शुक्रवार, 16 सितम्बर 2011

भारतीय परिप्रेक्ष्य में आदिवासी संदर्भ ग्रंथ

मित्रो,


भारतीय परिप्रेक्ष्य में आदिवासी संदर्भ ग्रंथ के प्रोजेक्ट पर में काम कर रहा हूं। विडम्बना यह है कि अभी तक आदिवासियों के कुल समुदायों की वास्तविक संख्या से हम वाकिफ नहीं हैं। संविधान की अनुसूची में केवल अनुसूचीबद्ध आदिवासी समुदाय ही शामिल हैं। यह सूची भी राज्य@जिला@तालुकावार है इसलिए एकाधिक यूनिटों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की गणना एक से अधिक बार हो जाती है। इसी को देखते हुए संविधान में सूचीबद्ध आदिवासियों की संख्या 645 बताई गई है जबकि समुदायवार गणना करने पर यह संख्या 583 होती है। इनके अलावा अनुसूचीबद्धविहीन समुदायों की संख्या काफी है जिनमें डि-नोटिफाईड (अपरिगणित), नोमेडिक एवं सेमी-नोमेडिक समुदाय भी हैं जो नृतत्व विज्ञान की दृष्टि से आदिवासी श्रेणी में आते हैं। चारों श्रेणी के कुल मिलाकर 1051 आदिवासी समुदाय होते हैं।

उक्त सभी आदिवासी समुदाय में से प्रत्येक पर दो से तीन पृष्ठों की परिचयात्मक सामग्री संकलित की जानी है ताकि दो या तीन खण्डों में आदिवासी संदर्भ ग्रन्थ को आकार दिया जा सके। जो साथ ही आदिवासी विषयों में रूचि रखते है उनसे आग्रह है कि जिनके पास जो सामग्री उपलब्ध है या एकत्रित करने की स्थिति में है वे कृपया ऐसी सामग्री निम्न ईमेल पता पर भेजकर सहयोग करें। उल्लेखनीय है कि जो सामग्री जिन मित्रों द्वारा भेजी जायेगी वह उन्हीं के नाम से सम्पादित की जायेगी।



भवदीय





हरिराम मीणा

31, शिवशक्ति नगर,

किंग्स रोड़, अजमेर हाई-वे,

जयपुर-302019

दूरभाष- 94141-24101

ईमेल - hrmbms@yahoo.co.in

रविवार, 10 अप्रैल 2011

Village Gods In Tamil Nadu

Village  God


The concept of the village god is an ancient religious belief in the minds of the every people of countryside of India. Though not based on systematic research but one may guess that during the age of settlement after the age of wondering and hunting life , for the safety of the hamlet or the cluster of hamlets, there used to be a brave or warrior like person was selected by the local inhabitants to safeguard them . May be possible that he would have required companions or assistants to ensure the safety of the settlement day and night. Hence the concept of more than one gods headed by a chief god was extended later on.



Mythologically, such real human beings alike other elements of nature or live species other than human beings developed with the passage of time in the forms of myths, The village gods must have been treated and later on worshipped as guard - gods as happened in cases of all mythological characters.

मंगलवार, 22 फरवरी 2011

आदिवासी और यह दौर

भविष्य के ब्लेक होल में समाता
अतीत का ज्योति-पुंज
क्षत-विक्षत चौतरफा माहोल
आतंकी जिन्न के कैदखाने में विवद्गा
समझ लिए गये उसी के भक्त
                                             
ज्ञात आदिमता का सजीव संग्रहालय
बरगद की जड़ों सी स्मृतियां
भविष्य की आद्गांकाओं से घिरे स्वप्न
अजनबी दिनों में बाँझ होती उम्मीदें
जादूई यथार्थ के तहखाने सा जीवन
झिझकता रहा हस्तक्षेप से
तंत्र-नियंताओं का अधिसंखयक
वही आदिजन का भूगोल
समय के पाटे पर निढाल
आसमान के शून्य में डूबी सूखी आँखें
तलाशती अपना कोई प्रतिरूपी नक्षत्र
सिसकता-चीत्कारता रोम-रोम
असहाय सदमे में अधनंगा-भूखा द्गारीर
बेहोद्गा दिमाग में घुस आती है
   - अनामन्त्रित पाद्गाविकता
ग्लोबल विकास के पैकेज पर
प्रहार करने का स्वांग करते
प्रकृति-पुत्रों की आवाज निकालते
नेपथ्य में सुरक्षित द्गौतानों का समूह

