाद नष्ट कर दिया जाता है, वैसे ही पहले भी ऐसी ही व्यवस्था रही होगी अन्यथा छावनी की इतनी लम्बी चैड़ी फौज की दैनिक गतिविधियों का लेखाजोखा कैसे संभव हो पाता होगा।’’ इन दोनों की बात से मैंने भी सहमति जताई चूँकि अंग्रेज प्रशासनिक दृष्टि से अत्यन्त कुशल और नपे-तुले थे इसलिए कोई न कोई ऐसी व्यवस्था जरूर रही होगी। इस दौरान मेरे मित्र डी. एस. मूक दर्शक व श्रोता से बने रहे। इसकी वजह थी कि पुलिस अधिकारी के रूप में फौज या पुलिस की दैनिक गतिविधियों से हम तीनों जितना वाकिफ हो सकते थे, उतने डी.एस. नहीं हो सकते थे। कोर के वर्तमान आधिकारियों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि एम.बी.सी. का इस विषयक कोई दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखागार दिल्ली या राजस्थान अभिलेखागार, बीकानेर में सुरक्षित है या नहीं। मेवाड़ भील कोर परिसर में अधिक वक्त जाया न करते हुए हम वहाँ से आगे के लिए रवाना हो गये। चलते-चलते कमांडेन्ट भँवरसिंह को इतना अवष्य कहा कि ‘‘ वापसी में इधर से ही निकलना होगा और कोई मार्ग तो है नहीं। इसलिए आप और खंगालना। यदि कोई दस्तावेज पालचिŸारिया सम्बन्धी मिल जाये तो कृपया जिरोक्स करा कर रखना। वह मेेरे लिए मूल्यवान होगा।’’ खेरवाड़ा से चले तो आगे रास्ते में एक गाँव आया-सुन्दरा। साथी डी.एस. ने बताया कि - ‘‘मीणा जी, यहाँ हम थोड़ा रूकें। मैं पहले एक बार यहाँ एक आदमी से मिला हूँ। देखता हूँ , वह है या नहीं।’’ ‘‘क्या उसे पालचिŸारिया के बारें में कोई जानकारी है ? ’’मैंने तुरंत उत्सुकता जाहिर की। ‘‘हाँ, मैं अभी देखकर आता हूँ।’’ डी.एस.पालीवाल कार के रूकते ही नीचे उतरे और बाईं तरफ बने एक पक्के घर की ओर चल दिये। मैं भी उनके पीछे था। घूप में काफी तेजी आ गई थी। दूर आसमान में कहीं-कहीं मानसूनी बादल थे मगर घटानुमा नहीं थे। हवा में नमी थी मगर फिलहाल बारिष की संभावना नजर नहीं आ रही थी। सुन्दरा गाँव का आसमान साफ था। ड्राइवर राजू ने हमारे उतरने के साथ ही कार नीम के वृक्ष की छाँह में खड़ी कर दी। ‘‘प्रधान जी कहाँ हैं ?’’-डी.एस. ने एक लड़के से पूछा। ‘‘अभी तो यहीं थे , शायद घर में हो।’’ ‘‘बेटा, जा के बुला के लाना। कहना, उदयपुर से कोई जानकार आये हैं ’’- डी.एस. ने बागड़ी बोली में उस लड़के से कहा। चेहरे पर अपनत्व का सा भाव लिए वह युवक पक्के मकान में घुसा और थोड़ी देर में पेंट-षर्ट पहने सांवले रंग के एक अधेड़ व्यक्ति के साथ बाहर निकला। ‘‘अरे नवीन भाई, आप मिल गये अच्छा हुआ। मुझे पहचाना ? ’’-उस व्यक्ति ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । ‘‘मैं डी.एस. पालीवाल। उदयपुर से आया हँू। दो साल पहले आपके गाँव यहाँ आया था। तब आप प्रधान थे। आदिवासियों के अधिकारों के बारे में हमने यहां एक मीटिंग ली थी। तभी आपसे मैं मिला था। ’’ ‘‘हाँ, हाँ, पहचान गया। कैसे हो आप। अरे पालीवाल जी, अब पहचान गया। वो खेरवाड़ा की टीचर........... ,क्या नाम था उसका ? हाँ ,शारदा डामोर। वो हमारी रिष्तेदार है। वह भी साथ आयी थी ना ? ’’ ‘‘अच्छा सुनों , हम जल्दी में हैं। यह मेरे मित्र है, हरिराम जी। वैसे पुलिस में एस.पी. है लेकिन आदिवासियों पर खूब काम कर रहे हैं। हम पालचिŸारिया जा रहे हैं। आप हमारे साथ चलोगे ना’’ -इस दरम्यान मैंने हाथ जोड़ कर नवीन भाई को जोहार कहते हुए अभिवादन किया, जिसका उन्होंने हाथ मिलाकर जवाब दिया। लेकिन पालचिŸारिया का नाम सुन कर उनके चेहरे पर लज्जा के भाव उभर आये और जैसे ही डी. एस. ने उन्हें पालचिŸारिया चलने का आग्रह किया, उस क्षण तो वे एकदम झिझके। उनकी असहजता स्पष्ट दिख रही थी। नवीन भाई हमें मकान के बाहरी कमरे में ले गये, जहाँ एक महिला एवं दो व्यक्ति बैंठे बातें कर रहे थे। वह कमरा दफ्तरनुमा लग रहा था -एक टेबल, एक मुख्य कुर्सी और टेबल के दूसरी तरफ चार-पाँच साधारण कुर्सियां रखी हुई थी। ‘ये देखो उदयपुर से पालीवाल जी आये है और साथ में मीणा जी हैं। ये एस.पी. हैं,’’-नवीन भाई ने उस महिला से कहा और हमंे बताया कि ‘‘यह मेरी पत्नी इन्दिरा है। इस गाँव की सरपँच है। मैं तो अब पंचायत समिति का सदस्य हूँ। प्रधानी इस बार नहीं मिली।’’ परस्पर अभिवादन के पश्चात् नवीन भाई की धर्मपत्नी ने वहाँ मौजूद एक व्यक्ति को इषारा किया। वह थोड़ी देर में कोल्ड ड्रिंक की चार-पाँच बोतलें ले आया। बोतलों के ढ़क्कन खुलवाकर लाया था। ‘‘भई , मैं तो ठण्डा पीता नहीं। मेरा गला खराब हो जाता है। ’’-पेय पदार्थ मेरे सामने रखा जाये या मुझे सौंपा जाय, इससे पूर्व ही मैंने अपना मन्तव्य प्रकट कर दिया। ‘‘तो फिर आपके लिए चाय मंगवाई जाय ’’ -नवीन भाई ने आग्रह किया जिसे मैंने यह कहकर टाल दिया कि मैं चाय सिर्फ एक बार पीता हूँ , सुबह-सुबह। आप कुछ भी मत मंगाइये।’’ ‘‘तो आप चलेंगे ना हमारे साथ ’’ -डी.एस. ने नवीन भाई से फिर पूछा। ‘‘इन्दिरा! देखो ये मुझे पालचिŸारिया ले जाना चाहते हैं।’’ इन्दिरा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करती, इससे पूर्व नवीन भाई ने डी.एस. की ओर देखकर कहा कि -‘‘आप तो सारा किस्सा जानते हो। मेरा वहाँ जाना कतई ठीक नहीं। हाँ, वहाँ मेरे कुटुम्बी चाचा हैं। उनका नाम कावा जी है। वे वहाँ के सरपंच हैं । आपको सारी बातें वे बता देंगे।’’ ‘‘ हाँ, मै समझ गया ’’ -डी.एस. ने सहज भाव से नवीन भाई की बात को मानते हुए सहमति जतायी। मैं इस रहस्य को नहीं समझ पा रहा था। ‘‘तो फिर ऐसा करो नवीन भाई कि हमें हूरजी की कब्र दिखा दो’’ -डी.एस. ने प्रस्ताव रखा। इन्दिरा से विदा लेकर हम वहाँ से चल दिये। नवीन भाई मोटर साइकिल पर सवार होकर हमारे आगे आगे चले। करीब आधा कि.मी. दूर सड़क के किनारे वे रूके। हमने भी गाड़ी रोकी। पैदल-पैदल सड़क के दाहिनी और एक टेकरी पर नवीन भाई हमें ले गये। वहाँ छः फुट बाई छः फुट के आकार और करीब दो फुट ऊँचा एक चबूतरा था। चबूतरे के मध्य में सीमेंट से पावों का जोड़ा बना हुआ था। ‘‘क्या यहीं हूर जी की कब्र है ? ’’ ‘‘हाँ, यहीं उन्हें दफनाया गया था। ’’ -नवीन भाई ने डी.एस की जिज्ञासा शांत की। हमने चारों ओर से कब्र पर बने उस चबूतरे को गौर से देखा। हम तलाष रहे थे, क्या कहीं उस चबूतरें पर कुछ लिखा है या नहीं। हमें ऐसा कुछ नहीं मिला। नवीन भाई भी हमारी ही तरह चबूतरे को इस दृष्टि से देख रहे थे, जैसे उन्होंने इस कोण से कब्र के चबूतरे को पहली बार देखा हो। नवीन भाई से विदा लेकर हम सुन्दरा गाँव से आगे चल पड़े। क्रमशः शेष अगले पोस्ट पर.....

सोमवार, 17 अगस्त 2009

साहित्यिक परिचय-थोड़ा विस्तार

मेरा जन्म एक मई सन् 1952 राजस्थान के सवाई माधोपुर जिला के बामनवास ग्राम के एक साधारण किसान आदिवासी परिवार में हुआ। मैंने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव एवं निकटवर्ती कस्बा गंगापुर सिटी में प्राप्त की। तत्पश्चात राजस्थान कालेज एवं राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से क्रमशः स्नातक एवं स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की। स्नातक के विषय हिन्दी, इतिहास एवं नागरिक शास्त्र रहे और स्नातकोत्तर डिग्री राजनीति विज्ञान से प्राप्त की। संप्रति पुलिस विभाग में उप महानिरीक्षक के पद पर हूं। आरम्भ से ही लिखने पढने में रूचि रही। विशेष रूप में भारतीय दर्शन, परम्परा, साहित्य, संस्कृति व लोक से सम्बन्धित विशेष अध्ययन किया। गत कुछ अर्सा से आदिवासी जीवन के विभिन्न पक्षो एवं लोक गीतों पर शोध कर जानकारी जुटाने एवं चिंतन करने में रूचि ले रहा हूं। पर्यावरण चेतना, नशा मुक्ति एवं मानवाधिकार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी मैंने कार्य किया है। वन्य जीव संरक्षण के लिए मुझे वर्ष 1999 में पदम् श्री साँखला अवार्ड नेचर क्लब आफ इंडिया द्वारा प्रदान किया गया। मेरा पहला कविता संग्रह वर्ष 1999 में जगतराम एण्ड संस दिल्ली से ‘‘हाँ चाँद मेरा है’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ जिसकी समस्त कविताएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में पूर्व में ही छप चुकी थी और इन रचनाओं ने मुझे कवि के रूप में पहचान दिलाई। इसी पुस्तक पर मुझे राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च मीरा पुरस्कार वर्ष 2003 में प्रदान किया गया। इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण भी आया। मैंने अण्डमान के जारवा एवं सेन्टेनेली आदिवासियों पर अध्ययन किया जो मेरी यात्रा वृतान्त की पुस्तक ‘साईबर सिटी से नंगे आदिवासियों तक’ में प्रकाशित है। यह पुस्तक वर्ष 2001 में शिल्पायन प्रकाशन ,दिल्ली से प्रकाशित हुई है। मैंने भारतीय मिथकों पर भी कार्य किया है। इसी क्रम में कालिदास की ख्यातिप्राप्त कृति ‘मेघदूत’ के मिथकों को आधुनिक संदर्भ में पुर्नव्याख्यायित करते हुए मैंने चर्चित प्रबन्ध काव्य ‘रोया नहीं था यक्ष’ लिखा जिसे जगतराम एण्ड संस, दिल्ली ने छापा। वर्ष 2008 में इस कृति का दूसरा संस्करण भी आया है और साथ ही पेपर बेक में भी इसे प्रकाशित किया गया है। वर्ष 2000 से 2006 के मध्य यत्र-तत्र प्रकाशित कविताओं का दूसरा संकलन शिल्पायन से वर्ष 2006 में ‘सुबह के इंतजार में’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। ब्रिटिश कालीन आदिवासी संघर्षों पर मैंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। मध्य भारत के राजस्थान एवं गुजरात की जलियांवाला जैसी तीन घटनाओं पर शोध किया है। इस शोध को मैंने यात्रा वृत्तान्तिक विधा में लिपिबद्ध किया जो वर्ष 2008 में ‘जंगल जंगल जलियांवाला’ शीर्षक से शिल्पायन दिल्ली ने छापा है। यह पुस्तक भी एक चर्चित कृति के रूप में सामने आयी है। इस पुस्तक में वर्णित घटनाएँ 1913 एवं 1922 की हैं जिनमें ब्रिटिश व सामंती फौजों से लोहा लेते हुए करीब साढे तीन हजार आदिवासी शहीद हुए। आदिवासी संघर्ष और बलिदान की उपरोक्त घटनाओं में से जिला बांसवाड़ा (राजस्थान) के मानगढ पर्वत पर 17 नवम्बर सन् 1913 के दिन घटी घटना पर आधारित मेरा महत्वपूर्ण उपन्यास साहित्य उपक्रम (करनाल-दिल्ली) से 2008 में प्रकाशित हुआ है जो हार्ड कवर व पेपर बेक दोनों में छपा है। पौने चार सौ पृष्ठों के ‘धूणी तपे तीर’ शीर्षक से यह उपन्यास छपा। यह कृति चर्चा का विषय बनी हुई है जो आदिवासी शोषण, संघर्ष व बलिदान के साथ साथ आदिवासी जीवन एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को भी आधिकारिक व रोचकता के साथ प्रस्तुत करती है। लेखन के साथ मैंने संपादकीय कर्म में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आदिवासी केन्द्रित पत्रिका ‘अरावली उद्घोष’ का सह सम्पादन एवं ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘दस्तक’ एवं ‘अकार’ के आदिवासी विशेषाकों के सम्पादन में भी मैंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मेरी रचनाएँ यथा कविताएँ, कहानियां, यात्रा वृत्त, चिन्तनपरक लेख, साक्षात्कार, उपन्यास अंश आदि विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, पहल, हंस, कथादेष, वागर्थ, समकालीन भारतीय साहित्य, इन्द्रप्रस्थ भारती, कथन, वर्तमान साहित्य, समकालीन सृजन तथा दूरदर्शन व आकाशवाणी आदि के माध्यम से प्रकाशित एवं प्रसारित होते रहे हैं। ऐसे ही जन संचार माध्यमों से उनकी पुस्तकों की समीक्षाएँ प्रकाशित व प्रसारित होती रही हैं। सातवें विश्‍व हिन्दी सम्मेलन (सूरीनाम) में मैंने राजस्थान राज्य के लेखकों के आठ सदस्यीय दल के सदस्य के रूप में शिरकत की और अपनी भागीदारी दर्ज कराई। विश्व के प्रतिष्ठित ‘जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल’ (विरासत फाउण्डेशन) जनवरी 21-25, सन् 2009 में मेरे को सम्मान के साथ बुलाया। मैं हिन्दी भाषा के मात्र छः साहित्यकारों में से एक था। ‘ धूणी तपे तीर ’ उपन्यास के अंष मैंने निर्धारित सत्र में पढे। इस फेस्टीवल का मंच स्वयं में प्रतिष्ठा की बात थी जहाँ अंग्रेजी के अलावा विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर चर्चा हुई। दिनांक 27 से 31 जनवरी तक, सन् 2009 में अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी हिन्दी विश्व विद्यालय, वर्धा में ‘हिन्दी समय’ कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें मैंने सक्रिय भागीदारी निभायी। इससे पूर्व केन्द्रीय साहित्य अकादमी के तत्वावधान में दिल्ली (2001) एवं रांची (2003) में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक सम्मेलनों में भी मैंने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। दलित चेतना के क्षेत्र में कार्य करने के लिए श्री मीणा को वर्ष 2000 में डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय अवार्ड मिल चुका है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का अत्यन्त प्रतिष्ठित ‘महापंडित राहुल सांकृत्यान पुरस्कार - वर्ष 2007’ मुझे उनके खोजी साहित्य एवं हिन्दी भाषा को अवदान के लिए हाल ही दिनांक 16.02.2009 को राष्ट्रपति भवन में दिया गया है। हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधावों के माध्यम से निरन्तर हस्तक्षेप करते रहने पर मेरी कृतियां एवं अन्य रचनाएँ एक अनूठे पक्ष, तासीर व पठनीयता के साथ आपके सामने आती रही हैं। हरीराम मीणा 31, शिवशक्ति नगर, किंग्स रोड़,अजमेर हाई-वे, जयपुर,302019

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

मेरे द्वारा आदिवासी संघर्ष पर लिखे गए उपन्यास ’धूणी तपे तीर’ की भूमिका