विकास-घुसपैठ, आदिम चेतना-आतंक
सब गड्डमड्ड करती यात्रा -
 बाल्को, हिंडाल्को, नेतरहाट
 नंदीग्राम, सिंगरूर, लालगढ
 राजधानी एक्सप्रेस से ग्रीन हंट - वाया दंतेवाड़ा
सामने हो लोक-सत्ता का सद्गास्त्र मूर्त्तरूप
या निकलता हो बन्दूक की नली में से
                  लाल-ध्वज
समर-भूमि के आसमान में
धूल धूसरित होते जन-स्वप्न
हवा के शहतीरों में अटका सर्वहारा
अपना ही मर्सिया पढता नक्सलबाड़ी का संदर्भ-ग्रंथ
मर गया कानू सान्याल अपूरा
चुप रहा वक्त का सिकन्दर
क्या इसलिए कि अव्यक्त रहा
दोनों ही का सच ?
खजूर के सेलों१ की तरह फूटे जो धरती से
उखाड़े गये वो ही छांट-छांट कर
कहाँ जाए आखिर
तिनका-तिनका घोंसला छोड कर भोला पंछी
हर कोई तो नहीं कर सकता
अपनी हर चीज से इस कदर प्यार
अछूते जंगलों के बीच
यहाँ-वहाँ खाली जमीन में उपजती आदिम जिजीविषा
हिंसक जानवरों की पीठ पर सवार नैसर्गिक मूल्य-सूत्र
ऋतुओं की मौलिकताओं के संग पली जिंदगी
आधुनिकता की किताब के भीतर
कई-कई खाली पृष्ठों सा ठहरा हुआ जीवन
भ्रमित लगती है भाषा और लिपि
मौन है भाग्य का देवता
चौतरफा भचीड  में असंतुलित होते आदिम संस्कार
दारू के नद्गो में लड खड ाता विवेक
दबोच लिया सस्ते में खूँखार लाल पंजों ने
और दूसरी तरफ पहली बार भयावह दिखते
          - 'ग्रेहाउण्ड', 'स्कॉर्पियन,' 'कोबरा'२

१. अंकुर।   २. बिल-कुत्ते, बिच्छू व नाग। ऐसे जंगली जन्तु आदिवासियों के लिए पराये नहीं थे। जब से नक्सलियों से निबटने के लिए सद्गास्त्र बलों के ऐसे नाम रखे जाते गये, आदिवासी भी इनसे बिदकने लगे।


वीरान घोटुल,३ उजड़े हाट, उमंगहीन पर्व
थके मांदल और सिसकती बांसुरी को थामे
पथरायी आँखों के सहारे
अपने हरे-भरे आंगन में जीवन-अवलम्ब ढूँढता कोई
कैसे बचे वैद्गिवक वात्याचक्र से
दिक्कू४ और देसी दलालों के षड़यंत्र से ?
अपने बलबूते लड ते रहे
आकाश-गंगाओं सी लम्बी लड़ाई
जानकर अंततः सब कुछ अर्थहीन
सीख लिया जीना कानन-खोखरों में
जानते हैं अब भी लड ना
मगर नहीं जानते लडे़ं किस से
ये तो बांसुरी ही बजाते रहे जंगल में
मानकर कि 'हमारा ही है जंगल'
लड़ कौन रहे हैं इनके पक्ष की लडाई
        - इधर भी, उधर भी
आधुनिक नहीं, रफ्तार आदिम ही सही
क्या नहीं रह सकते इनके बाँटे
थिरकते पाँवों वाले दिन
और चांद-तारों भरी रातें
घुसपैठिये जबड़ों में इनकी आवाज
खुदमुखत्यारों की मुट्‌ठी में इनकी धरती
पूँजी के प्रेत की आंतों में
चुपचाप पिघलते  घने जंगल
   खनिज सम्पदा
   वन्य जीव
               और इनके सपने
क्यों पोता जा रहा
इनके भाग्य पर गाढा तारकोल
कौन समझाये व्यवस्था के घुड सवारों को
कि नहीं होता कभी प्रकृति-पुत्र
-किसी धरा-समाज का बैरी ?
पैदा नहीं हुआ था जब आर्केस्ट्रा
किसी सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान व तकनीकी वगैरा का
वे बड़े   हो चुके थे निकल कर धरती की कोख से

३. आदिवासी युवक-युवतियों का सामूहिक सह-आवास स्थल। ४. बाहरी शोषक।


दावा इतना ही रहता आया कि माँ है वह उनकी
बड़ी कितनी भी हो जाये
बिछुड  कैसे सकती है संतान अपनी माँ से

दूर-दूर तक पसरा
विकल्पहीनता का रेगिस्तान
मृगमरीचिकाओं में क्रीड़ारत स्वयं-भू नायक
समय की धारा के विपरीत सिद्धान्तों की जिद्‌दी नाव
विकास के स्वप्नलोकी महल की नींव में कराहती
                  - निस्सहाय आदिमता
(याद रखा जाये -
हरी टहनी के कटजाने पर रोती है पेड  की आँखें
धरती की आत्मा तक पहुँचते हैं ढलकते आँसू
काँपता है जैसे आसमान किसी तारे के टूट जाने पर
लामबन्द होती है पूरी कायनात
        - यहाँ से वहाँ तक)


                                                                                                          ३१, शिव शक्ति नगर,
                                                                                                      किंग्स रोड , अजमेर हाई-वे,
                                                                                                               जयपुर - ३०२०१९
                                                                                                     मोबाईल नं. 919414124101

बृहस्पतिवार, 17 फरवरी 2011

आदिवासियों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

आदिवासियों के सम्बन्ध में 5 जनवरी, 2011 को उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी 13 मई, 1994 को महाराष्ट्र की भील आदिवासी महिला नंदा बाई के उत्पीड़न के प्रकरण पर सुनाये गये निर्णय का हिस्सा थी जिसमें अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा अपराधियों को अपर्याप्त सजा सुनाई थी। जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की खण्डपीठ ने स्पष्ट टिप्पणी दी कि ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज आदिवासी, जो कि सम्भवतया भारत के मूल निवासियों के वंशज हैं, अब देश की कुल आबादी के 8 प्रतिशत बचे हैं वे एक तरफ गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, बीमारियों और भूमिहीनता से ग्रस्त हैं वहीं दूसरी तरफ भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या जो कि विभिन्न अप्रवासी जातियों की वंशज है उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय में ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ विस्तार से इस बात की चर्चा की गई है कि भारत के असली निवासी कौन हैं - द्रविड़ या उनसे पहले से रह रहे आदिवासी! सारी बहसों को सामने रखते हुए ‘दी केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया’ (भाग-1) के माध्यम से यही साबित किया गया है कि द्रविड़ों से पहले भी यहाँ आदिवासी रहते थे और वर्तमान मुण्डा, भील आदि उनके ही वंशज हैं।

फैसले में ‘वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ माईन्योरिटीज एण्ड इण्डीजीनस पुपिल - भारतः आदिवासी (गूगल) लेख में गौरवशाली इतिहास बताया गया है कि शौर्य के धनी भीलों को 17वीं सदी में निर्दयता से कुचला गया। इनको अपराधी के रूप में पकड़ कर मार दिया जाता था इनका सफाया करने की भरपूर कोशिश की गई है। कुछ भील जहाँ-तहाँ जंगलों और कंदराओं में छिप गये। फैसले में विभिन्न प्रजातियों के बाहर से भारत में आने के सिलसिले का सन्दर्भ दिया है जिनके दबाव में मूल आदिवासियों को अपनी भाषा व संस्कृति से समझौता करना पड़ा। इसके बावजूद मुण्डारी जैसी भाषायें सबसे प्राचीन सिद्ध होती हैं।