यह बात है आज से कोई पन्द्रह बरस पहले की। पथिक बाबा (वी.पी.वर्मा) के द्वारा संपादित आदिवासी पत्रिका ‘अरावली उद्घोष’ में मैंने मानगढ पर हुए आदिवासी बलिदान के बारे में पढ़ा और मैं दंग रह गया कि राजस्थान का वासी होने के बावजूद मुझे ऐसी घटना की जानकारी नहीं थी। जानकारी होती भी कहाँ से? मैं दक्षिणी राजस्थान के उस अँचल में इससे पहले कभी गया नहीं न वहां के किसी परिचित व्यक्ति ने मुझे ऐसी किसी घटना के बारे में बताया और न ही कहीं इतिहास की पुस्तकों में मैंने ऐसी शहादत के बारे में पढ़ा। बाद में उदयपुर कई बार जाना हुआ। जब भी वहाँ जाता पथिक बाबा से अवष्य मिलने का प्रयास करता। ऐसे अवसरों के दौरान आंचलिक बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एन.जी.ओज से जुड़े कार्यकर्ताओं व जागरूक आदिवासियों से मिलता। मानगढ़-बलिदान के विषय में प्रमुखता से बातचीत करता। कुछ सूचना एवं संदर्भ एकत्रित करने का प्रयास करता रहा। इतिहास के स्तरीय अध्ययन से कभी जुड़ा नहीं और न ही शोधार्थी रहा। पुलिस-कर्म से सम्बन्ध रखते हुए एक खोजी दृष्टि अवष्य विकसित हुई। अतः घटना की पुष्टि में प्रमाण जुटाता गया। व्यस्तताएं अपनी जगह थी, प्रष्न था प्राथमिकताओं का, जो तय कर ली और अंतत 2001 में जयपुर से मानगढ़ तक का सफर पूरा किया। घटना के बारे में इतनी सामग्री, संदर्भ व सूचनाएं एकत्रित हो चुकी थी कि अब कुछ लिखा जा सकता था। और लिखा ‘मानगढ़ - आदिवासी बलिदान के तहखानों तक’ यात्रा वृत्तांत जिसे ‘पहल’-71 (2002) में ज्ञानरंजन जी ने मन से छापा। मुझे सुखद अनुभूति हुई। मानगढ़ की वह घटना इधर-उधर चर्चा में आयी। मैं पढता रहा अन्य के साथ ब्रह्मदेव शर्मा, कुमार सुरेश सिंह, रामशरण जोशी और महाश्वेता जी को। ‘जंगल के दावेदार‘ - नायक बिरसा मुण्डा। टक्कर के ही थे झाबुआ का टंट्या मामा, गुजरात का जोरजी भगत (दोनों को 1880 के दशक में अंग्रेजों ने फांसी दी) और मानगढ-बलिदान का नायक गोविन्द गुरू। आदिवासी दुनिया का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानव की उत्पत्ति का। उनके नैसर्गिक व शांत जीवन में पहला त्रासद हस्तक्षेप हुआ आर्य-अनार्य संघर्ष-श्रंृखला के युग में जब उन्हें मैदानी क्षेत्रों से विस्थापित होकर जंगलों की शरण लेनी पड़ी। वे जंगल पर आधारित जीवन को सहज रूप में जीना सीख गये। घर व परिवार की संस्था के बावजूद व्यक्ति व निजी सम्पति की अवधारणा उन अर्थो में विकसित नहीं हुई जिन अर्थो में इसे समझा जाता है। समाज संस्कृति सामूहिकता पर आधारित रहती आयी। विशेष रूप से दसवीं से बारहवीं और पश्चातवत्र्ती कालखण्ड में फिर उथल-पुथल हुई और तत्कालीन राजस्थान के आदिवासियों की स्वायत्तता को बाहर से आये राजपूतों ने छीन लिया। विजेता कौमें हारी हुई मानवता को हेयद्ष्टि से देखती रही है। यही यहाँ हुआ। इसके बावजूद समाज व संस्कृति के स्तर पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ सका । जिस मात्रा में स्वतंत्रता छिनती है उसी मात्रा में शोषण व विपन्नता पैर फैलाती है। राज की बेगार, महाजनी सूदखोरी व मनुष्य के स्तर पर दोयम दर्जा सौगात में मिले, फिर भी जंगल से बेदखली की नौबत नहीं आयी। फिर आयी ईस्ट इंडिया कम्पनी। राजपूताना कहे जाने वाले अंचल के दक्षिणी भू-भाग की बड़ी रियासत मेवाड़ की राजधानी उदयपुर में सन् 1818 में कुपदार्पण हुआ कम्पनी सरकार के प्रतिनिधि कर्नल जेम्स टाॅड का। उसकी रणनीति के तहत दक्षिण राजपूताना की प्रमुख रियासत मेवाड़ सहित वागड़ अंचल की डूगंरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, कुशलगढ व सीमावर्ती गुजरात की संतरामपुर व ईडर रियासतों के साथ सन्धियां की गयी जिनके प्रमुख प्रावधान थे वनोपज पर अधिकार, खनिज सम्पदा का दोहन और इसके बदले सम्भावित आदिवासी विद्रोहों को कुचलने के लिए सैन्य बल। टाॅड के उत्तराधिकारियों का सिलसिला जारी रहा और रियासती व्यवस्था मंे कम्पनी का हस्तक्षेप भी। स्वाभाविक था कि आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड़ते। सन् 1820 के दशक में विद्रोह आरंभ हो गये और यह क्रम चलता रहा । विद्रोह से निपटने के लिए कम्पनी व रियासत की फौजें असफल रहीं। विकल्प तलाशा गया कि आदिवासियों को नियन्त्रित करने के लिए उसी समाज के युवकों की फौजें तैयार की जावे। सन् 1840 के दशक में खैरवाड़ा, कोटड़ा, एरिनपुरा, देवली, नीमच आदि स्थलों पर छावनियों की स्थापना की गई। आदिवासी सैनिक और नियन्त्रक अधिकारी दूसरे तथा कमाण्डेंट कम्पनी के अंग्रेज अधिकारी । फिर भी विद्रोह नहीं थमें। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी भी पीछे नहीं रहे।उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, कुषलगढ़ रियासती क्षेत्रों में भीलों की बहुलता और दूसरी बड़ी संख्या मीणा आदिवासियों की। प्रतापगढ़ रियासत मंें मुख्यतः मीणा आदिवासियों की आबादी। मानगढ़ के चारों ओर पसरा यह अंचल राजपूताना का दक्षिणाांचल था और इस दक्षिणाांचल की पूर्वी दिषा में सीमावर्ती रतलाम, सैलाना व झाबुआ रियासतें तथा पष्चिम में झालोद, सूँथ व ईडर की रियासतें। यह सारा अंचल आदिवासियों से आबाद था। लेकिन इस सारे भू-क्षेत्र के षासक गैर आदिवासी अर्थात् राजपूतों के विभिन्न वंषों के महाराणा, महाराजा, महारावल, जागीरदार, ठिकानेदार, भौमिया व उनके अधीन कार्यरत हाकिम-हुक्मरान थे और इन सब के ऊपर ब्रिटिष सत्ता थी, जिनके पोलिटिकल एजेण्ट, विभिन्न फौजी छावनियों के कमाण्डेंट, रेजीडेंट और अन्य अफसर ब्रिटिष क्राउन के प्रमुख प्रतिनिधि गवर्नर जनरल व वायसराय के अधीन रहकर रियासतों के सारे निर्णय लेते थे। राजा-महाराजा अंग्रेज हुकूमत की कठपुतली थे। कर्नल टाॅड के जमाने की ईस्ट इण्डिया कम्पनी और रियासतों के मध्य हुईं सन्धियों के सिलसिले से लेकर सन् 1857 के संग्राम के बाद भारत पर ब्रिटिष राज की सीधी दखलन्दाजी तक की प्रक्रिया में ये हालात पैदा हुए थे। रियासती सत्ता द्वारा किए जाने वाले अत्याचार, ब्रिटिष राज का हस्तक्षेप और शोषण-दलन-दमन और अभाव -भुखमरी-महामारी के अघाये-सताये और अनेकानेक आषंकाओं, अनिष्चयों, अविष्वासों से घिरे हुए भयभीत आदिवासी। 19वीं सदी के अंतिम चरण में जो कुछ बुरी घटनाएँ घटित हुईं, सत्ता के स्तर पर जो कुछ राजनीतिक परिवर्तन हुए, ब्रिटिष-षोषण के जो नये-नये तौर तरीके और रणनीतिक दाँव पेंच अपनाये गये और इन सबके विरूद्ध नाना प्रकार के दुःख-दर्दों को झेलते रहने के साथ-साथ हालात के विरूद्ध विद्रोह की जो आग अंचल के आदिवासियों के भीतर सुलगती रही- इस सबको मूक साक्षी मानगढ़ ने अपनी अदृष्य आँखों से देखा। मानगढ़ पर धूणी जमाये संपसभा के आदिवासी नायक और प्रमुख नायक गोविंद गुरू इस सारे माहौल से वाकिफ थे। आदिवासियों के दुःख-दर्दों का उनको प्रत्यक्ष अनुभव था। ब्रिटिष सत्ता के गलियारों और देषी रियासतों के दरबारों के आसपास काफी आदिवासी लोग थे। वे ब्रिटिष फौजी छावनियों में फौजियों के रूप में भर्तीषुदा थे। छावनियों के अफसर-मैसांे में लाँगरी व अर्दलियों के रूप में थे। रियासती दरबारों में आदिवासी लोग सेवादारों के रूप में थे। आदिवासियों के समूह के समूह दुर्गोंे, महलों, बगीचों और अन्य निर्माण-कार्यों में बेगार करने के लिए जबरन ले जाये जाते थे। अंग्रेजों और रियासती शासकांे द्वारा आदिवासियों के विरूद्ध क्या नीतियां बनायी जाती थी और क्या-क्या निर्णय लिए जाते थे - यह सब बातें उन सेवकों और बेगारियों तक छन छन कर आ ही जाती थी। अंग्रेज चालाक, धूर्त, ठग और स्वार्थी थे। साथ ही वे षिक्षित, बुद्धिमान और दूरगामी सोच रखने वाले थे। अधिकांश देसी रियासती सत्ताधीष और उनके नुमाइंदे अत्याचारी, अय्याष और अहंकारी थे। ब्रिटिष अधिकारियों से निकटता को परम सम्मान मानते थे। खास तौर पर आयोजित दावतों के दौरान उनमें से कुछ शराब के नषे में डींग मारने लगते थे। सेवकों के सामने गोपनीय बातों को बक देते थे। उन्हें यह होष नहीं रहता था कि किस के सामने या किस की उपस्थिति में क्या बात कहनी चाहिए और क्या नहीं। कुछ राजा-महाराजा चाहे गम्भीर हों, लेकिन जागीरदार तो अक्सर ऐसा कर ही देते थे। उनमें दम्भ और शेखी बघारने की प्रवृत्ति अधिक दिखायी देती थी। अंग्रेज अफसरों की सोच वैज्ञानिक, विवेक व तर्क सम्मत और आधुनिक थी जबकि देसी राजा-महाराजाओं एवं जागीरदारों का दृष्टिकोण सामंती परम्पराओं में जकड़ा हुआ रहता था। छावनियों के आदिवासी फौजी, अर्दली, सईस और रियासती आदिवासी सेवक एवं बेगारी चाहे अनपढ़ थे, मगर जीवन का क्रूर यथार्थ और व्यापक अनुभव उनके पास था। वे अगले के चेहरे के भावों को भाँप सकने की क्षमता रखते थे। फिरंगी हुक्मरानों और राजा-महाराजाओं के बीच होने वाली वार्ता सफल हुई या असफल- यह उनके आसपास सेवा कार्य में लगे रहने वाले आदिवासी-जन उनकी मुख-मुद्राओं को पढ़कर जान जाते थे। ब्रिटिष सत्ता-केंद्रों और रियासती दरबारों से निकली बातें मानगढ़ तक पहँुचती थी और मानगढ से संपसभा के कार्यकर्ताओं के माध्यम से दूर-दराज के आदिवासी अंचलों तक। यह प्रक्रिया लंबी, धीमी और बात के असल रूप को थोड़ा बहुत तोड़ने-मरोड़ने वाली अवष्य थी, लेकिन बात का अर्थ काफी कुछ बचा रहता था। यह सब गोविंद गुरू, संपसभा के अन्य नायकों व कार्यकत्र्ताओं और समूची आदिवासी कौम के लिए अत्याचारों के विरूद्ध जागृति व संघर्ष की भावी रणनीति बनाने के लिए काफी सार्थक और अनिवार्य था। तो इसी तरह गोविंद गुरू व साथियों को यह पता चला कि बांसवाड़ा के महारावल लक्षमणसिंह द्वारा अंग्रेज सरकार का खिराज समय पर नहीं दिया जाता है। ब्रिटिष सरकार ने राज्य को ऋण ग्रस्त तथा चढ़ा हुआ खिराज चुकाने में असमर्थ और दुर्भिक्ष पीड़ित देखा। तब शासन सम्बन्धी अधिकार महारावल से लेकर सहायक पोलिटिकल ऐजेंट के सुपुर्द कर दिए। एजेंट की सहायता के लिए पाँच सदस्यों की एक कौंसिल का गठन कर दिया गया। इसका महारावल ने विरोध करना चाहा लेकिन उसमें साहस की कमी थी और उसके सलाहकार भी ढीले-ढाले थे। दूसरे, वह लार्ड कर्जन के गवर्नर जनरल व वायसराय होने का समय था। उस काल में देसी रियासतों में ब्रिटिष हस्तक्षेप काफी बढ़ता जा रहा था। कौंसिल के शासनकाल में बांसवाड़ा राज्य की अर्थ व्यवस्था में काफी परिवर्तन किए गये। बजट बनाने की प्रणाली का आरम्भ किया गया ताकि आय-व्यय का व्यवस्थित लेखा-जोखा तैयार किया जा सके। कहाँ कमी है, उसे ठीक किया जा सके। पुलिस महकमें का पुनर्गठन किया गया। आदिवासी विद्रोहों को नियन्त्रित करने और विद्रोहियों को पकड़ने के लिए महत्वपूर्ण स्थलों पर पुलिस की चैकियां स्थापित की गयी। खुफिया तंत्र को मजबूत करने के प्रयास किए गये। न्याय-प्रषासन में भी काफी फेरबदल किया गया। नये साक्ष्य अधिनियम, दण्ड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दण्ड संहिता के कुछ प्रावधानों के आधार पर रियासती विधि-व्यवस्था में संषोधन किए गये। सायर की शुल्क दरों को नियत किया गया। किसानों से पैदा हुई फसल के हिस्से को राजकोष में लेने की प्रणाली को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर जमीन की पैमाइष के द्वारा पैदावार के अनुसार सावधिक ठेका प्रथा की शुरूआत की गयी। पुलिस व वसूली के काम के लिए अलग-अलग हाकिम नियुक्त किए गये। जंगलात का नया महकमा खोला गया। स्वास्थ्य व सफाई के लिए राज्य की राजधानी में म्यूनिसिपल कमेटी का गठन किया गया। सारे राज्य में सालिमषाही सिक्के के प्रचलन को बंद कर उसकी जगह कलदार सिक्के का प्रचलन आरम्भ किया गया। प्रभु-वर्ग के बच्चों को षिक्षित करने के लिए स्कूलों की व्यवस्था शुरू की गयी। सम्प्रेषण-सुविधाएँ बढ़ाने के लिए डाक व तार के माध्यम को अपनाया गया। अंग्रेजों ने बांसवाड़ा राज की अंगुली पकड़ते-पकड़ते कलाई को पकड़ा था। कुछ अर्सा पूर्व महारावल लक्ष्मणंिसंह और कुषलगढ़ के राव के मध्य तनातनी पैदा हो गयी थी। राजा के रूप में महारावल लक्ष्मणंिसंह की कमजोरियों के चलते कुषलगढ़ के राव ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और महारावल के आदेषों को मानने से इन्कार कर दिया था। ब्रिटिष सरकार की दखल से कुषलगढ़ के राव और महारावल बांसवाड़ा के बीच समझौता हुआ। बांसवाड़ा को कमजोर बनाने के लिए अंग्रेजों ने समझौते मंे तय करवाया कि भविष्य में कुषलगढ के आंतरिक मामलों में महारावल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। व्यापार-शुल्क व खिराज सम्बन्धी मामले भी दोनों रियासतों के स्वतंत्र मान लिए गये। यूं कर महारावल बांसवाड़ा के अधिकारों में कटौती प्रारम्भ हुई और ब्रिटिष पोलिटिकल एजेंट की सर्वोच्चता स्थापित होती गयी। पहले बांसवाड़ा रियासत के मामलों को मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट देखता था। बाद में पृथक से सहायक पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा के लिए हो गया। वही कुषलगढ का नियन्त्रक बन गया। राजपूताना के अन्य राज्यों की तरह बांसवाड़ा रियासत के क्षेत्र में भी अधिकांष भूमि पर जागीरदारों का कब्जा था। खालसा क्षेत्र की भूमि बहुत कम थी। महारावल लक्ष्मणसिंह और ठिकानेदारों के बीच अक्सर विवाद पैदा होते रहते थे। सन् 1871 में गुढा के जागीरदार हिम्मतंिसंह और गढी के ठाकुर का महारावल से विवाद हो गया। इसी दौरान औरीवाड़ा के ठिकाने से मतभेद पैदा हो गया। अंग्रेज अधिकारियों ने पहले तो विवादों को बढ़ावा देने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई और अंत में सहायक पोलिटिकल एजेंट की दखल से विवादों का निबटारा करवाया ताकि उनकी पंचायती चलती रहे। दल्ला रावत सोदलपुर इलाके के भीलों का मुखिया था। उसने महारावल के विरूद्ध बगावत कर दी। यह विवाद बोलाई व रखवाली करों को लेकर हुआ था। सहायक पोलिटिकल एजेंट के हस्तक्षेप से ही इस विवाद का निबटारा हुआ। इसी क्रम में बांसवाड़ा राज्य और निकटवर्ती डूंगरपुर , उदयपुर , प्रतापगढ़, रतलाम, सैलाना, झाबुआ, झालौद और सूँथ रियासतों के बीच सीमा विवाद चलते रहते थे। इन विवादों का निबटारा भी अंग्रेजों की दखल से होने लगा। प्रतापगढ़ रियासत मंे अधिकांष जनसंख्या मीणा व उसके बाद भील आदिवासियों की थी। उन्नीसवीं व बीसवीं सदियों के संधिकाल से पूर्व प्रतापगढ का शासक महारावल उदयंिसंह था जो अय्याष किस्म का व्यक्ति था। ब्रिटिष सरकार ने मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट के माध्यम से रियासती मामलों में दखल देना आरम्भ कर दिया था। महारावल के व्यक्तित्व की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए यह दखलंदाजी और बढ़ती गयी। प्रतापगढ़ व बांसवाड़ा के बीच होने वाले सीमा विवादों को ब्रिटिष अधिकारियों की मध्यस्थता से सुलझाया जाने लगा। ब्रिटिष अधिकारियों के हस्तक्षेप की वजह से प्रतापगढ़ राज्य में जनगणना, स्वास्थ्य केन्द्र , पाठषाला, स्टाम्प, कोर्ट-फीस आदि की व्यवस्था आरम्भ की गयी। पुलिस व सेना का पुनर्गठन किया गया। बांसवाड़ा की तर्ज पर आपराधिक कानूनों में संषोधन किया गया। सन् 1890 के दषक में बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणंिसंह और प्रतापगढ़ के महारावल रघुनाथंिसंह के मध्य सीमावर्ती धार्मिक स्थल सीतामाता को लेकर विवाद पैदा हो गया था। ब्रिटिष अधिकारियों ने हस्तक्षेप कर इस विवाद को निबटाया। बांसवाड़ा राज्य से कुषलगढ़ निकल जाने के बाद बांसवाड़ा छोटी रियासत बन गयी थी। अब प्रतापगढ़ उसके टक्कर की रियासत थी। सीतामाता स्थान को सहायक पोलिटिकल एजेंट ने प्रतापगढ राज्य को दिलवा दिया। इस निर्णय से दोनों राज्यों मंे भीतर ही भीतर अनबन आरम्भ हो गयी। इस अनबन का अंग्रेजों ने खूब फायदा उठाया। ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का यह एक उदाहरण था। ब्रिटिष अधिकारियों की दखल से मथुरा निवासी पं. मोहनलाल पंड्या को प्रतापगढ़ रियासत का कामदार और अजमेर के रायबहादुर सेठ सौभागमल डढ्ढा को खजांची नियुक्त कर दिया। इन नियुक्तियों का महारावल रघुनाथ ंिसंह विरोध नहीं कर सका। प्रतापगढ मंे अन्य कार्याे के साथ साथ म्यूनिसिपल कमेटी की स्थापना की गयी। पूरी रियासत मंे सायर शुल्क की एक सी प्रणाली लागू की गयी। प्रषासनिक सुविधा की दृष्टि से राज्य को पाँच जिलांे मंे विभाजित किया गया। ठिकानेदारांे को कुछ सीमा तक फोैजदारी व दीवानी अधिकार दिये गये। खालसा गाँवांे की पैमाइष और भूमि-कर की व्यवस्था करवायी गयी। ‘एक निगरानी ’सिद्धांत के आधार पर प्रतापगढ राज्य मंे डाक व तार की व्यवस्था आरम्भ कर दी गयी। सालिमषाही सिक्के के स्थान पर कलदार सिक्का चालू कर दिया गया। डूँगरपुर रियासत मंे भी जो हालात थे, कमोबेष वे सब वैसे ही थे जैसे बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ मंे। यहाँ-वहाँ आदिवासी विद्रोहों का सिलसिला डूंगरपुर रियासत मंे कुछ अधिक था। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि रियासत के ठिकानेदारांे द्वारा किये जाने वाले दीवानी व फौजदारी मामलात के फैसलांे की पृष्ठभूमि मंे भ्रष्टाचार खूब व्याप्त था। इस कदर भ्रष्टाचार को रोकने के लिये महारावल उदयसिंह ने ठिकानेदारांे के दीवानी व फौजदारी अधिकार समाप्त कर दिये। ठिकानेदार इस निर्णय से खिन्न हो गये और उन्होंने महारावल के विरूद्ध तिहत्तर मुद्दांे की एक लम्बी षिकायत मेवाड़ के रेजीडेंट को प्रेषित कर दी। मेवाड़ का रेजीडेंट कर्नल माइल्स स्वयं मेवाड़ भील कोर खैरवाड़ा गया और वहीं महारावल डूंगरपुर व प्रमुख ठिकानेदारांे को बुलाया। दोनांे पक्षांे को सुनकर रेजीडेंट ने निर्णय दिया कि ठिकानेदारांे की षिकायत निराधार है और उसने यह भी फैसला दिया कि ठिकानेदार की मृत्यु हो जाने पर उसका उत्तराधिकारी डूंगरपुर दरबार मंे नजराना भेंट करेगा। अंग्रेज रेजीडेन्ट ने इस विवाद का पटाक्षेप तो कर दिया लेकिन डूंगरपुर के महारावल और ठिकानेदारांे के पक्षांे को पृथक पृथक मानते हुए और दोनांे से अलग-अलग व आमने-सामने वातार्लाप कर अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेष दिया कि महारावल उसके लिए ठिकानेदारांे की तरह ही एक पक्ष है और यह भी कि ब्रिटिष प्रतिनिधि दोनांे पक्षांे से सर्वाेपरि है और वह जो निर्णय लेगा, वह सभी को मान्य होगा। इस घटना के तुरन्त बाद महारावल का देहांत हो गया। संभव है उसने ठिकानेदारांे के समक्ष ब्रिटिष अधिकारी के आचरण से अपना अनादर महसूस किया हो और उसे इस बात का गहरा सदमा लगा हो। महारावल उदयसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र विजय सिंह गद्दीनसीन हुआ। उसकी उम्र तब मात्र सोलह बरस की थी। डूंगरपुर का राज्य-कार्य संचालित करने के लिए मेवाड़ के सहायक रेजीडेंट की अध्यक्षता मंे चार सदस्यीय एक कौंंिसल का गठन कर दिया गया। कौंसिल के शासन काल मंे डूंगरपुर रियासत मंे वे सारी व्यवस्थाएँ लागू कर दी गयी जो बांसवाड़ा व प्रतापगढ मंे आरंभ की गयी थी। सन् 1858 में गोविन्द गुरू का जन्म एक बनजारा परिवार में हुआ। गाँव बासिया, रियासत डूंगरपुर। बाप का नाम बेसर व मां का नाम लाटकी। पुश्तैनी ध्ंाधा वस्तुु-विनिमय पर आधारित व्यवसाय था लेकिन जीवन शैली भील व मीणा आदिवासियों जैसी, उन्हीं के बीच संस्कारित हुआ था गोविन्द जो बाद में गोविन्द गुरू कहलाया। संपसभा का गठन किया व जागृति आंदोलन फैलाया। हर किश्म की बुराई के खिलाफ लड़ना सिखाया आदिवासी समाज को चाहे वह बुराई अपने भीतर की थी या बाहरी तत्वों द्वारा थोपी हुई। सन् 1857 के संग्राम के बाद कम्पनी राज की जगह ब्रिटिश राज कायम हो गया था । आदिवासी विद्रोहों के दबाव में महाराणा मेवाड़ को 19 अप्रेल 1981 के दिन ऋषभदेव समझौता करना पड़ा जिसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे -ऽ आदिवासी व उनके घरों की गणना भविष्य में नहीं की जायेगी।ऽ आदिवासी स्त्री व पुरूषों का वजन नहीं तोला जायेगा।ऽ ऋषबदेव में मुसलमानों के आवास पर प्रतिबन्ध होगा।ऽ बारापाल व पड़ोना में थानेदार व अन्य की हत्या को जघन्य अपराध माना, लेकिन आदिवासियों की मांग पर अपराधियों को क्षमादान दे दिया जायेगा। शर्त यह रखी गयी कि भविष्य में ऐसी घटना हुई तो कठोर सजा दी जायेगी।ऽ आदिवासियों की ज़मीन की पैमायश नहीं की जायेगी।ऽ तिसाला कर की आधी रकम वसूल की जायेगी और आधी माफ कर दी जायेगी।ऽ फसल की कँूत (उपज का आकलन) के वक्त कामदारों द्वारा आदिवासियों को परेशान नहीं किया जायेगा। लेकिन उचित राशि का राजस्व के रुप में भुगतान किया जायेगा।ऽ जब कभी किसी खास वजह से कोई आदिवासी कूँत या करधान के अंश के भुगतान से मना करेगा तो उस पर वसूली के लिये दबाव नहीं डाला जायेगा।ऽ महुआ व आम की पत्तियां एकत्रित करने पर कोई कर देय नहीं होगा।ऽ आदिवासियों द्वारा घरेलू उपयोग के लिये महुआ के फूल-फल पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। ऽ पूनम की चैकी के लिए पातिया सवार गांव के आदिवासियों से जो बारह आना की राशि वसूलते रहे थे, उसे बन्द कर दिया जायेगा। ऽ उदयपुर व खैरवाड़ा के आदिवासी अंचल में कोई नया थाना नहीं खोला जायेगा।ऽ संबंधित पालों के आदिवासियों से बिना पूछे और बिना कीमत अदा किये घास व लकड़ी बाहर नहीं ले जायी जायेगी।ऽ बिलुक व पीपली की पालों द्वारा ऋषबदेव मन्दिर कोष से जो राषि ली गयी वह उन्हीं के पास रहेगी। ऽ अफीम, तम्बाकू व नमक का ठेका नहीं दिया जायेगा।ऽ रियासत के अधिकार-क्षेत्र की पहाड़ियों की घास व लकड़ी भी ठेके पर नहीं दी जायेगी।ऽ गत तीन वर्षों से जो आदिवासी किसी भी अपराध की सजा भुगत रहे थे, उन्हंे हैसियत के मुताबिक अर्थ-दण्ड के बदले मुक्त कर दिया जायेगा।ऽ जिन पालों पर डाक हरकारों के मार्फत डाक की आवा-जाई होती थी उन डाकियों को वहाँ से हटा दिया जायेगा। ऐसा करने के लिये मेवाड़ रियासत ब्रिटिश सरकार को निवेदन करेगी।ऽ वर्ष 1866 में बनायी गयी उदयपुर-खैरवाड़ा सड़क की हिफ़ाजत के लिये जो घुड़सवार तैनात किये गये थे उन घुड़सवारों को हटा लिया जायेगा। सड़क सुरक्षा का दायित्व अब स्थानीय आदिवासियों का होगा। ऽ ऋषबदेव एवं श्रीनाथजी धर्म स्थलों पर आने वाले श्रृद्धालुओं से पुरानी आदिवासी परम्परा के अनुसार ’बोलाई’ वसूली बहाल कर दी जायेगी।ऽ आदिवासी गांवों में रहने वाले धोबी एवं जोगियों से कृषि-कर नहीं लिया जायेगा। मगर पुरानी प्रथानुसार वे रियासत की सेवा करते रहेंगे।गोविन्द गुरू उक्त समझौते से और अधिक प्रेरित व उत्साहित हुए। संपसभा के माध्यम से आंदोलन का काम गति पकड़ने लगा। करीब तीन दशकों तक आंदोलन को साधते हुए पालपट्टा के जागीरदार को आदिवासियों के पक्ष में 20 फरवरी 1910 के दिन समझौता करने को विवश किया। समझौते की रूप रेखा निम्न प्रकार रही- ऽ मैं उनालू व चैमासे की कुल पैदावार का चैथा हिस्सा लेता रहा हूँ। इसमें आपने आपत्ति की है। इसलिये में ये रियायत देता हूँ कि अब से आगे चैमासे की कुल उपज का पाँचवां हिस्सा ही लेवी ली जावेगी। और उनालू की पैदावार का छठा हिस्सा ही लेवी के रूप में लिया जायेगा।ऽ प्रति हल पौने चार रूपये की जगह अब साढे़ तीन रूपये की लागत ली जावेगी।ऽ कन्या-चैरी का कर बारह आने की बजाय प्रति कन्या छः आना ही लिया जायेगा।ऽ प्रति घर माल व मक्का की उपज का दस पौंड लेने के ‘बाचका’ अधिकार को समाप्त किया जाता है।ऽ प्रति घर से मक्का के सौ भुट्टे देने होते हैं। अगर उन्हें कोई नहीं देता है तो उसे एवज में एक माणा (दस सेर)मक्का देनी होगी।ऽ प्रति घर से पके हुए हरे चने का जो बंडल दिया जाता है, अगर उसे कोई नहीं देता है तो उसके एवज में एक माणा चना देना होगा।ऽ जिस किसी व्यक्ति को मेरे अनुग्रह से जमीन दी जाती है, उसे या जब तक उसका वंश चले तब तक उन्हीं के पास रहेगी। लेकिन शर्त यह है कि उसका मेरे साथ मित्रवत व्यवहार बना रहे।ऽ मुखिया के घर अनाज देने की प्रथा वैसी ही रहेगी, जैसी जमादार गुलाब खान के समय में प्रचलित थी।ऽ फसल के अनुमान के कारण मजदूरी अनाज के रूप में प्राप्त करने और वेरी कर व बकरों की वसूली तथा मुरवी से नजराना की बजाय एक रूपया लेने की व्यवस्था जारी रहेगी।ऽ जो लोग दरबार में वाजे ले जाते हैं, उन्हें घूघरी देने की प्रथा जैसी गुलाब खान के समय प्रचलित थी, वह यथावत् चलती रहेगी। ऽ बकाया राशि की वसूली करने के बारे में लोगों को तंग नहीं किया जायेगा। वसूली की जिम्मेदारी गाँव के मुखियाओं की होगी। ऽ फसलों का अनुमान कूंत मुरवी व गाँव के मतेदार की उपस्थिति में लगाया जायेगा और उनके ऊपर कोई अनावश्यक दबाव नहीं डाला जायेगा। अगर अनुमानों के बारे में कोई मतभेद हो तो एक पर्यवेक्षक की नियुक्ति की जायगी, जिसका खर्चा जो पक्ष असहमत है, उसे वहन करना पड़ेगा। अगर ठिकाने द्वारा नियुक्त कलतरू सही अनुमान लगाने में असफल होते हैं तो उसका खर्चा ठिकाना उठायेगा और अगर मुखिया या मतेदार सही अनुमान नहीं लगाते हैं तो उसकी जिम्मेदारी खातेदारों की होगी। जहाँ दोनों पक्ष सही अनुमान नहीं लगाते हैं तो दोनों पक्षों को बराबर खर्चा देना होगा। अनुमान लगाने के लिए प्रति खलिहान दो से अधिक पर्यवेक्षक नियुक्त नहीं किए जायेंगे। ऽ रघुवीरसिंह व नवलसिंह सिसोदिया बंधुओं को राजस्व मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने दिया जायेगा।ऽ जिन लोगों के घरों के परिसरों और खेतों में आम और महुआ के पेड़ हैं, उन पर लगाये जाने वाले सालाना कर को समाप्त किया जाता है। महुआ के जो पेड़ सूख जायेंगे, उनकी लकड़ी पर ठिकाने का अधिकार होगा।ऽ ‘वाजे’ अनाज की कीमत की दर ठिकाने द्वारा तय की जायेगी। मजबूरी होने पर भी वाजे को नकद में लेने के लिए ठिकाना बाध्य नहीं होगा।ऽ जिन मजदूरों को विशेष काम के लिए बुलाया जायेगा उन्हें प्रतिदिन दो आने की दर से मेहनताना दिया जायेगा। बच्चों के मामले में फर्क होगा। मजदूरी नकद चुकायी जायेगी और किसी को उसके बदले में अनाज लेने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा। ऽ उपले व निचले पट्टे में ‘सुखड़ी’ लेने का अधिकार यथावत् रहेगा और विशेष अनुग्रह के रूप में आगदरा, मोहबतपुरा, लक्ष्मणपुरा, डाडवन व सामैया के आदिवासियों से छः सेर के बजाय चार सेर ‘सुखड़ी’ ली जायेगी। ऽ चैकीदारी करने व बारी से संदेश देने की सेवा लेने का अधिकार यथावत् रहेगा। डाडवन के डामोरों से बैठ-बेगार लेने का जागीर का अधिकार यथावत् रहेगा। पूर्व में इसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता था। अब से आगे इसके एवज में प्रत्येक घर को एक खेत निशुल्क दिया जायेगा। इस भूमि का क्षेत्रफल उतना होगा जिसमें कि दस सेर मक्का का बीज बोया जा सके। ऽ लक्ष्मणपुरा के आदिवासियों ने दड़वाह के जंगल का तीन-चैथाई हिस्सा साफ कर जो जमीन खेती के लिए तैयार की थी उसे उन्हीं आदिवासियों को दे दी जायेगी। अब की सामूहिक खेती के लिए नहीं, बल्कि परिवार के हिसाब से दी जायेगी और दी जाने वाली जमीन का क्षेत्रफल परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर तय किया जायेगा। उसी हिसाब से पट्टे जारी होंगे। लेकिन शर्त यह रहेगी कि आषाढ के लगने से पहले जंगल के शेष बचे एक चैथाई हिस्से के पेड़-पौधों को काट कर खेती के लायक जमीन वे ही आदिवासी तैयार करेेंगे और यह तैयार की गयी नयी भूमि ठिकाना के पेटे रहेगी।अब जबकि यह समझौता आपसी सहमति और राजी-खुशी से हो ही गया तो एक और अंतिम ऐलान किया जाता है। वह यह कि आपके गोविंद गुरू को संबोधित करते हुए आने से पहले जिन अगुवाओं ने मेरे खिलाफ ईडर जाकर महारावल साहब को ज्ञापन दिया था मैं उन सभी को माफी देता हूँ। वे हैं ननामा कोदर, सोमा पांडोर, काला देवजी, जीवा खराड़ी, संकला धूला और काला धूला। आंदोलन अंतिम चरण में पहुँच गया था । दक्षिण राजपूताना की पँाचों रियासतों व गुजरात की दोनों रियासतों के देशी शासक भयभीत थे कि गोविन्द गुरू का आंदोलन सफल हुआ तो इन सभी सातों रियासतों में आदिवासी-राज कायम हो जायेगा। यह सारा इलाका आदिवासी बाहुल्य था। राजपूत शासक किस पर राज करेंगे ? सभी रियासतें अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में थी। ब्रिटिश हस्तक्षेप व शोषण समाप्त हो जायेगा। यह भांपते हुए देशी व फिरंगी एकजुट हुए। संयुक्त फौजों ने मानगढ़ पर हो रही आदिवासी पंचायत के जमावडे़ पर अचानक धावा बोल दिया। मुझ पर दवाब बढता गया कि मानगढ के बलिदान की कथा लिखी जाय। प्रख्यात कथाकार गिरिराज किशोर जी ने मुझे प्रेरित किया। मैंने उनसे आग्रह किया कि ‘‘मेरे पास जो सामग्री है उसे आपके पास भेज देता हूँ। आप इस विषय पर अच्छा लिख पायेंगे।’’ उनकी आत्मीय प्रतिक्रिया थी कि ‘‘लिखना आपको ही है और आप लिखकर रहेंगे।’’ सर्वप्रथम इस बलिदान के विषय में मैंने उन्हंे सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान सूरीनाम में बताया था। उसके बाद हमारा निरंतर सम्पर्क बना रहा। मेरी जानकारी के हिसाब से पूरे भारत में मानगढ़ का मेला एक मात्र अवसर है जहाँ आदिवासीजन क्रान्ति के गीत गाते हैं। सांस्कृतिक उत्सव से अधिक संघर्ष का आह्वान- ‘‘नी मानु रे भुरेटिया नी मानु....................’’