प्रस्तुत निर्णय में उपेक्षित, वंचित आदिवासी समाज के उत्थान के लिए संविधान में किये गये प्रावधानों का जिक्र किया गया है। ‘ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों को विशेष सुरक्षा और अवसर दिये जाने चाहिए ताकि वे खुद को ऊपर उठा सकें। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 16(4ए), 46 आदि में विशेष प्रावधान किये गये हैं।’ निर्णय में जोर देकर यह कहा गया है चूँकि आदिवासी यहाँ के मूल निवासियों के वंशज हैं, इसलिए उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया जाना चाहिए। एकलव्य की घटना को रेखाकिंत करते हुए फैसले के बिन्दु क्रम सं. 38 के तहत लिखा है ‘यह द्रोणाचार्य की ओर से एक शर्मनाक कार्य था जबकि उन्‍होंने एकलव्य को सिखाया भी नहीं फिर किस आधार पर गुरू दक्षिणा मांग ली और वह भी उसके दायें हाथ का अँगूठा जिससे कि वह उनके शिष्य अर्जुन से श्रेष्ठ धर्नुधर न बन सके’। फैसले में आदिवासियों के बारे में कहा गया है कि वे सामान्यतया अन्य नागरिकों से ईमानदार, चरित्रवान होते हैं। यही वह समय है कि हम इतिहास में उनके साथ हुए अन्याय को दुरूस्त कर सकें।

नियमित रूप से आदिवासी-जन भारतीय समाज का हिस्सा हैं। परम्परा एवं संस्कृति की दृष्टि से वे भारतीय समाज से पृथक हैं। उनके लिए नीति निर्धारण पृथक से होना जरूरी है तभी उनका विकास सम्भव हो सकेगा, अन्यथा वे लुप्त होती मानव प्रजाति की श्रेणी में ही स्थान पा सकेंगे और भविष्य में ’म्यूजियम’ की वस्तु के रूप में स्मृति के स्तर पर शेष रह जावेंगे।

वैश्‍वीकरण के लाभ जिन व्यक्तियों व राष्‍ट्रों को मिले हैं उनमें अमरीका, यूरोप, जापान जैसे देश धनी देश, धनाढ्य व उच्च कौशल प्राप्त व्यक्ति, व्यावसायिक प्रबंधकीय-तकनीकी लोग, लोकसेवा से पृथक जन, बड़ी फर्म, तकनीकी व पेचीदा प्रक्रिया पर आधारित-उत्पाद के विक्रेता, वैश्विक भद्र वर्ग, बाजारवादी व ब्रांडिंग फर्म एवं जिनको हानि हो रही है उनमें अनेक विकासषील देश, गरीब लोग, निम्न कौशल वाले व्यक्ति, श्रमिक, लोकसेवा पर आधारित व्यक्ति, छोटी फर्म, आधारभूत और मानक वस्तुओं के विक्रेता, वैश्विक आमजन एवं वे फर्म जिनकी बाजार में पहुंच कम होती है तथा कोई प्रचारित ब्रांड नहीं रखती। वैश्‍वीकरण से लाभान्वित होने वाली श्रेणियों में आदिवासी समाज कहीं नहीं टिकता। वह कहीं है तो नुकसान के खाते में ही शामिल दिखायी देता है।

आज आदिवासीजन जिस बड़े संकट से जूझ रहे हैं, वह है पुश्‍तैनी जमीन से विस्थापन जो वैश्‍वीकरण के इस दौर में बहुत तेजी से हो रहा है। बांध परियोजना, राष्ट्रीय उच्च मार्ग, रेल्वे लाईन, खनन-व्यवसाय, औद्योगीकरण, अभयारण्य एवं अन्य कारणों से आदिवासियों का अनिवार्य विस्थापन होता है तो एक तरह से उन्‍हें अपनी पारम्परिक जमीन व परिवेश से खदेड़ने को विवश किया जाता है। इसकी वजह से उनकी जीविका के आधार भी समाप्त होते हैं। प्रश्‍न उठता है उनके जीविकोपार्जन के विकल्प तलाश किये जाने का।

आदिवासियों का विस्थापन भारतीय संविधान की पाँचवीं सूची के प्रावधानों का खुल्लमखुल्ला उल्लघंन है, जिसके तहत आदिवासियों को उनकी पुश्‍तैनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना अधिकारों की गारन्टी दी गयी है। यही वजह रही कि आदिवासियों के लिए बनायी गयी राष्ट्रीय नीति में स्पष्ट प्रावधान रखे गये कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों का विस्थापन कम से कम किया जावे और अगर विस्थापन अति अनिवार्य है तो पुनर्वास के रूप में जीवन का बेहतर स्तर सुनिश्चित किया जावे।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया ने राहुल बहुआयामी शोध संस्थान, दिल्ली द्वारा आयोजित (दि0 12 व 13 नवंबर, 1999) कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में कहा था कि ‘‘बादशाहों के समय में कानून बादशाह बनाते थे, अंग्रेज बनाते थे, राजा बनाते थे और आज आजाद भारत में भी उसको सरकार बनाती है, पर आदिवासियों को न्याय नहीं मिला।’’ गत 26 जनवरी, 2001 के गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र के नाम प्रसारित अपने संदेश में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इस वक्त आदिवासियों पर छाये चौतरफा संकट पर गहरी चिंता जतायी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जुलाई, सन् 1997 के अपने एक निर्णय में स्पष्ट कहा कि ‘संविधान की मंशा है कि अनुसूचित क्षेत्रों की जमीन हमेशा आदिवासियों की बनी रहे, अन्यथा इन क्षेत्रों की शांति भंग होगी, प्रकारांतर से, इनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जायेगा।''

14 मार्च, सन् 2001 के जनसत्ता में डॉ0 ब्रह्मदेव शर्मा का लेख छपा। उन्होंने बताया कि ‘करीब एक करोड़ आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है।’ इस देश में करीब आठ करोड़ आदिवासी अनुसूचीबद्ध हैं। कुछ अन्य समूह भी हैं जो घूमंतू जीवन जीते हैं। वे अपनी भौम से पहले भी उखेड़े हुए हैं।

ये आधिकारिक वक्तव्य प्रश्‍न खड़ा करते हैं कि भविष्य में आदिवासी कहाँ होंगे ? निश्चित है कुछ आदिवासी प्रजातियां पृथ्वी से विलुप्त हो जायेंगी। जंगल-पहाड़ अब वन्य जीवों के लिए सुरक्षित-आरक्षित कर दिये गये हैं। बीच-बीच में फँसे-सिकुड़े पड़े आदिवासियों को वन संपदा के उपयोग से बाकायदा महरूम किया जा रहा है। विकास के नाम पर उनके बट में आया विस्थापन, समय और ‘सभ्यता’ की सतायी यह आदिमानवता आखिर, कहाँ जायेगी, जो न तो जंगली जानवर हैं और न ही मुख्य धारा के सभ्य इन्सान, स्पष्ट है, ये मानव समूह रोजी-रोटी की तलाश में शहर-कस्बों की ओर आयेंगे जहाँ उन्हें रोजगार की अनिश्चितता रहेगी। कड़ी मेहनत के बावजूद मिलेगी घर, दूकानों, संस्थानों की गुलामी या फिर फुटपाथी-भिखमंगा जीवन, पहले तो ये चोर-उठायीगिरे नहीं थे। अब शायद इन असोची परिस्थितियों के दबाव में अपनी गौरवशाली परंपरा को भूलकर पेट भरने के लिए यह सब भी करने लग जायें और हाँ, वैश्‍यावृति जैसे घृणित कर्म में भी अपनी बहू-बेटियों को झौंक दे। आदिवासियों की धार्मिक परंपराओं में सबसे बड़ा ईश्‍वर इनके पुरखे होते हैं। इनकी मान्यता है कि किसी भी दुख-सुख में पुरखे इनके आसपास रहते हैं। पुश्‍तैनी लीक पर चलते रहने के लिए ये लोग अपने इन्हीं पुरखों से सीख लेते रहे हैं। विकल्पहीन जीवन के इस दौर में कहीं ये अपने मासूम बच्चों को बेचने न लग जायें, चूँकि अब ये अपने पूर्वजों के देवलों से बहुत दूर पहुँचने लगे हैं।