यह गोविन्द गुरू द्वारा रचित गीत है। बलिदान दिवस अर्थात् मगशीर्ष की पून्यों को प्र्रित वर्ष भरने वाला मानगढ धाम का मेला और इस दौरान प्रमुखता से गाया जाने वाला गोविन्द गुरू का उक्त गीत।मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि हताहतों की संख्या का अनुमान कैसे लगाया जाय? मानगढ़ पर्वत तत्कालीन बांसवाडा-डंूगरपुर व गुजरात की संतरामपुर रियासतों की सरहद पर है। इस क्षेत्र के दर्जनांे गाँवों में मैंने भ्रमण किया, लोगों से मिला, बुजुर्गो से बातचीत की । पूर्व विधायक एवं मानगढ धाम विकास समिति के अध्यक्ष श्री नाथूराम ने मेरी बहुत मदद की। खैरवाड़ा छावनी के पुराने रिकार्ड को खंगाला, राजस्थान आभिलेखागार में संदर्भो की खोजबीन की , उदयपुर स्थित आदिवासी शोध संस्थान के पुस्तकालय में काफी वक्त गुजारा। लाइब्रेरियन शर्मा जी ने काफी सहयोग दिया। महाराणा मेवाड़ के पोथीखाना में गया। इतिहास की उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन किया। मुझे यह देखकर अचरज हुआ कि महान कहे जाने वाले राजस्थान के इतिहासकार गोरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी इतिहास की पुस्तक में केवल इतना लिखा कि ‘मानगढ पर एकत्रित भीलों ने उत्पात मचा रखा था। फौज को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ भील मारे गये।‘ जब मैं पहली बार मानगढ गया था तो आनन्दपुरी(भूखिया) गाँव में नाथूराम जी के घर में वह साफा देखा जो उसके नाना का था और जिसमें खून के दाग व गोलियों के निशान थे। जब मैं मानगढ मेला में आखिरी बार दिसम्बर, सन् 2006 में गया तब उस साफा के बारे में पूछा तो नाथूराम जी ने बताया कि ‘कोई बड़ा आदमी दिल्ली से आया था और यह कहकर ले गया कि मानगढ के बलिदान को उजागर करूंगा।’ अब तक तो ऐसी बात सामने नहीं आयी। हो सकता है भविष्य में वह शख्स उस ऐतिहासिक साफा का व्यावसायिक उपयोग करे। ऐसे ही तो ठगे जाते रहे भोले आदिवासी। मृतकों के आकलन को लेकर मैंने सबसे आधिकारिक प्रमाण यह माना कि जिन अंग्रेज छावनियों से फौजें रवाना हुई थी वे कितना गोला-बारूद लेकर ‘मानगढ आॅपरेशन‘ के लिए चली और वापसी में कितना जमा कराया। हथियारबंद सात कम्पनियां थी। रियासती फौजें अलग। अंग्रेजी फौजों ने करीब चालीस प्रतिशत गोला-बारूद वापस जमा कराया। जो साठ प्रतिशत खर्च हुआ वह आदिवासियांे के विरूद्ध इस्तेमाल किया जिससे कई हजार मनुष्य हताहत किए जा सकते थे। एक और तथ्य यह कि मानगढ पर जितने व्यक्ति मारे गये, उतने ही करीब घायल हुए थे। उनमें से काफी बाद में घावों के सड़ जाने से मौत के मुँह में चले गये। जब फौजें गेाविन्द गुरू सहित करीब 900 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर नीचे उतर रही थी तब भी पालों पर इकट्ठे आदिवासी समूहों से उनकी मुठभेड़ हुई। उस दौरान भी सैकड़ों लोग मारे गये थे। निष्कर्षतः कुल मृतकों की संख्या करीब डेढ हजार बैठती है। मानगढ की घटना से जुड़े सभी तथ्यों व प्रमाणांे को सत्यापित करने के बाद राजस्थान सरकार ने भारत सरकार को मानगढ धाम विकास के लिए प्रस्ताव भेजे। भारत सरकार ने जांच पड़ताल करने के पश्चात् 2 अगस्त 2002 को 2 करोड़ 23 लाख रूपये की राशि स्वीकृत की और सैद्धान्तिक स्तर पर स्वीकार किया कि देश का पहला ‘जलियांवाला काण्ड‘ अमृतसर (1919) से छः वर्ष पूर्व दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिला के मानगढ पर्वत पर घटित हो चुका था जिसमें जलियांवाला से चार गुणा शहादत हुई । अब छः सौ फीट की ऊँचाई के पहाड़ पर 54 फीट ऊँचा शहीद-स्मारक बना दिया गया है। गोविन्द गुरू की प्रतिमा भी है, फिर भी उस स्थल पर और ध्यान देना अपेक्षित है। जैसा कि मैंने ऊपर उल्लेख किया है, घटना के बाद मानगढ स्थल से गोविन्द गुरू सहित नौ सौ क्रंातिकारियों को गिरफ्तार किया था। 38 व्यक्तियों पर डकैती, हत्या व राजद्रोह के मुकदमें चलाये गये। गोविन्द गुरू को आजीवन कारावास की सजा दी जिसे बाद में दस वर्ष और अंततः आदिवासीजन के संभावित विद्रोहों की आषंका को भांपते हुए सत्ता ने उस सजा को देश निकाला में परिवर्तित किया। इन सब के बावजूद वह संग्रामी चुप रहने वाला नहीं था। जीवन-पर्यन्त आदिवासियों के हक और हिस्से की लड़ाई लड़ता रहा । ‘डी.डी. एक’ चैनल पर प्रसारित होने वाले सीरियल ‘रूबरू’ की टीम में शोधकर्ता की हैसियत से मैं भी शामिल रहा हूँ। सीरियल के डायरेक्टर अनुराग शर्मा ने मुझे कहा की ‘‘आपने मानगढ़ पर काम किया है। ‘रूबरू’ का एक एपीसोड हम उस घटना पर क्यों नहीं तैयार करें।’’ हमने मानगढ़ मेला के अवसर पर वहाँ जाने का तय किया और एपीसोड तैयार कर लिया जो प्रसारित हुआ। दर्षकों की मांग पर दूसरी बार भी उसे प्रसारित किया गया। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की डेढ सौ वीं साल गिरह के आयोजन-क्रम के तहत जयपुर दूरदर्षन ने भी एक एपीसोड तैयार कर प्रसारित किया। कुछ इतिहासकारों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की कि ऐसी घटना के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं। ये ऐसे महानुभाव हैं जिन्होंने ‘मानगढ़’ की घटना को लेकर कोई खोजबीन नहीं की। मैं इनकी शंका का समाधान दो अन्य धटनाओं के जिक्र से करना चाहता हूँ। राजस्थान के महान क्रांतिकारी मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में भूला-बिलोरिया (जिला सिरोही, राजस्थान) व पालचिŸारिया (गुजरात) में सन् 1922 में अंग्रेजी व रियासती फौजों के साथ आदिवासियों का संघर्ष हुआ था। क्रमषः 800 व 1200 आदिवासी शहीद हुए थे। मानगढ़ की तरह इन दोनों घटनाओं को भी मैंने यात्रा वृŸाांतिक शैली में लिखा। पहला वृŸाांत ‘कथादेष’ में प्रकाषित हुआ और दूसरा अभी ‘पाइप लाइन’ में है, चूंकी उसे वर्ष 2006 में ही तैयार किया है। भूला-बिलोरिया मेरे साथ सिरोही निवासी साहित्यकार सोहन लाल पटनी भी गये थे। वे पहले भी वहाँ जाकर आये थे। दरअसल उस घटना की जानकारी मुझे उन्होंने ही दी थी। घटना के चष्मदीद गवाह गोपी गरासिया से उन्होंने आँखों देखा हाल सुना था। यात्रा के दौरान वे गोपी से मुझे मिलाना चाहते थे, लेकिन हमारे वहाँ जाने के चार माह पूर्व गोपी का देहान्त हो चुका था। बड़ी निराषा हुई हमें। संयोग से भूला व बिलोरिया जुड़वां गांवों में घूमते हुये अतिवृद्ध नानजी भील व सुरत्या गरासिया मिल गये। दोनों ने घटना का आँखों देखा हाल हमें सुनाया। गोपी, नानजी व सुरत्या तीनों ही घटना के समय समझदार किषोरवय के थे।वापसी में मैंने पटनी जी से पूछा की ‘आपने गौरीशंकर हीराचन्द ओझा जैसे धुरंधर इतिहासकार का व्यक्तित्व व कृतित्व लिखा है। उन्होंने इस घटना का जिक्र अपनी लेखनी से क्यों नहीं किया?’ पटनी जी मुझे संतुष्ट नहीं कर पाये। घटना स्थल से सिरोही के रास्ते में रोहिड़ा कस्बा आता है। यही ओझा जी का जन्म-स्थान है। रोहिड़ा से मात्र सात कि.मी. भूला-बिलोरिया गाँव हैं-आदिवासी बलिदान का घटना स्थल। पटनी जी ने ओझा जी पर जो पुस्तक लिखी वह मैंने पढ़ ली थी। उस पुस्तक में स्वयं पटनी जी ने ओझा द्वारा ठाकुर रघुनाथ सिंह (सामंत) को लिख्ेा एक पत्र का उल्लेख किया है जिसमें स्पष्ट लिखा है कि ‘एक इतिहासकार को अपने समय के शासकों के हितों का ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो उसका सारा कार्य व्यर्थ चला जायेगा।’ स्पष्ट है कि मनुष्य के हक की लड़ाई के इतिहास को मनुष्य विरोधी शोषक-षासकों ने दबाया है और उनके आश्रय में पलने वाले इतिहासकारों ने उनका साथ दिया है। मानगढ के आदिवासी-बलिदान पर अन्यथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले इतिहासकार बंधुओं से मेरा विनम्र निवेदन है कि चक्षुदृष्टा साक्षी और उक्त पत्र से झलकने वाली इतिहासकार की मानसिकता के आगे आपको और प्रमाण चाहिए तो ईमानदारी से खोज कीजिये इतिहास की और वर्चस्वकारी वर्ग के पक्षधर तथ्यान्वेषी महानुभावों से मेरा आग्रह है कि राजाओं की बिरदावली गाने से महान् नहीं बना जाता, महान् बनने के लिये लिखना पड़ेगा आम आदमी के दुख-सुखों का इतिहास। जहाँ तक मानगढ़ का संदर्भ है, उक्त दोनों घटनाओं की तरह मैं तो इतना ही खोज पाया हूँ जितने को केन्द्र में रखकर किसी प्रकार से यह कृति पूरी कर सकूँ। मैं इतिहासकार नहीं हूँ, इसलिए इतिहासकारों को चाहिए कि वे मानगढ़ का इतिहास लिखें। उनसे ही यह नैष्ठिक अपेक्षा की जा सकती है।इस कृति की पांडुलिपि को लेखक मित्र डाॅ0 सत्यनारायण व श्री शंकरलाल मीणा जी ने पढा और महत्वपूर्ण सुझाव दिये । कृति के प्रेरक श्रद्धेय गिरिराज किशोर जी ने पांडुलिपि पढने के लिए अपनी व्यस्तता में से समय निकाला और सार्थक सुझाव दिये। तदनुसार मैंने इसमें आंशिक संशोधन किये। मैं इन सभी का हृदय से आभारी हँू। यह संतोष की बात है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की डेढ सौ वीं सालगिरह के अवसर पर इसे छप जाने की मेरी इच्छा को प्रकाशक महोदय ने पूरा किया। प्रकाशक परिवार साधुवाद का पात्र है। अब यह सुधी पाठकों के हाथ में है कि वे इसे किस रूप मेें लेते हैं। आशा करता हूँ कि सुझावनुमा महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझ तक पहुंचेंगी।ं जोहार ! - हरिराम मीणा

बुधवार, 12 अगस्त 2009

ढकपअझयह बात है आज से कोई पन्द्रह बरस पहले की। पथिक बाबा (वी.पी.वर्मा) के द्वारा संपादित आदिवासी पत्रिका ‘अरावली उद्घोष’ में मैंने मानगढझे ऐसी घटना की जानकारी नहीं थी। जानकारी होती भी कहाँ से? मैं दक्षिणी राजस्थान के उस अँचल में इससे पहले कभी गया नहीं न वहां के किसी परिचित व्यक्ति ने मुझे ऐसी किसी घटना के बारे में बताया और न ही कहीं इतिहास की पुस्तकों में मैंने ऐसी शहादत के बारे में पढ़ा। बाद में उदयपुर कई बार जाना हुआ। जब भी वहाँ जाता पथिक बाबा से अवष्य मिलने का प्रयास करता। ऐसे अवसरों के दौरान आंचलिक बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एन.जी.ओज से जुड़े कार्यकर्ताओं व जागरूक आदिवासियों से मिलता। मानगढ़-ंउचयबलिदान के विषय में प्रमुखता से बातचीत करता। कुछ सूचना एवं संदर्भ एकत्रित करने का प्रयास करता रहा। इतिहास के स्तरीय अध्ययन से कभी जुड़ा नहीं और न ही शोधार्थी रहा। पुलिस-ंउचयकर्म से सम्बन्ध रखते हुए एक खोजी दृष्टि अवष्य विकसित हुई। अतः घटना की पुष्टि में प्रमाण जुटाता गया। व्यस्तताएं अपनी जगह थी, प्रष्न था प्राथमिकताओं का, जो तय कर ली और अंतत 2001 में जयपुर से मानगढ़ तक का सफर पूरा किया। घटना के बारे में इतनी सामग्री, संदर्भ व सूचनाएं एकत्रित हो चुकी थी कि अब कुछ लिखा जा सकता था। और लिखा ‘मानगढ़ -ंउचय आदिवासी बलिदान के तहखानों तक’ यात्रा वृत्तांत जिसे ‘पहल’-ंउचय71 (2002) में ज्ञानरंजन जी ने मन से छापा। मुझे सुखद अनुभूति हुई। मानगढ़ की वह घटना इधर-ंउचयउधर चर्चा में आयी। मैं पढताझाबुआ का टंट्या मामा, गुजरात का जोरजी भगत (दोनों को 1880 के दशक में अंग्रेजों ने फांसी दी) और मानगढ-ंउचयबलिदान का नायक गोविन्द गुरू। आदिवासी दुनिया का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानव की उत्पत्ति का। उनके नैसर्गिक व शांत जीवन में पहला त्रासद हस्तक्षेप हुआ आर्य-अनार्य संघर्ष-ंउचयश्रंृखला के युग में जब उन्हें मैदानी क्षेत्रों से विस्थापित होकर जंगलों की शरण लेनी पड़ी। वे जंगल पर आधारित जीवन को सहज रूप में जीना सीख गये। घर व परिवार की संस्था के बावजूद व्यक्ति व निजी सम्पति की अवधारणा उन अर्थो में विकसित नहीं हुई जिन अर्थो में इसे समझा जाता है। समाज संस्कृति सामूहिकता पर आधारित रहती आयी। विशेष रूप से दसवीं से बारहवीं और पश्चातवत्र्ती कालखण्ड में फिर उथल-ंउचयपुथल हुई और तत्कालीन राजस्थान के आदिवासियों की स्वायत्तता को बाहर से आये राजपूतों ने छीन लिया। विजेता कौमें हारी हुई मानवता को हेयद्ष्टि से देखती रही है। यही यहाँ हुआ। इसके बावजूद समाज व संस्कृति के स्तर पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ सका । जिस मात्रा में स्वतंत्रता छिनती है उसी मात्रा में शोषण व विपन्नता पैर फैलाती है। राज की बेगार, महाजनी सूदखोरी व मनुष्य के स्तर पर दोयम दर्जा सौगात में मिले, फिर भी जंगल से बेदखली की नौबत नहीं आयी। फिर आयी ईस्ट इंडिया कम्पनी। राजपूताना कहे जाने वाले अंचल के दक्षिणी भू-ंउचयभाग की बड़ी रियासत मेवाड़ की राजधानी उदयपुर में सन् 1818 में कुपदार्पण हुआ कम्पनी सरकार के प्रतिनिधि कर्नल जेम्स टाॅड का। उसकी रणनीति के तहत दक्षिण राजपूताना की प्रमुख रियासत मेवाड़ सहित वागड़ अंचल की डूगंरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, कुशलगढ व सीमावर्ती गुजरात की संतरामपुर व ईडर रियासतों के साथ सन्धियां की गयी जिनके प्रमुख प्रावधान थे वनोपज पर अधिकार, खनिज सम्पदा का दोहन और इसके बदले सम्भावित आदिवासी विद्रोहों को कुचलने के लिए सैन्य बल। टाॅड के उत्तराधिकारियों का सिलसिला जारी रहा और रियासती व्यवस्था मंे कम्पनी का हस्तक्षेप भी। स्वाभाविक था कि आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड़ते। सन् 1820 के दशक में विद्रोह आरंभ हो गये और यह क्रम चलता रहा । विद्रोह से निपटने के लिए कम्पनी व रियासत की फौजें असफल रहीं। विकल्प तलाशा गया कि आदिवासियों को नियन्त्रित करने के लिए उसी समाज के युवकों की फौजें तैयार की जावे। सन् 1840 के दशक में खैरवाड़ा, कोटड़ा, एरिनपुरा, देवली, नीमच आदि स्थलों पर छावनियों की स्थापना की गई। आदिवासी सैनिक और नियन्त्रक अधिकारी दूसरे तथा कमाण्डेंट कम्पनी के अंग्रेज अधिकारी । फिर भी विद्रोह नहीं थमें। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी भी पीछे नहीं रहे। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, कुषलगढ़ रियासती क्षेत्रों में भीलों की बहुलता और दूसरी बड़ी संख्या मीणा आदिवासियों की। प्रतापगढ़ रियासत मंें मुख्यतः मीणा आदिवासियों की आबादी। मानगढ़ के चारों ओर पसरा यह अंचल राजपूताना का दक्षिणाांचल था और इस दक्षिणाांचल की पूर्वी दिषा में सीमावर्ती रतलाम, सैलाना व झाबुआ रियासतें तथा पष्चिम में झालोद, सूँथ व ईडर की रियासतें। यह सारा अंचल आदिवासियों से आबाद था। लेकिन इस सारे भू-ंउचयक्षेत्र के षासक गैर आदिवासी अर्थात् राजपूतों के विभिन्न वंषों के महाराणा, महाराजा, महारावल, जागीरदार, ठिकानेदार, भौमिया व उनके अधीन कार्यरत हाकिम-ंउचयहुक्मरान थे और इन सब के ऊपर ब्रिटिष सत्ता थी, जिनके पोलिटिकल एजेण्ट, विभिन्न फौजी छावनियों के कमाण्डेंट, रेजीडेंट और अन्य अफसर ब्रिटिष क्राउन के प्रमुख प्रतिनिधि गवर्नर जनरल व वायसराय के अधीन रहकर रियासतों के सारे निर्णय लेते थे। राजा-ंउचयमहाराजा अंग्रेज हुकूमत की कठपुतली थे। कर्नल टाॅड के जमाने की ईस्ट इण्डिया कम्पनी और रियासतों के मध्य हुईं सन्धियों के सिलसिले से लेकर सन् 1857 के संग्राम के बाद भारत पर ब्रिटिष राज की सीधी दखलन्दाजी तक की प्रक्रिया में ये हालात पैदा हुए थे। रियासती सत्ता द्वारा किए जाने वाले अत्याचार, ब्रिटिष राज का हस्तक्षेप और शोषण-ंउचयदलन-ंउचयदमन और अभाव -ंउचयभुखमरी-ंउचयमहामारी के अघाये-सताये और अनेकानेक आषंकाओं, अनिष्चयों, अविष्वासों से घिरे हुए भयभीत आदिवासी। 19वीं सदी के अंतिम चरण में जो कुछ बुरी घटनाएँ घटित हुईं, सत्ता के स्तर पर जो कुछ राजनीतिक परिवर्तन हुए, ब्रिटिष-ंउचयषोषण के जो नये-नये तौर तरीके और रणनीतिक दाँव पेंच अपनाये गये और इन सबके विरूद्ध नाना प्रकार के दुःख-ंउचयदर्दों को झेलते रहने के साथ-ंउचयसाथ हालात के विरूद्ध विद्रोह की जो आग अंचल के आदिवासियों के भीतर सुलगती रही-ंउचय इस सबको मूक साक्षी मानगढ़ ने अपनी अदृष्य आँखों से देखा। मानगढ़ पर धूणी जमाये संपसभा के आदिवासी नायक और प्रमुख नायक गोविंद गुरू इस सारे माहौल से वाकिफ थे। आदिवासियों के दुःख-ंउचयदर्दों का उनको प्रत्यक्ष अनुभव था। ब्रिटिष सत्ता के गलियारों और देषी रियासतों के दरबारों के आसपास काफी आदिवासी लोग थे। वे ब्रिटिष फौजी छावनियों में फौजियों के रूप में भर्तीषुदा थे। छावनियों के अफसर-ंउचयमैसांे में लाँगरी व अर्दलियों के रूप में थे। रियासती दरबारों में आदिवासी लोग सेवादारों के रूप में थे। आदिवासियों के समूह के समूह दुर्गोंे, महलों, बगीचों और अन्य निर्माण-कार्यों में बेगार करने के लिए जबरन ले जाये जाते थे। अंग्रेजों और रियासती शासकांे द्वारा आदिवासियों के विरूद्ध क्या नीतियां बनायी जाती थी और क्या-क्या निर्णय लिए जाते थे -ंउचय यह सब बातें उन सेवकों और बेगारियों तक छन छन कर आ ही जाती थी। अंग्रेज चालाक, धूर्त, ठग और स्वार्थी थे। साथ ही वे षिक्षित, बुद्धिमान और दूरगामी सोच रखने वाले थे। अधिकांश देसी रियासती सत्ताधीष और उनके नुमाइंदे अत्याचारी, अय्याष और अहंकारी थे। ब्रिटिष अधिकारियों से निकटता को परम सम्मान मानते थे। खास तौर पर आयोजित दावतों के दौरान उनमें से कुछ शराब के नषे में डींग मारने लगते थे। सेवकों के सामने गोपनीय बातों को बक देते थे। उन्हें यह होष नहीं रहता था कि किस के सामने या किस की उपस्थिति में क्या बात कहनी चाहिए और क्या नहीं। कुछ राजा-ंउचयमहाराजा चाहे गम्भीर हों, लेकिन जागीरदार तो अक्सर ऐसा कर ही देते थे। उनमें दम्भ और शेखी बघारने की प्रवृत्ति अधिक दिखायी देती थी। अंग्रेज अफसरों की सोच वैज्ञानिक, विवेक व तर्क सम्मत और आधुनिक थी जबकि देसी राजा-ंउचयमहाराजाओं एवं जागीरदारों का दृष्टिकोण सामंती परम्पराओं में जकड़ा हुआ रहता था। छावनियों के आदिवासी फौजी, अर्दली, सईस और रियासती आदिवासी सेवक एवं बेगारी चाहे अनपढ़ थे, मगर जीवन का क्रूर यथार्थ और व्यापक अनुभव उनके पास था। वे अगले के चेहरे के भावों को भाँप सकने की क्षमता रखते थे। फिरंगी हुक्मरानों और राजा-ंउचयमहाराजाओं के बीच होने वाली वार्ता सफल हुई या असफल-ंउचय यह उनके आसपास सेवा कार्य में लगे रहने वाले आदिवासी-ंउचयजन उनकी मुख-ंउचयमुद्राओं को पढ़कर जान जाते थे। ब्रिटिष सत्ता-ंउचयकेंद्रों और रियासती दरबारों से निकली बातें मानगढ़ तक पहँुचती थी और मानगढ से संपसभा के कार्यकर्ताओं के माध्यम से दूर-ंउचयदराज के आदिवासी अंचलों तक। यह प्रक्रिया लंबी, धीमी और बात के असल रूप को थोड़ा बहुत तोड़ने-ंउचयमरोड़ने वाली अवष्य थी, लेकिन बात का अर्थ काफी कुछ बचा रहता था। यह सब गोविंद गुरू, संपसभा के अन्य नायकों व कार्यकत्र्ताओं और समूची आदिवासी कौम के लिए अत्याचारों के विरूद्ध जागृति व संघर्ष की भावी रणनीति बनाने के लिए काफी सार्थक और अनिवार्य था। तो इसी तरह गोविंद गुरू व साथियों को यह पता चला कि बांसवाड़ा के महारावल लक्षमणसिंह द्वारा अंग्रेज सरकार का खिराज समय पर नहीं दिया जाता है। ब्रिटिष सरकार ने राज्य को ऋण ग्रस्त तथा चढ़ा हुआ खिराज चुकाने में असमर्थ और दुर्भिक्ष पीड़ित देखा। तब शासन सम्बन्धी अधिकार महारावल से लेकर सहायक पोलिटिकल ऐजेंट के सुपुर्द कर दिए। एजेंट की सहायता के लिए पाँच सदस्यों की एक कौंसिल का गठन कर दिया गया। इसका महारावल ने विरोध करना चाहा लेकिन उसमें साहस की कमी थी और उसके सलाहकार भी ढीले-ंउचयढाले थे। दूसरे, वह लार्ड कर्जन के गवर्नर जनरल व वायसराय होने का समय था। उस काल में देसी रियासतों में ब्रिटिष हस्तक्षेप काफी बढ़ता जा रहा था। कौंसिल के शासनकाल में बांसवाड़ा राज्य की अर्थ व्यवस्था में काफी परिवर्तन किए गये। बजट बनाने की प्रणाली का आरम्भ किया गया ताकि आय-व्यय का व्यवस्थित लेखा-ंउचयजोखा तैयार किया जा सके। कहाँ कमी है, उसे ठीक किया जा सके। पुलिस महकमें का पुनर्गठन किया गया। आदिवासी विद्रोहों को नियन्त्रित करने और विद्रोहियों को पकड़ने के लिए महत्वपूर्ण स्थलों पर पुलिस की चैकियां स्थापित की गयी। खुफिया तंत्र को मजबूत करने के प्रयास किए गये। न्याय-ंउचयप्रषासन में भी काफी फेरबदल किया गया। नये साक्ष्य अधिनियम, दण्ड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दण्ड संहिता के कुछ प्रावधानों के आधार पर रियासती विधि-व्यवस्था में संषोधन किए गये। सायर की शुल्क दरों को नियत किया गया। किसानों से पैदा हुई फसल के हिस्से को राजकोष में लेने की प्रणाली को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर जमीन की पैमाइष के द्वारा पैदावार के अनुसार सावधिक ठेका प्रथा की शुरूआत की गयी। पुलिस व वसूली के काम के लिए अलग-ंउचयअलग हाकिम नियुक्त किए गये। जंगलात का नया महकमा खोला गया। स्वास्थ्य व सफाई के लिए राज्य की राजधानी में म्यूनिसिपल कमेटी का गठन किया गया। सारे राज्य में सालिमषाही सिक्के के प्रचलन को बंद कर उसकी जगह कलदार सिक्के का प्रचलन आरम्भ किया गया। प्रभु-ंउचयवर्ग के बच्चों को षिक्षित करने के लिए स्कूलों की व्यवस्था शुरू की गयी। सम्प्रेषण-ंउचयसुविधाएँ बढ़ाने के लिए डाक व तार के माध्यम को अपनाया गया। अंग्रेजों ने बांसवाड़ा राज की अंगुली पकड़ते-ंउचयपकड़ते कलाई को पकड़ा था। कुछ अर्सा पूर्व महारावल लक्ष्मणंिसंह और कुषलगढ़ के राव के मध्य तनातनी पैदा हो गयी थी। राजा के रूप में महारावल लक्ष्मणंिसंह की कमजोरियों के चलते कुषलगढ़ के राव ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और महारावल के आदेषों को मानने से इन्कार कर दिया था। ब्रिटिष सरकार की दखल से कुषलगढ़ के राव और महारावल बांसवाड़ा के बीच समझौता हुआ। बांसवाड़ा को कमजोर बनाने के लिए अंग्रेजों ने समझौते मंे तय करवाया कि भविष्य में कुषलगढ के आंतरिक मामलों में महारावल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। व्यापार-ंउचयशुल्क व खिराज सम्बन्धी मामले भी दोनों रियासतों के स्वतंत्र मान लिए गये। यूं कर महारावल बांसवाड़ा के अधिकारों में कटौती प्रारम्भ हुई और ब्रिटिष पोलिटिकल एजेंट की सर्वोच्चता स्थापित होती गयी। पहले बांसवाड़ा रियासत के मामलों को मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट देखता था। बाद में पृथक से सहायक पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा के लिए हो गया। वही कुषलगढ का नियन्त्रक बन गया। राजपूताना के अन्य राज्यों की तरह बांसवाड़ा रियासत के क्षेत्र में भी अधिकांष भूमि पर जागीरदारों का कब्जा था। खालसा क्षेत्र की भूमि बहुत कम थी। महारावल लक्ष्मणसिंह और ठिकानेदारों के बीच अक्सर विवाद पैदा होते रहते थे। सन् 1871 में गुढा के जागीरदार हिम्मतंिसंह और गढी के ठाकुर का महारावल से विवाद हो गया। इसी दौरान औरीवाड़ा के ठिकाने से मतभेद पैदा हो गया। अंग्रेज अधिकारियों ने पहले तो विवादों को बढ़ावा देने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई और अंत में सहायक पोलिटिकल एजेंट की दखल से विवादों का निबटारा करवाया ताकि उनकी पंचायती चलती रहे। दल्ला रावत सोदलपुर इलाके के भीलों का मुखिया था। उसने महारावल के विरूद्ध बगावत कर दी। यह विवाद बोलाई व रखवाली करों को लेकर हुआ था। सहायक पोलिटिकल एजेंट के हस्तक्षेप से ही इस विवाद का निबटारा हुआ। इसी क्रम में बांसवाड़ा राज्य और निकटवर्ती डूंगरपुर , उदयपुर , प्रतापगढ़, रतलाम, सैलाना, झाबुआ, झालौद और सूँथ रियासतों के बीच सीमा विवाद चलते रहते थे। इन विवादों का निबटारा भी अंग्रेजों की दखल से होने लगा। प्रतापगढ़ रियासत मंे अधिकांष जनसंख्या मीणा व उसके बाद भील आदिवासियों की थी। उन्नीसवीं व बीसवीं सदियों के संधिकाल से पूर्व प्रतापगढझाया जाने लगा। ब्रिटिष अधिकारियों के हस्तक्षेप की वजह से प्रतापगढ़ राज्य में जनगणना, स्वास्थ्य केन्द्र , पाठषाला, स्टाम्प, कोर्ट-ंउचयफीस आदि की व्यवस्था आरम्भ की गयी। पुलिस व सेना का पुनर्गठन किया गया। बांसवाड़ा की तर्ज पर आपराधिक कानूनों में संषोधन किया गया। सन् 1890 के दषक में बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणंिसंह और प्रतापगढ़ के महारावल रघुनाथंिसंह के मध्य सीमावर्ती धार्मिक स्थल सीतामाता को लेकर विवाद पैदा हो गया था। ब्रिटिष अधिकारियों ने हस्तक्षेप कर इस विवाद को निबटाया। बांसवाड़ा राज्य से कुषलगढ़ निकल जाने के बाद बांसवाड़ा छोटी रियासत बन गयी थी। अब प्रतापगढ़ उसके टक्कर की रियासत थी। सीतामाता स्थान को सहायक पोलिटिकल एजेंट ने प्रतापगढ राज्य को दिलवा दिया। इस निर्णय से दोनों राज्यों मंे भीतर ही भीतर अनबन आरम्भ हो गयी। इस अनबन का अंग्रेजों ने खूब फायदा उठाया। ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का यह एक उदाहरण था। ब्रिटिष अधिकारियों की दखल से मथुरा निवासी पं. मोहनलाल पंड्या को प्रतापगढ़ रियासत का कामदार और अजमेर के रायबहादुर सेठ सौभागमल डढ्ढा को खजांची नियुक्त कर दिया। इन नियुक्तियों का महारावल रघुनाथ ंिसंह विरोध नहीं कर सका। प्रतापगढझ

शुक्रवार, 22 मई 2009

आदिवासी संस्कृति-वर्तमान चुनौतियों का उपलब्ध मोर्चा

आदिवासी संस्कृति को समझने के लिए ‘प्रकृति’ व ‘संस्कृति’ के अन्तर व सम्बन्धों पर विचार करते हुए बात की शुरुआत की जा सकती है। प्रकृति दृश्यमान खगोलीय व भौगोलिक तत्त्वों की सृष्टि है जो नैसर्गिक है। इसका स्वरूप मौलिक भी है और परिवर्तनशील भी। सुविधा के लिए कहा जा सकता है कि यह प्राणी जगत से पृथक परिवेश है जिसमें प्रकृति के जड़ व चेतन दोनों तत्त्वों का अस्तित्त्व होता है। मानवेतर प्राणियों की संस्कृति को वृत्ति मूलक व्यवहार कहना उचित होगा जिसमें परिवेश विशेष व प्रशिक्षण से ही परिवर्तन संभव हो सकता है। इस सबसे परे संस्कृति का सीधा सम्बन्ध मानव समाज से है जिसकी निर्मिति और विकास अर्जित संस्कारों पर निर्भर होता है। ये संस्कार वंशानुगत, सामाजिक व विभिन्न मानव-समुदायों के परस्पर सम्पर्क से पैदा होते हैं। सकारात्मक अर्थ में संस्कृति के प्रमुख तत्त्व सौन्दर्य बोध व तज्जन्य आनंद और कल्याण की कला है। इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कलाभिव्यक्तियों व लोकाचार के स्तर पर होती है। सभ्यता व भौतिक विकास के अनुरूप संस्कृति अपना स्वरूप ग्रहण करती चलती है। इस रूप में संस्कृति मानव निर्मित होती है लेकिन मनुष्य का जीवन अंततः प्रकृति पर निर्भर होता है इसलिए प्रकृति तत्त्वों से संस्कृति का जुड़ाव अनिवार्य होना चाहिए। प्रकृति से लगाव और मानव सृजित होने की स्थिति के कारण संस्कृति का स्थान प्रकृति एवं कृत्रिमता के मध्य कहीं होता है। जिन मानव-समुदायों की संस्कृति प्रकृति से निकट का सम्बन्ध बनाकर विकसित होती हैं वे अधिक सौन्दर्यबोधी, आनन्ददायक व कल्याणकारी होती है और जो संस्कृति प्रकृति से दूर हटती जाती हैं वे शास्त्रीय, वैयाकरणीय, औपचारिक, प्रतिमान आधारित, सजावटी तथा नीरस बनती चली जाती हैं। लोक व भद्र समाज की संस्कृतियों का अंतर यहाँ स्पष्ट होने लगता है। निस्संदेह, लोक संस्कृति आदिम समुदायों की संस्कृति पर मूलतः आधारित रहती आयी है। इस पृष्ठभूमि में आदिवासी संस्कृति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। विभिन्न संस्कृतियों के परस्पर सम्पर्क से पैदा होने वाला प्रभाव आदान-प्रदान की स्थिति लाता है। इस प्रक्रिया में एक-दूजे द्वारा सीखने का नजरिया संस्कृति को उन्नत करता है। इसके विपरीत वर्चस्व, दबाव व टकराव की स्थितियाँ पैदा होने से संस्कृतिजन्य परम्परागत मानवीय मूल्यों का क्षरण ही होगा। यह प्रवृत्ति आदिम व तथाकथित मुख्यधारा की संस्कृतियों के मध्य होने वाले अंतक्र्रियात्मक सम्बन्धों में देखी जा सकती है। मानसेंदू कुण्डु ने अपने एक लेख में बताया है कि मध्य भारत के गोंड लोगों के कुछ परिवारों ने स्थानीय हिन्दू धर्म के प्रभाव स्वरूप समाज सुधार (?) आन्दोलन की शुरुआत की जिसमें स्त्री-पुरुषों द्वारा एक साथ मद्यपान व नृत्य आदि करने पर रोक लगायी। इससे पुरुष व स्त्रियों की सामूहिकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा। महिलाएँ पर्दानशीन हुई, बच्चों का विवाह बाल्यावस्था में किया जाने लगा व मूल धारा के हिन्दुओं को ‘माॅडल’ माना जाने लगा और वे आदिवासी जन हीन भावना से ग्रसित होने लगे। उन तथाकथित समाज सुधारकों की धारणा थी कि इससे गोंड समाज हिन्दुओं द्वारा सम्मान पा सकेगा जो सर्वथा गलत साबित हुआ। कुण्डु का ही विचार है कि चाहे ईसाई या हिन्दू या मुसलमान बनाये जायें, धर्मान्तरण की वजह से अखण्डता एवं सामूहिकता की भावना पर आधारित आदिवासी बस्ती में फूट पैदा होने लग गयी। उस बस्ती के लोगों का एक सा धर्म-विश्वास व सामाजिक सांस्कृतिक चेतना हुआ करती थी उसे नष्ट किया। अब उस बस्ती में एक मोहल्ला परंपरा पर आधारित आदिवासियों का और दूसरा धर्मान्तरित आदिवासियों का बन गया। ब्रिटेन के प्रसिद्ध नृतत्व-वैज्ञानिक वेरियर एल्विन (जिन्होंने बाद में भारतीय नागरिकता ग्रहण कर ली थी) बताते हैं कि ‘मिशनरियों की आदिवासियों के प्रति असहिष्णुता की वजह से बहुत सारे अच्छे सामाजिक रीति-रिवाज तो खत्म हुए ही, यहाँ तक कि नृत्य, गीत तथा ताँत बुनायी जैसे उन्नत सांस्कृतिक-आर्थिक क्रिया कलाप भी ध्वस्त हो गये।’ वन संरक्षण अधिनियम के तहत मध्यप्रदेश के एक वनांचल को संरक्षित क्षेत्र घोषित करके किसी भी प्रकार के पेड़ या अन्य वनस्पति को काटने पर रोक लगायी गयी। वहाँ के आदिवासियों ने यह तर्क देकर सीमित विरोध जताया कि उस जंगल में पैदा होने वाली ‘महाल’ नाम की बेल, जिससे वे लोग रस्सी बनाकर जीवनयापन करते हैं, यदि उसे समय-समय पर नहीं काटा गया तो उनकी आर्थिक दशा पर तो विपरीत प्रभाव पड़ेगा ही, साथ ही अन्य पेड़-पौधों को भी नुकसान होगा, चूँकि महाल अधिक फैल जाने से अन्य पेड़-पौधों को जकड़ लेती है जिससे उनकी वृद्धि रुक जाती है। जंगली पेड़-पौधों के संरक्षण-सम्वर्द्धन के लिए अनिवार्य है कि कुछ अवधि के अंतराल से महाल की कटाई की जाये। यहाँ महत्वपूर्ण है कि एक ओर आदिवासियों की आजीविका की तो परवाह नहीं की, साथ ही जंगल सम्बन्धी उनके पुश्तैनी ज्ञान से जितना लाभान्वित हुआ जा सकता था, उसे भी दरकिनार किया गया। ध्यान देने की बात यह है कि अनुभवजन्य ज्ञान की तुलना में आधुनिक वन-विशेषज्ञों का बोध अपूर्ण है। आदिवासी संस्कृति एवं अनुभव-दृष्टि के बारे में जानकारी का ऐसा अभाव सरकारी नीतियों में रहने वाली खामियों को भी दर्शाता है। यहाँ प्रख्यात विद्वान निर्मल कुमार बोस की ये पंक्तियाँ उद्धृत करना समीचीन होगा - ‘‘औद्योगिक समाज की सभ्यताओं को समझना आसान है, उसकी तुलना में उसके पूर्व की सभ्यताओं को समझना अत्यन्त कठिन है। इन प्राक्-आधुनिक सभ्यताओं को समझना आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे सोच में लगे विद्वानों के बस की बात नहीं। यह उनका काम है जो स्वतन्त्र चिन्तन के साथ-साथ फील्ड वर्क के अथक परिश्रम और धरातली लोगों के जीवन के निरन्तर निरीक्षण को अपने सम्पूर्ण जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।’’ मध्यप्रदेश के झाबुआ और राजस्थान के उदयपुर-पाली अरावली पर्वतांचल के क्रमशः मामाभील व गरासियों में एक परम्परा है जिसे ‘भगोरिया’ कहते हैं। पारम्परिक मेलों के अवसर पर जो आदिवासी इकट्ठा होते हैं, उनमें अविवाहित युवक-युवतियों की संख्या काफी होती है। मेले के उत्सव-उमंग, नाच-गान व मौज-मस्ती में वे उल्लास के साथ भाग लेते हैं। इस दौरान जान-पहचान व दोस्ती होती है। विपरीत लिंगाकर्षण से उत्पन्न स्वाभाविक प्रीति भी पनपती है। जो युगल शादी करने का मानस बना लेते हैं वे मेला स्थल से भाग कर ऊँची पहाड़ियों पर चढ़ जाते हैं और वहाँ से अपने ‘एक हो जाने‘ का एलान करते हैं। सम्बन्धित युवक-युवतियों के परिवार व सम्बन्धियों में बुजुर्ग लोगों को यह पता चलता है तो वे गोत आदि व पृष्ठभूमि की कोई वैमनस्यता की बाधा न होने पर शादी की स्वीकृति दे देते हैं तो वे युगल वापस मेले में आ जाते हैं और वहीं सगाई की रस्म निभा दी जाती है। यदि बुजुर्ग किसी कारणवश शादी से इन्कार कर देते हैं तो वे युवक-युवतियों के जोड़े दूर भाग जाते हैं और ब्याह रचाकर घर बसा लेते हैं। दोनों की स्थितियों में मेला स्थल से भाग जाने की वजह से इस परम्परा को ‘भगोरिया’ नाम दिया गया है। छत्तीसगढ़ के मुड़िया और झारखण्ड के मुण्डा व अन्य आदिवासियों में ‘घोटुल’ की प्रथा को बाकायदा परम्परागत मान्यता दी हुई है। ‘घोटुल’ अर्थात् सामूहिक वास-स्थल। प्रथा का लक्ष्य सामूहिक जीवन शैली के संस्कार विकसित करना रहा है। इस बहुआयामी गतिविधि का एक पक्ष यह भी है कि स्थानीय आदिवासी युवक युवतियाँ अपनी मनपसंद और सहमति के आधार पर ‘घोटुल’ में यौन-सम्बन्ध बनाते हैं और इसके बाद मनपसंद जोड़े बनाकर शादी के लिए सहमति देते हैं जिसे अन्यथा कोई कारण सामने न आये तो समाज स्वीकार करता है। मनपसन्दगी से प्रेम और विवाह की ‘भगोरिया‘ व ‘घोटुल‘ जैसी परम्पराएँ उदात्त सांस्कृतिक जीवन के उदाहरण हैं जिन्हें तथाकथित सभ्य समाज उल्टे नजरिये से देखता है। उस तथाकथित सभ्य समाज के भीतर कितनी यौन विकृतियाँ एवं अपराध पनपते हैं, यह नहीं देखा जाता। यही वजह है कि मुख्य धारा के समाज में पैदा हुए नारी मुक्ति आंदोलन स्वतन्त्रता के नाम पर उच्छृंखलता पैदा करते हैं जबकि आदिवासी परम्परा में स्त्री को सकारात्मक स्वतन्त्रता भोगने का अवसर मिलता है और स्त्री व पुरुष के मध्य असमानता की भावना नहीं दिखती। जिन लोगों को ’भगोरिया’ एवं ’घोटुल’ जैसी आदिवासी प्रथाओं का बोध नहीं वे इन प्रथाओं को अपनी संकुचित मानसिकता से देखते हैं। ‘भगोरिया‘ को संस्थागत समाज के नियमों के विरूद्ध मानेंगे। मुख्य धारा से जुड़ी लड़की के घरवाले लड़के के विरूद्ध अपहरण का मुकद्मा दर्ज कराकर लड़की की बरामदगी के लिए पुलिस पर दबाव डालेंगंे चाहे लड़की बालिग ही हो और अपनी सहमति से गयी हो। आदिवासी समाज विवाह की स्वीकृति देगा, यदि उनकी परम्परा के हिसाब से अन्यथा कोई कारण अड़चन के रूप में सामने न आयंे। यहाँ जवान लड़की की इच्छा भी उतना ही सम्मान पाती है जितनी लड़के की इच्छा। ’घोटुल’ को तथाकथित मुख्य धारा का आदमी सामूहिक व्यभिचार के रूप मेें ’अनैतिकता’ की संज्ञा देगा। उसके समाज में व्यभिचार पनप रहा हो, उस पर खुलकर चर्चा नहीं करना चाहेगा। प्रश्न उठता है कि ’घोटुल’ कहंा तक अनैतिक एवं समाज विरोधी कृत्य है ? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए इस परम्परा की गहराई में जाने की आवश्यकता है। यहाँ मुझे यूनान के महान् दार्शनिक प्लेटो के दर्शन की वह व्यवस्था याद आ रही है जब वे आदर्श शासन व्यवस्था संचालित करने के लिए ’दार्शनिक राजा’ की अवधारण पर चर्चा करते हंै और साथ ही उसके शासक वर्ग की जिसमें प्रत्येक विभाग के दायित्व को संभालने के लिए हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर एवं क्षमतावान कर्मियों का समूह हो। ऐसा समूह कैसे पैदा किया जाये ? यह प्लेटो की समस्या थी। उसने समाधान खोजा। नगर-राज्य (बपजल ेजंजम) में उपलब्ध स्वस्थ एवं सुन्दर युवक-युवतियों का चयन किया जाये और उन्हें नियत सामूहिक आवास (घोटुल जैसे) में रहने दें। खूब खिलाया-पिलाया जाय। खेल-कूद व अन्य शारीरिक अभ्यास कराया जाये और मुक्त यौन सम्बंध स्थापित करने की छूट दी जाये। प्लेटोे का समाधान था युवतियाँ गर्भवती हों और यह न जान सकें कि किस युवक का बच्चा किस युवती की कोख में पनप रहा है। प्रसवोपरांत शिशुओं का लालन-पालन भी सामूहिक हो। मां भी अपने बालक की पहचान न कर सके। प्लेटो को आशा थी कि ऐसा करने से एक तो श्रेष्ठ शरीर एवं मस्तिष्क वाले व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें बाल्यावस्था से ही शासन संचालन एवं युद्व-कौशल की शिक्षा दी जायेगी ताकि उनकी मनसा के मुताबिक शासन एवं सेना के नायक उपलब्ध हो सकें। दूसरे, यह विशिष्ट व्यक्ति-समूह वंश के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा चूँकि वे तो मां बाप को भी नहीं जानते -पहचानते, वंश-कुल की बात तो दूर। यह अवधारणा प्लेटो के ’आदिम साम्यवाद’ का हिस्सा थी। ’अच्छे आदमी की खोज’ प्लेटो की मूल समस्या थी। ’नगर-राज्य’ व्यवस्था का आदर्श संचालन उनका एक मात्र लक्ष्य था। उक्तानुसार समाधान भी प्लेटो ने जटिल ही ढूँढा। साधारण बुद्धि वाले व्यक्ति के गले यह समाधान आसानी से नहीं उतरता। इसलिए व्यंगात्मक लहजे में प्लेटो को ’अफलातून’ की संज्ञा दी जाती है। अब आदिवासी ’भगोरिया’ व ’घोटुल’ पर आ जाइये । प्लेटो के यहाँ श्रेष्ठ संतानेात्पत्ति की बात दर्शन में थी जहाँ निश्चित रूप से संतानोत्पत्ति केन्द्र में थी। ‘भगोरिया‘ व ‘घोटुल‘ में यौन सम्बन्ध बाद की बात है। पहले मिलन, परिचय, प्रेम हैं। परस्पर समझना महत्वपूर्ण है। आशय यह है कि परस्पर समझ के आधार पर जीवन भर साथ निभाने की संभावनाएँ कहँा तक बनती हैं। इसलिए साथ रहने या रखे जाने की सुविधा प्रदान करने की प्रथा को सामाजिक स्वीकृति दी गयी। प्रेम-सम्बन्धों की परिणति प्रायः यौन-सम्बन्धों में होती रही है। आरम्भ यौनाचार न हो कर परिचय, समझ और प्रेम होने तक की प्रक्रिया है जो किस मिलन-क्षण पैदा हुई, वह सम्बन्धित युवक-युवती ही जान सकते हैं या कोई उनके पीछे लगा चितेरा। ‘भगोरिया‘ एवं ‘घोटुल‘ की सुविधाजनक प्रथा थी। प्रथानुकूल सुविधा से उत्पन्न वैवाहिक जीवन भी आदिवासियों में स्थायी नहीं अगर बात नहीं बनीं। जीवन-पथ के किसी मोड़ पर अनबन हो गयी और किसी कारण-वश साथ रहना संभव नहीं, तो सम्बन्ध विच्छेद होने का विकल्प है जिसकी एक व्यवस्था है। स्त्री स्वेच्छा से अन्य पुरूष का वरण कर सकती है। आदिवासी संस्कृति के इस पक्ष को सही रूप में देखा परखा जाये और अंगीकार किया जाये तो शेष समाज में व्याप्त अन्य किस्म की पारिवारिक-सामाजिक विकृतियों से बचा जा सकता है । आदिवासी समाज की तुलना मंें नारी उत्पीड़न की दर्ज या गैर-दर्ज घटनाओं की संख्या तथाकथित मुख्य धारा के समाज में कई गुणा हैं। इस विषय पर गम्भीरता से सोचा जाना चाहिए। मुझे क्रोधाविष्ट हँसी की प्रतिक्रिया हुई जब मैंने एक जगह पढ़ा कि शराब पीकर जब आदिवासी पुरूष अपनी औरत को पीटता है तो वह औरत आनन्द की अनुभूति करती है। प्रताड़ना आनन्द का स्रोत किसी भी प्राणी के लिए नहीं हो सकता। यह उस लेखक की अज्ञानता और विकृत मानसिकता से उत्पन्न कल्पना थी। हकीकत तो यह है कि आदिवासी स्त्री पर उसका पति हाथ उठायेगा तो वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देती है। यूँ अपवादों की हकीकत से सहमत हुआ जा सकता है। आदिवासी समाज मंे संस्कृति एक सहज व सतत प्रवाहित धारा है, किसी आंदोलन या अभियान का विषय नहीं। डा. श्याम सुंदर दुबे के ये शब्द मुझे सटीक लगते हैं - ‘‘आदिवासी (सांस्कृतिक) परंपरा सतत विकसित मूल्य बोध है। पीढ़ी दर पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है।’’ आदिवासी सतत सांस्कृतिक परंपरा में ‘नया जुड़ना’ एक सहज प्रक्रिया है। आदिवासी लोक गीत परंपरा में विषय-वस्तु ;बवदजमदजद्ध के स्तर पर वनोपज, कृषि-कर्म, श्रम, पालतू पशु-पक्षी, पर्व-उत्सव, शादी-ब्याह, जन्म-मृत्यु, पनघट, घरेलू औजार-पाती, पुरखे, मिथक, गणचिन्ह, प्रकृति, ऋतुएँ, मानवतेर अन्य प्राणी-जगत, प्रेम-प्रसंग, आत्म सम्मान के लिए विरोध-संघर्ष-बलिदान आदि तो रहते आये ही हैं, जमाने के बदलाव के साथ नयी बातें भी जुड़ती गयीं। आजादी के बाद प्रजातान्त्रिक व्यवस्था लागू हुई। वोट देना नयी बात आयी जो पहले नहीं थी। मीणा आदिवासी समाज की स्त्रियों ने इसे गीत में शामिल निम्न प्रकार किया - ‘‘वोट देवा चालेंगा जोड़ा सू जूती खोलेंगा......’’ शिक्षा का प्रसार हुआ। जैसा पहले संदर्भ दिया कि हिन्दुत्व के प्रभाव से बाल-विवाह जैसी बुराइयों ने जन्म लिया। मीणा लड़की का बाल विवाह हो जाता है। पति पढ़ रहा है। अभी साथ रहने का समय नहीं है। लड़की भी पढ़ना चाहती है। साथ रहने का भाव प्रबल है। लोकगीत रचा जाता है - ‘‘नयो बण्यो इस्कूल जे को सीदो रसतो(रास्ता) पढबा में भी चालूँ सायब थारो लेऽऽ बसतो(स्कूल बैग)......’’ अब गीतों में ट्रेक्टर, कूलर, टी.वी., मारुति कार, मोबाइल भी आने लगे हैं। कम्प्यूटर भी आयेगा। ग्लोबलाइजेशन के बारे में जितनी सतही जानकारी आदिवासियों को मिलेगी, वे अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में उसे शामिल करते रहेंगे, लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि ग्लोबलाइजेशन के लाभ (अगर आमजन के लिए हैं तो) उनके जीवन का हिस्सा कब बनेंगे ? परम्परागत आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का प्रश्न उठाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि प्रगति व विकास की धारा में मौलिक संस्कृति में परिवर्तन होना अनिवार्य है। लोग यह भी कहते हैं कि मौलिकता को बचानेे के चक्कर में विकास अवरुद्ध होता है। यहाँ ये सारी बातें अहम् नहीं। अहम् मुद्दा मौलिक संस्कृति के संरक्षण का नहीं। ऐसा सोचना जड़ता का आभास देता है। आदिवासी जीवन दर्शन में निरन्तरता एवं गत्यात्मकता ;कलदंउपेउद्ध रही है। यही वजह है कि इस संस्कृति के शास्त्रीय प्रतिमान नहीं बनाये जा सकते। परम्परा की धारा में कौन, क्या जोड़ता जा रहा है, यह अज्ञात रहता है। सृजनकर्ता पहचान के पीछे नहीं भागता। रचना सामूहिकता में रम जाती है। व्यक्तिवाद को यहाँ स्थान नहीं। शास्त्रीय प्रतिमानों की स्थापनाएँ प्रवहमान परम्परा की यात्रा में स्थगन पैदा करती हैं। आदिवासी संस्कृति इतनी खुली रही है कि विकास के सुखदायक पहलुओं को आत्मसात् करती हुई समृद्ध होती जायेगी। इसलिए विकास के साथ इसका विरोध हो ही नहीं सकता। प्रश्न यह है कि विकास का माॅडल कैसा हो जो आदिवासी संस्कृति से तालमेल बिठाता अग्रसर होे? शिक्षा को लेकर अत्यल्प बात की जा सकती है चूंकि शिक्षा संस्कृति का सृजन उत्प्रेरक भी है और संवाहक भी। आदिवासी को जब आप हम विकास की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करंेगे तो सांस्कृतिक संतरण की लहरों पर से गुजरना होगा। इस स्थिति के बावजूद संस्कृति का गत्यात्मक अग्रसरण सम्भव है यदि विकसित हो रही आदिवासी पीढी को उसकी मातृभाषा (बोली?) के साथ लेाकप्रिय माध्यम की भाषा में शिक्षित किया जाये। यह लोकप्रिय माध्यम हिन्दी और अन्य तकनीक की दृष्टि से अंग्रेजी (ग्लोबल संदर्भ में) हो सकती है। यहां भाषा का कोई विरोध नहीं। आदिवासी पुश्तैनी ज्ञान एवं संस्कृति से सम्बन्धित जो भी जिस रूप में (लिखित या मौखिक) उपलब्ध है उसे लोकप्रिय माध्यम (भाषेतर मीडिया भी) में अनूदित पुनर्सृजित कर शिक्षा की पाठ्य-वस्तु में शामिल किया जाना चाहिये ताकि आदिवासी गल्प, मुहावरे, उपमाएं, प्रतीक, मिथक, पहेलियां, संकेत, बिम्ब, आस्थाएं, मान्यताएं, स्मृतियां, स्वप्न, आकांक्षाएं, विश्वास- कुल मिलाकर अदृश्य मनोविज्ञान और दृश्य व्यवहार की जानकारी आदिवासी नयी पीढी और साथ ही गैर आदिवासी ग्लोबल जनरेशन को मिल सके। अगर ऐसा होता है तो साइबर एज की डिजीटल शब्द गूंज के साथ आदिवासी संस्कृति के मांदल बांसुरी नाद-सौंदर्य की जुगलबंदी सम्भव हो सकेगी। धर्म संस्कृति को लेकर एक अन्य संदर्भ। अप्रैल 2003 में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यकारों के सम्मेलन के दौरान रांची में लक्ष्मण गायकवाड़ एवं वाहरू सोनवणे के साथ ऐसे ही मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। वाहरू ने एक किस्सा सुनाया। महाराष्ट्र गुजरात सीमा पर स्थानीय आदिवासियों की याहा मोगी देवी का मंदिर है। वहाँ अच्छा खासा वार्षिक मेला लगता है। यह गुजरात दंगों के बाद का समय था । तथाकथित मुख्यधारा से जुड़े धर्म के कुछ ठेकेदार वहां पहंुचे और आदिवासी मुखियाओं के सामने प्रस्ताव रखा कि याहा मोगी जगदंबा माँ का ही रूप है अतः वैदिक पद्धति से इसकी पूजा अर्चना की जावे और पुजारी के रूप में अच्छे पंडित को बिठाया जावे। हम भी जुड़ जावेंगे और भव्य मंदिर बनवायेंगे ताकि देवी की ख्याति दूर-दूर तक पहुंच सके। समझदार आदिवासी मुखियाओं ने जवाब दिया कि जब याहा मोगी जगदंबा का ही रूप है तो बजाय ऐसा करने के भारत के सभी जगदंबा मंदिरों की पूजा पद्धति याहा योगी जैसी आदिवासियों की सी क्यांे न कर दी जावे। इस परिप्रेक्ष्य में तीन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वे हैं देव-देवी, देवालय, और पूजा पद्धति। आदिवासी या तो प्रकृति तत्व के रूप में उनके गणचिन्हों (जवजमउ) की पूजा करते हैं या लोक देवी देवताओं के रूप में उनके महान पुरखों की । ये दोनों आकाशीय एवं अमूत्र्त तत्व न होकर उनके निकटस्थ तत्व रहे हैं। उनके देवालय साधारण से स्थल यथा पहाड़ी चोटी, पेड़ का उभरा हुआ जड़-स्थल या देवला (चबूतरा) होते हैं। और पूजा विधि अत्यंत सरल व सहज। सोलह शृंगारी मूल्यवान प्रतिमाएं, भव्य मंदिर, और जटिल कर्मकांडों को वहां स्थान नहीं। उनके धर्मस्थल व्यावसायिक केन्द्र नहीं बनते। जैसा वे खाते हैं, पीते हैं वैसा ही चढावा देव-देवी के सामने अर्पित किया जाता है। दिखावटीपन कहीं नहीं होता। ऐसा सहज धर्म उनकी संस्कृति को समृद्ध बनाता है। न धर्म उन पर हावी होता है और न वे धर्म के ठेकेदार बनते हैं। यही खास वजह है कि आदिवासी धर्म साम्प्रदायिकता का जहर नहीं फैलाता। ऐसी धार्मिक मान्यताएं यह सीख देती हैं कि जो धर्म उन्माद फैलाकर मनुष्य विरोधी बन जाता है उसे तत्काल त्याग देना चाहिए। जवाहर लाल नेहरू ने कहा है ‘‘आदिवासियों में मुझे कई ऐसे गुण दिखाई दिये जो भारत के मैदानी इलाकों, शहरों और अन्य भागों में रहने वालों में नहीं हैं। इन्हीं गुणों के कारण मैं आकृष्ट हुआ। आदिवासियों के प्रति हमारा रवैया आदानशील होना चाहिए। इन लोगों में बहुत अनुशासन है और वे भारत में अधिकांश लोगों की तुलना में कहीं अधिक लोकतांत्रिक हैं।‘‘ आदिवासी जन में ऐसे मूल्य कहां से विकसित हुुए ? इस प्रश्न का उत्तर फ्रेेडरिक एंगेल्स ने बहुत पहले यह कह कर दिया था कि ‘‘आदिवासी समाज का वैभव और बंधन इसी बात में था कि उसमें कोई शासक और शासित नहीं था।‘‘ डाॅ0 डी0 पी0 चट्टोपाध्याय ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लोकायत‘ में स्पष्ट किया है कि ‘‘....गण, प्रांत, संघ, पुग, श्रेणी ये सभी शब्द एक दूसरे के पर्याय थे। मानव समाज व्यवस्था के संदर्भ में इनसे जिस सामूहिकता का संकेत मिलता है उसका सीधा सा अर्थ था आदिवासी सामूहिकता।‘‘ समानता एवं सामूहिकता के जिन गुणों पर पं नेहरू, एंगेल्स, एवं चट्टोपाध्याय ने जोर दिया, उसी क्रम में श्रम की महत्ता आदिवासी संस्कृति का एक स्तम्भ रहा है। ‘भद्र समाज के पास ये गुण नहीं थे और अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनी थी, इसलिए शारीरिक श्रम की तुलना बुद्धि वैभव से की गई और उसी काल खण्ड (वह आर्य विजेताओं का अनार्य-जन पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का समय था।) में जिस श्रम प्रक्रिया का समायोजन मानव मस्तिष्क ने किया था, उसी को वह दूसरों से करवाना चाहता था और स्वयं उस श्रम से बचना चाहता था। .........परवर्ती काल में भी पातंजली व भट्टोजि जैसे विद्वानों ने अपने आसपास के आदिवासी जीवन को केवल घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से ही देखा।‘ (वही) इस उत्तर आधुनिक दौर में विकास के जिस भू-मण्डलीकृत माॅडल का जो ढोल पीटा जा रहा है वहां पूंजी केन्द्र में है और पूंजी उग्र व्यक्तिवाद से पनपती है। ऐसा व्यक्तिवाद स्वार्थ केन्द्रित होता है चाहे वह व्यक्ति विशेष हो या बहुराष्ट्रिक कम्पनी। जिस ग्लोबल विलेज की अवधारणा को आदर्श के रूप में हमारे सामने प्रचारित किया जा रहा है वह ऐसा विकसित आदिवासी गांव नहीं होगा जहां जंगल, प्रकृति व मानवेतर प्राणीजगत का सह अस्तित्व एवं भावनात्मक संबंध दिखे। ग्लोबल विलेज अपनी तरह का होगा जिसमें बहुमंजिला इमारतें , अत्याधुनिक संचार सुविधाएं, उच्च तकनीकी, यातायात के साधन, विज्ञापनों से भरे बाजार, शेयर मार्केट की स्क्रीन व केप्शन, नितांत व्यावसायिक मिडिया, अंग्रेजीदां पीढी, मल्टीप्लेक्स सिनेमा, डिस्को-बार और वगैरहा वगैरहा सब कुछ होगा, जिसके माॅडल होंगे पेरिस, न्यूयार्क, टोकियो, सिंगापुर, बैंकाक, मुम्बईं, दिल्ली। ऐसे विलेज से आम आदमी का निष्कासन होगा और प्रवेश वर्जित। आदिवासी तो अछूत ही बन जायेगा। पूंजी का व्यक्तिवाद के संदर्भ में संम्पत्ति को लेकर यह सर्वमान्य तर्क दिया जाता है कि अमुक सम्पत्ति मेरी इसलिए है कि यह वंशानुगत है या मेरे द्वारा क्रय की हुई या अर्जित (खरीद के अलावा अन्यान्य तरीके भी हैं सम्पत्ति अर्जन के जो सब घोटालों की श्रेणी में आने चाहिए लेकिन नहीं आते) की हुई। आदिवासियों के संदर्भ में यही तर्क क्यों नहीं लागू किया जाता ? क्यों नहीं कहा जाता कि जल, जंगल, जमीन पर उनका पुश्तेैनी और सामूहिक हक रहा है, इसलिए यह सम्पदा उनके खाते में दर्ज की जानी चाहिए । अगर व्यवस्थापकों का ऐसा दृष्टिकोण और योजनाएं और उनके क्रियान्वन का संकल्प हो तो सम्पूर्ण समाज की बस्तियां ऐसी बस्तियां होती जहां समस्त अत्याधुनिक सुविधाआंे के साथ साथ मनुष्य और प्रकृति के समस्त सरोकार सार्थक रुप में अस्तित्व में रहते और सहजता, सततता, गत्यात्मकता, सामूहिकता तथा सर्वहितकारी भाव संरक्षित रहता। किसी भी तरह के भेद भाव विहीन समृद्ध संस्कृति की विकासमयी धरोहर जीवन की भावी यात्रा के लिए ऊर्जा के रुप में हमेें मिलती रहती। यह सब तब संभव है जब बुश व बिल गेट्सों को माॅडल मानने वाले राज नायकांे, तकनीशियनों, समाज अभियंताआंे, प्रबंधकों, की जगह योजनाएं बनाने वाले नायक वैज्ञानिक, इतिहासकार, अर्थशास्त्री, समाज वैज्ञानिक, संस्कृतिकर्मी एवं अन्य बुद्धिजीवी हों जो जानते हों कि मानव समाज की परम्परा का ठोस आधार और लोक-चेतना की नींव आदिवासी जीवन-दर्शन में है जो मूलभूत आदिम (आदमी अर्थात् इन्सान के अर्थ में) सरोकारों से भरपूर है। यहां मुद्दा सार्वभौमिक, सार्वजनिक और सार्वकालिक मूल्यों का है जो आदिवासी संस्कृति के गुण हैं। इसलिए सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में परिवर्तन अनिवार्य होगा। वह नहीं रूक सकता और उसे रोकना भी नहीं चाहिए । कंटेन्ट भी बदलेगा एवं अभिव्यक्ति के तौर-तरीके भी। संस्कृति केवल अभिव्यक्त होने वाली विधा ही नहीं है, वह जीवन-शैली है और अंततः जीवन-दर्शन। इसलिए ध्यान देना चाहिए कि जब आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की बात चलती है तो आदिवासी संस्कृति को ‘स्थायी म्यूजियम‘ नहीं बनना प्रत्युत उसमें समाहित यूनीवर्सल वेल्यूज को संरक्षित और आत्मसात करना महत्वपूर्ण है। भौतिक समृद्धि सर्वजनहितायः और सार्थक तभी सम्भव हो सकती है जब संवेदनशील और मूल्याधारित संस्कृति के ढांचे पर खड़ी हो। बेहद परिश्रम और गहन विचार मंथन के बाद निर्मित भारतीय संविधान की दृष्टि से देखा जाये तो भारतीय समाज का एक शानदार और जानदार चित्रण हमें मिलता है। आरक्षण के प्रावधानों पर चर्चा के बाद संविधान निर्माताओं के मध्य जो सहमति बनी थी और जिसे अंतिम रूप दिया गया, तब परम्परागत रूप से वर्चस्वकारी, सुविधाभोगी, एवं भौतिक दृष्टि से समृद्ध वर्ग को अलग माना गया। इसमें से जो सामाजिक तबके पिछड़ेपन के शिकार रहे उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग मानकर आरक्षण की सीमित (आर्थिक स्तर पर) सुविधाओं की खिड़कियां खुली छोड़ी गयी जिनकी क्रियान्विति मंडल आयोग के बाद हुई। इन दोनों श्रेणियों को क्लास (वर्ग) की संज्ञा दी गई। सामाजिक आर्थिक स्तर पर निम्न स्तर का जीवन जीने को बाध्य की जाती रही जातियों को अनुसूचित जाति (बंेजम) की अवधारणा के रूप में चिन्हित किया गया। आदिवासी केवल आदिवासी ;जतपइमद्ध रहा। क्षमा करें, ट्राइब का हिन्दी अनुवाद ‘जनजाति’ गलत है चूंकि आदिवासी समाज में जाति की कोई अवधारणा नहीं रही। आदिवासियों के भिन्न-भिन्न नाम या संज्ञाएं उनके अंचल, गणचिन्ह, गोत्र, वंश, प्रजाति आदि पर आधारित रहे हैं। यह एक मात्र समाज है जो वर्ग व जाति की अवधारणा को अपने यहाँ स्थान नहीं देता। अगर वर्ग व जातिविहीन समाज के इस उपलब्ध सूत्र को पहचान कर अंगीकार कर लिया जाता है तो राष्ट्रीय एकीकरण और तनावविहीन समाज के लिए इस से बढिया कोई विकल्प आज हमारे सामने नहीं है। इसलिए सामूहिकता और सह-अस्तित्व आदिवासी संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। इस पक्ष का एक अन्य उपांग है। वह यह कि धर्म के नाम पर आदिवासी समाज में किसी प्रकार के समुदाय का नहीं होना। आतंकवाद देश की अखण्डता के लिए सबसे बड़ा खतरा एवं चुनौती है। आतंकवाद जिस जमीन पर पैदा होता है, भारतीय संन्दर्भ में वह जमीन जाति, वर्ग और सम्प्रदाय की है। आतंकवाद के जनक इन तीनों कारकों को नष्ट करने के लिए आदिवासी संस्कृति की उपरोक्त विशिष्टता को सार्वजनिक स्तर पर अंगीकार किया जाना आज नितांत अनिवार्य है। आज भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के सामने दूसरी बड़ी समस्या है तो वह है पर्यावरण संतुलन की। भारतीय संस्कृति ही क्या, विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में पर्यावरण संतुलन के सूत्र खोजे जा सकते हैं । ऐसे सूत्रांे के होने का आधारभूत कारण उन संस्कृतियों के आदिम सरोकार है जो आदिवासियों का प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण का ही प्रमाण हैं। देखने वाली बात यह है कि ऐसी संस्कृतियों को महान और गौरवशाली मानने वालों के मन में पर्यावरण संतुलन के प्रति चेतना कितनी है। अगर वह अपेक्षित स्तरीय होती तो हमें इस समस्या का सामना नहीं करना पड़ता। आदिवासी समाज में आज भी वह चेतना जीवित है। भारतीय संदर्भ में, भौतिक दृष्टि से सर्वाधिक पिछड़़े और आदिम शैली का जीवन जीने वाले अण्डमान के आदिवासियों का दृष्टांत हम देख सकते हैं। जारवा और सेंटेनली जैसी दो प्रजातियाँ हैं वहाँै। अलग-थलग जंगलों में रहते हैं इन प्रजातियों के लोग। गैर आदिवासियों को वे शत्रु मानते है चूँकि उन्होेंने बहुत सताया इतिहास में इन आदिवासियों को । सन् 1859 की अबेर्दीन की लड़ाई ताजा ऐतिहासिक वास्तविकता है। वे आदिवासी अभी भी पका हुआ खाना नहीं खाते, कपड़े नहीं पहनते, कृषि या बागवानी या कोई और कुटीर उद्योग-उत्पादन नहीं करते, झांेपड़ी नहीं बनाते, सम्पत्ति की अवधारणा से कोसों दूर हैं। लेकिन जो बहुतायत में प्रकृति से उपलब्ध है उसे इस्तेमाल करते हैं और जो कमतर हो उसका संरक्षण । उदाहरणार्थ, हिरण कम हंै। उनमें मृतक बुजुर्गों की आत्मा का वास मानते हंै। सुअर अधिक हैं। उन्हें खाते हैं। हरियल (हरा कबूतर) कम हैं। उनमें पैदा होने वाले शिशुओं की आत्मा का वास मानते हैं । इसलिए पवित्र दृष्टि से देखते हंै। तीतर -बटेर खूब हैं। उनका शिकार करते हंै। नीले रंग की स्टार फिश विरली हैं। उनमें आदि मां परी का रूप देखते हैं। एक प्रकार से पूजनीय मानते हैं उन्हें । अन्य रंग (भूरे, मटमैले) की स्टार फिश उनका भोजन है। जब सूनामी आया था तो चैबीस घण्टा पहले समुद्र के भीतर की हलचल को भाँप कर पहाड़ियों पर चढ़ गये थे वे आदिवासी और अंडमानी टापुओं में मृतकों की संख्या कम थी। निकोबार में जरूर बहुतायत में लोग मरे थे। वजह थी पहाड़ियों की ऊँचाई कम होना। प्रकृति के संकेतों का पूर्वाभास उन आदिवासियों को हो जाता है। प्रकृति के सगे हैं वे। इसलिए पर्यावरणीय चेतना उनके भीतर है। यह भी आदिवासी समाज से सीखा जा सकता है। और भी बहुतेरी विशेषताएं हंै उस संस्कृति में मगर कोई अध्ययन तो करे। प्रगतिशील विकास की प्रक्रिया के साथ आदिवासी शेष समाज के सम्पर्क में आयेगा। उसका कुछ अपना छूटेगा कुछ नया आत्मसात होगा। सांस्कृतिक यात्रा में अन्तक्र्रियात्मकता एवं परस्पर प्रभाव एक स्वाभाविक परिघटना है। दिशा अगर सकारात्मक है तो यह आदान-प्रदान सुखद होगा अन्यथा अपसंस्कृति का जनक। यहां सतर्कता व सावधानी काम नहीं आती, मूल्य बोध महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। मूल्य बोध से तात्पर्य - बौद्धिक सजगता नहीं, प्रत्युत वातावरण व मनोदशा से है जहां संस्कृति की सुखद और स्वतः स्फूर्त मौलिकता बची रह सके। इस वैचारिक विश्लेषण को वास्तविक दृष्टांतों से समझा जा सकता है। संस्कृति की आकर्षक एवं मनोरंजक अभिव्यक्ति गीत, नृत्यांे और अन्य कला-कृतियों में देखी जा सकती है। राजस्थान- गुजरात के ‘गवरी‘ व ‘गेर‘ जैसे आदिवासी संगीत नृत्यों का उदाहरण लें। इस विधा के रूपों की एक अभिव्यक्ति परंपरागत है जहां प्रकृति के खुले आंगन और नियत पर्वावधियों में ये नृत्य होते रहे हैं। प्रस्तुति स्वतःस्फूर्त मिलेगी। उत्साह- उमंग- उल्लास सहज भावाभिव्यक्ति के रूप में कलाकारों और दर्शकों को बांधने में सफल होगा। दूसरी प्रस्तुति प्रायोजित हो सकती है। हेरीटेज होटलों और सरकारी व गैर-सरकारी पर्यटन, मेला-उत्सवों में ऐसे आयोजन किये जाते हैं तब परायों के सामने उनका मनोरंजन एकमात्र लक्ष्य होता है ताकि आयोजन का व्यावसायीकरण किया जाकर आमदनी की जा सके। भव्य व्यवस्थाओं और मजेदार खान-पान के बीच होने वाले ऐसे आयोजनों में कलाकार सजगता, बन्धन और दबाव के बीच अपनी कला के प्रदर्शन के लिए या दो पैसा कमाने की जुगाड़ की विवशता की मानसिकता में होगा। वह अपनी कला का सफल प्रदर्शन करने का प्रयास करेगा लेकिन कृत्रिम और पराये माहौल में वह भीतर से पूरी तरह स्वयं को अभिव्यक्त करने की स्थिति में हो ही नहीं सकता। कला की अभिव्यक्ति उसके जीवन का हिस्सा नहीं रह कर अन्य के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत की जा रही है। स्वार्जित कला की अभिव्यक्ति और अन्य हेतु उसकी प्रस्तुति में बहुत अंतर होगा। प्रस्तुति पराये दर्शकों के लिए विलक्षण, अचरजभरी व मनोरंजक हो सकती है लेकिन वे दर्शक कलाकार के अपने लोग नहीं और न ही वातावरण व परिवेश उसका अपना। जब तक वह अपनी धरती, परिवेश, वातावरण, मनोदशा और अपने जैसे लोगों के बीच महसूस नहीं करेगा तब तक खुलकर अपनी कलाभिव्यक्ति कर पाने की स्थिति में नहीं होगा। हमें यह समझना चाहिए कि कलाकार भोग, उपभोग का सामान न होकर गरिमामय मनुष्य होता है। आयोजन के दौरान मजे लेना और मनोरंजित होना अलग बात है तथा भाव-विभोर होकर एकमेक हो जाना सर्वथा पृथक। इस विमर्श से आदिवासी संस्कृति के भद्रीकरण की विरूपित स्थिति स्पष्ट होती है। यहां विरोध सांस्कृतिक आयोजन स्थलों का भी नहीं, विरोध है नजरिये का। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को वैभव व विलास की दृष्टि से नहीं देखकर सांस्कृतिक मूल्यों (जिनकी चर्चा पहले की गई) के सम्मान और आत्मसात करने के दृष्टिकोण और ध्येय को ध्यान में रखकर देखना चाहिए तभी ऐसी संस्कृति मानव-चित्त में रमेगी व बसेगी और संरक्षित रहेगी। ध्यातव्य यह है कि सांस्कृतिक आयोजन सांस्कृृतिक मूल्यों के संवाही होते हैं। अगर सांस्कृतिक मूल्य जीवन का आधार, प्रेरणा, व उर्जा नहीं बनते तो आयोजनों की कोई उपयोगिता नहीं। सांस्कृतिक कार्यक्रम मात्र मनोरंजन के ‘एपीसोड‘ नहीं बल्कि सार्थक जीवन-यात्रा के छोेटे-छोटे पडा़व हैं- सतत अग्रगामी प्रवाह के परस्पर जुडे़ हुए अंश। जिन मानव-समुदायों का लम्बा अतीत होता है उनकी स्वतंत्र संस्कृतियां होती हैं। ये सभी संस्कृतियां मिलकर किसी राष्ट्र या बड़े समाज की समग्र संस्कृति बनाती हैं। किसी संस्कृति को आदर्श ढांचे के रूप में स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है। आदर्श ढांचों का दावा मूल्यपरक (सापेक्ष) होता है वस्तुनिष्ठ (निरपेक्ष) कभी नहीं। इसलिए किसी संस्कृति को ‘माॅडल‘ मान लेना तर्क की विसंगति कहा जायेगा। आदिवासियों के संदर्भ में जब वे किसी बाहरी संस्कृति को माॅडल मानकर चलंेगे तो हीनभावना की मनःस्थिति स्वतः ही पैदा होगी चूंकि तब वे किसी अन्य के पिछलग्गू बन रहे होते हैं। ऐसा करना या होना उनकी मानव गरिमा को ठेस पहुंचायेगा। अगर यह प्रक्रिया गरिमा-केन्द्रित है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। विकास की धारा से जुड़ने की स्थिति में सांस्कृतिक परिवर्तन अनिवार्य होगा। कुछ छूटेगा और कुछ कमोबेश जुड़ेगा। सहज, परंपरागत और वंशानुगत प्रजातीय वृत्ति ;तमबपंस पदेजपदबजद्ध से निर्मित संस्कृति चाहे कितनी भी गत्यात्मक हो उसकी अपनी सीमाएं होती हैं। ये सीमाएं समाज (वृहत्तर अर्थ में) और भौगोलिकता दोनों स्तर की होती हैं। संस्कृति के स्तर पर आदिवासी कितने भी गहरे हों, क्षितिजीय विस्तार का अभाव रहेगा। जैसे उनके निजी परिवेश के जल, जंगल, जमीन व जानवरों के स्वभाव की जानकारी उन्हें गहन हो सकती है, लेकिन बाहर देश दुनिया में क्या कुछ हो रहा है, इससे वे अनभिज्ञ रहेंगे। विवेक ;पदजमससमबजद्ध मनुष्य को आगे ले जाता है। विवेक जिज्ञासा का जनक भी है और परिणाम भी। नन्हें शिशु से बालक बनने की प्रक्रिया पर जरा विचार करें। मां की छाती से चिपका शिशु पालने पर लेटता है। फिर वह अपने पैरों पर खड़ा होकर लड़खड़ाता चलता है। इसके बाद जैसे ही वह घर के बाहर का दृश्य देखता है तो बार-बार जिद करता है कि कोई उसे बाहर गलियों या सड़कों पर घुमाये। वह आनन्दित तो होता ही है, बार-बार नयी चीज या दृश्य के बारे में जिज्ञासा पूर्वक पूछता है। यह प्रक्रिया है ज्ञानार्जन की । मानव विवेक ;ीनउंद पदजमससमबजद्ध के माध्यम से ज्ञान ;ादवूसमकहमद्ध प्राप्त करने की जिज्ञासा। ज्ञान ही मनुष्य को स्वभावगत या थोपी गयी सीमाओं से मुक्ति दिलाता है और ऐसी ही मुक्ति मनुष्य को गरिमामय बनाती है। मनुष्य को गरिमा और मुक्ति चाहिए अर्थात् गरिमामय स्वतंत्रता, जो दूसरे की गरिमा की भी रक्षा करे। मानव जीवन का कोई भी क्षेत्र स्वयं में परिपूर्ण व स्वतन्त्र नहीं। वह अन्य क्षेत्रों का पूरक है। इसलिए संस्कृति और विकास के संदर्भ में बात करेंगे तो आदिवासियों की प्रगति के लिए उनकी संस्कृति और जीवन के अन्य पक्षों की सीमाओं से परे उन्हें जाना होगा तथा ले जाना होगा। इस प्रक्रिया में वैकासिक संस्कृति भी बनेगी जो आदिवासी संस्कृति के परंपरागत माॅडल में संशोधन करेगी। यह संशोधन ऐसे होगा जैसे मेरा घर अब झोंपड़ी न होकर पक्का मकान होगा। भौतिक दशा के अनुरूप उस घर में एकाधिक कमरे होंगे यथा शयन-कक्ष, बैठक, अतिथि-कक्ष, अध्ययन-कक्ष, स्नानागार, बरामदा, रसोई वगैरहा-वगैरहा। मैं इन कक्षों मंे मेरी रूचि अनुसार मेरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली कला कृतियां मांडूंगा और मनमर्जी के पेड़-पौधे लगाऊंगा। और भी कई किस्म की सजावट करूंगा। मगर यह सब निर्भर करेगा मेरी प्राथमिकताओं पर। यह तो झोंपड़ी से पक्के मकान का मुद्दा है। हो सकता है मैं उस मकान में यह सब न करूं। मैं अब उन्नत हो गया। उन्नति का माॅडल मुझे किसी अन्य संस्कृति का भाता है। वह ईसाई, इस्लाम या हिन्दू हो सकता है । मैं वैसा कर सकता हूँ। विवेक इस्तेमाल करने के बाद मैं (विकास के कारण) भौतिक दृष्टि से समृद्ध हो गया। अंततः मैं ग्लोबल ऐज के विज्ञापनों से प्रभावित होकर वैसी संस्कृति अपना सकता हूँ। अब मुझे कोई दोयम दर्जे का इन्सान नहीं समझता। मैं गरिमामय स्वतन्त्र मनुष्य हूँ। मैं अपनी रूचि से जी सकता हूँ। यहां आदिवासी संस्कृति और विकास के मध्य का तथाकथित टकराव स्वतः समाप्त हो जायेगा। प्रश्न यह है कि आप आदिवासी संस्कृति और संस्कृति-वाहक आदिवासियों का कटघरेनुमा म्यूजियम बनाना चाहते हैं या आदिवासियों का भौतिक विकास ? विकसित आदिवासी जैसी चाहेगा वैसी संस्कृति अपनायेगा। यह उस पर छोड़ देने में क्या हर्ज है ? लम्बी संस्कृति की परम्परा कोई भी हो उसमें कुरीतियां, कुप्रथाएँ, अपनी किस्म के कर्मकाण्ड, अंधविश्वास पनपते हैं। आदिवासी समाज भी इनसे मुक्त नहीं है। इन बुराइयों को दूर करने के लिए समय-समय पर सुधार आन्दोलन उस समाज के भीतर चलते रहे और चलेंगे और चलने चाहिए ताकि ’सार सार को गहि रहें, थोथा देई उड़ाय।‘ निष्कर्षतः आदिवासी संस्कृति का ’सार’ क्या है, इसके लिए आदिवासी संस्कृति की कुछ विशिष्टताओें को भद्र संस्कृति से तुलना करते हुए निम्न बिन्दुओं में समाहित किया जा सकता है- व आदिम मूल्यों का संरक्षण आदिवासी संस्कृति का मुख्य ध्येय है जबकि भद्र संस्कृति का रूझान उत्तरोत्तर आधुनिकता की ओर रहता है चाहे वह आधुनिकता भारत जैसे देशों के लिए पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण ही क्यांे न हो। व सामूहिकता आदिवासी संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है। भद्र संस्कृति में अंततः व्यक्तिवाद हावी रहता है। व आदिवासी संस्कृति में जहां सामुदायिक सहयोग एक मुख्य तत्व के रूप में दिखता है वहीं भद्र संस्कृति में व्यक्तिगत स्वार्थ दिखाई देता है। व आदिवासी संस्कृति में व्यावसायिकता नहीं होती है, पारिश्रमिक की बात बिल्कुल अलग है। भद्र संस्कृति में अधिकाधिक लाभ की प्रवृत्ति खुले रूप में सामने आती है। व आदिवासी जीवन में संस्कृति की अभिव्यक्ति सहज, नैसर्गिक व स्वतःस्फूर्त होती है जबकि भद्र संस्कृति में बनावटीपन नजर आता है। व आदिवासी संस्कृति का गहरा संबंध जीवन से होता है। भद्रजन की संस्कृति फैशन व दिखावे के रूप में प्रस्तुत होती है। जीवन का अंग होना और सजावटी होने में जमीन आसमान का अंतर है। व आदिवासी संस्कृति प्रकृति से निकटता से जुड़ी रहती है। इसके विपरीत आभिजात्य संस्कृति का अधिकांश कृत्रिमता लिए होता है। व आदिवासी जीवन में प्रतिमान गढ़कर या शास्त्र रचकर संस्कृति को जड़ नहीं बनाया जाता जबकि कुलीन संस्कृति को व्याकरण में बांधकर जड़ बनाया जाता है जिससे वह जटिल व दुरूह होती रही है। लोक नृत्य और शास्त्रीय नृत्यों के भेद से इसे आसानी से समझा जा सकता है। व आदिवासी संस्कृति का गहरा जुड़ाव श्रम से है। उदाहरणार्थ, फसलों की बुआई-निराई-कटाई से संबंधित नृत्य-गीत सहज रूप में रचित-सृजित होते हैं। इससे भिन्न कुलीन संस्कृति फुरसत की उपज है। फुरसत आलस्य का ही दूसरा नाम है जो मनुष्य की सृजनशीलता का विरोध या कहें नकार है। फुर्सत की निर्मिति एकाकी घटना-क्रम होता है न कि सहज-सृजन। व दोनों संस्कृतियों में एक बड़ा अंतर जो दिखाई देता है वह है अनौपचारिकता एवं औपचारिकता का। अनावश्यक औपचारिकता को भद्र संस्कृति के लिए अनिवार्य माना गया है। उठना-बैठना, खाना-पीना, कपड़े पहनना, यहां तक कि चलना, हंसना, सब कुछ औपचारिक और नपा-तुला। सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान बैठने का क्रम तय करना भी औपचारिकता है, आदिवासी संस्कृति में सब कुछ सहज, भोला, मासूम, ईमानदार दिखता है। व आदिवासी परंपरा में सांस्कृतिक अवदान अर्थात् किस ने क्या जोड़ा या घटाया, यह गुमनाम-अनाम रहता है, जबकि भद्र संस्कृति में सांस्कृतिक अवदाता के नाम की पहचान व ख्याति का आग्रह है। कुछ के अलावा कोई नहीं जानता कि आदिवासी परंपरा के लोकगीत, नृत्य, नौटंकी और भी बहुत कुछ किसने कब रचे। भद्र परंपरा में सांस्कृतिक सृजन का अधिकांश नामजद होता है। भद्र समाज में सांस्कृतिक विकास प्रेरणा केे स्रोतों पर मुख्यतः निर्भर होता है यथा गुरू, ग्रंथ व अन्य अगुवा व्यक्ति और अब मीडिया भी। आदिवासी संस्कृति वास्तविक जीवन पर आधारित होती है। आदर्शों का आग्रह भद्र संस्कृति में होता है जबकि आदिवासी संस्कृति यथार्थ केन्द्रित रहती आयी है। आदिवासी संस्कृति में अधिकांश जन की भागीदारी सृजन में होती है। साधारण सा व्यक्ति कुछ न कुछ रच सकने की क्षमता रखता है, जबकि भद्र परंपरा में संस्कृति के प्रेरक तत्वों की विशिष्ट श्रेणी रहती आयी है जिसकी अलग से पहचान हमें दिखती है। व आदिवासी सांस्कृतिक संसार में प्रकृति-प्रेम, आदिम सौंदर्य-बोध, नृत्य-गीत, कलात्मकता, उत्सव-पर्व-मेले, धार्मिक आस्थाएँ, सामाजिक संस्कार, मिथक, गणचिन्ह, कथा-कहावत-पहेली-मुुहावरे ,खेल-कूद, एवं मनोरंजन की अन्य क्रियाएँ भद्र संस्कृति की तरह फुरसत के क्षणों को भरने वाली चीजें न होकर सम्पूर्ण जीवन, यथा मनोविज्ञान, आचरण, सिद्धांत एवं परंपरा, सृजनात्मकता, मूल्य-व्यवस्था से गहरा संबंध रखने वाली क्रियाशील प्रयोजनधर्मी सहज एवं आत्मीय अभिव्यक्तियाँ हैं। इस परिप्रेक्ष्य में कार्ल माक्र्स ने महत्वपूर्ण बात यह कही है कि ’’संस्कृति के सबसे मूल्यवान तत्व वे हैं जो शोषक वर्ग के हितों का विरोध करते हैं और शोषित वर्ग के हितों की रक्षा में सहायक होते हैं । ये तत्व शोषित वर्ग को धरोहर के रूप में बहुधा वर्गहीन आदिम समाजों से प्राप्त होते हैं। (‘माक्र्स और पिछडे़ हुए समाज‘ पृ0. 41) कुलीन वर्ग का समस्त दर्शन उसकी परजीविता के सैद्धान्तिक-समर्थन का रहा है और इसीलिए शोषणकारी होने के बावजूद उसने अपना स्थान समाज, धर्म, न्याय, मूल्य, शील, आदर्श तथा अमूत्र्त अलौकिकता तक के स्तर पर ऊँचा रखने का प्रयास किया है और उसके पगतले रूँदे-खुँदे शोषित वर्ग को नीचा सिद्ध करने का और इसीलिए उसके विरोध की संस्कृति को उसने हेय दृष्टि से देखा है। लेकिन प्रति-प्रष्न खड़ा होता है कि विकास की धारा से जुड़ने वाला ऐसा आदिवासी सांस्कृतिक व्यवहार के स्तर पर परम्परागत मौलिकता के अर्थ में क्या अपनी आदिवासी छवि को खो देगा ? बहुत सारे उदाहरण हमारे सामने हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि प्रषासनिक सेवाओं में भर्ती हुए कई व्यक्तियों ने गैर आदिवासी महिलाओं से शादी की। कुछ मामलों में अपनी आदिवासी पत्नियों का परित्याग कर अन्य समाजों में विवाह किया। ऐसा अन्य के मामलों में भी होता रहा है। चर्चा का विषय आदिवासी है इसलिए विचार यह करना है कि ऐसा होने पर आदिवासी संस्कृति उस परिवार में किस रूप में बचेगी। इस प्रवृत्ति का नकार निसस्ंदेह, विवेक सम्मत आचरण का विरोध होगा। चयन की स्वतंत्रता अपनी जगह महत्त्वपूर्ण होती है। इस उलझन का समाधान एक मात्र इस बात पर आधारित हो सकता है कि कोई भी व्यक्ति आदिवासी संस्कृति के अनुकरणीय पक्ष का कितना सम्मान और संरक्षण करता है। सकल समाज के हित में संस्कृतियों की मौलिकता (अभिव्यक्त स्वरूप) से महत्त्वपूर्ण उनके मूल्य होते हैं। मौलिकता का आग्रह इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है, मनुष्य का बेहतर भविष्य तो मानवीय मूल्यों पर ही निर्भर करेगा। इसी तरह प्रादर्ष ;मगपइपजपवदद्ध संग्रहालय के लिए उपयोगी होते हंै, मनुष्य, मानवेतर प्राणी जगत एवं प्रकृति के सुरक्षित सह-अस्तित्व के लिए तो आदर्ष ही अनिवार्य होंगे और इस संदर्भ में ऐसे आदर्षों की सीख आदिवासी संस्कृति से ली और दी जा सकती है। विज्ञान-तकनीकी, वैष्वीकरण, प्रदूषण व पूँजी के वर्चस्व के इस दौर में सार्वभौमिक मूल्य बचे रहेंगे तो सब कुछ सुरक्षित रहेगा अन्यथा बहुमुखी संकटों की संभावना सामने होगी।