जैसे-जैसे स्थानीय या देशज कंपनियो की खाल ओढे़ इन वन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाए वैश्‍वीकरण धंसता जा रहा है। आदिवासी को इतिहास की स्मृति बनाने का यत्न भी शुरू हो गया है। खनिज, वनोपज, जल, भूमि आदि के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति को भी उत्पाद समझ कर व्यापार के योग्य बना दिया गया है। तर्क यह है कि आदिवासियों के रहन-सहन , बोलियों, जीवनयापन, संगीत, कलाओं आदि की समुच्चय-संस्कृति विश्‍व-बाजार की नई उपभोक्ता वस्तु बना दिए जाने से आदिवासी-संस्कृति तालाब के बदले समुद्र के विस्तार का पर्याय समझी जाएगी। वह एक तरह से विश्‍व की सार्वजनिक संपत्ति बनती जाएगी।

अपनी धरती से आदिवासी की जबरिया बेदखली जमीन के एक टुकड़े से एक परिवार के विस्थापन का पर्याय भर नहीं है। यह समस्या पूरी दुनिया में आदिवासी झेल रहे हैं। एक ओर तो कल्याणकारी सरकारें बीच सड़क में बना दिए गए किसी धर्म-स्थान से घबरा कर राष्ट्रीय राजमार्ग तक को मोड़ देती हैं। दूसरी ओर वही सरकारें बड़ी आसानी से विकास का मुखोटा ओढ़ कर अंग्रेजी राज के भूअर्जन अधिनियम, 1894 के हथियार से हजारों आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल कर देती है।

यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है। पहले जमींदारों, औपनिवेशिक ताकतों और बड़े भूस्वामियों की महत्वाकांक्षाओं के कारण, अब खनिज ठेकेदारों, वन-शोषकों और बड़े कारखानों वाले उद्योगपतियों के कारण। वैसे भी आदिवासियों के भूमि संबंधी पुश्‍तैनी अधिकारों का लेखा-जोखा सरकारों के पास नहीं रहा है।

अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों के पक्षधर प्रख्यात विद्वान एवं चिन्तक लेवी स्ट्रॉस ऐसे समय दुनिया से विदा (28 नवम्बर, 2009) हुए जब भारत समेत धरती भर की जनजातियां ‘सभ्यताओं’ के परोपकार से बचने का रास्ता ढूंढ रही हैं। शायद आदिवासी अपने समय से पीछे नहीं, गैर-आदिवासी अपने समय से कुछ ज्यादा आगे (पर्यावरण के विनाश के मुहाने तक) चले गए हैं। अंतिम दिनों में लेवी स्ट्रॉस कुछ निराश थे। उन्हें लगने लगा था कि भूमंडलीकरण और सांस्कृतिक एकरूपीकरण का अजगर जल्द ही जनजातियों के छोटे-छोटे समुदायों को निगल जाएगा। (ईश्‍वर दोस्त,जनसत्ता-(29 नवम्बर, 2009)

भारत की वन नीति में स्पष्ट रूप से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के गांवों को बाकायदा ’वन्य-ग्राम’ की संज्ञा दी गई है और यह भी प्रावधान रखे गये हैं कि राजस्व गाँवों की तरह सारी सुविधाएं वन्य गांवों को उपलब्ध करायी जावे जिनमें शिक्षा, चिकित्सा, विद्युत, संचार, सड़क, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अनाज भण्डार, विकसित कृषि की सुविधाएं, पशु-चिकित्सालय, बैंक, सहकारी संस्थाएं, छुटपुट वनोत्पाद का उपभोग, बिचौलियों के शोषण से मुक्ति की व्यवस्था आदि-आदि शामिल हो।

आदिवासी विकास की समस्या अत्यन्त जटिल रही है और इसकी एक मात्र वजह यह रही है कि उनके विकास की बात उनकी जीवन शैली,सांस्कृतिक परम्पराओं एवं मनोदशा को ध्यान में रखकर नहीं की गई है । पं0 जवाहर लाल नेहरू ने आदिवासी विकास के पंचशील तय किये थे। जिन्‍हें अभिव्यक्त सर्वप्रथम वेरियर एलविन द्वारा लिखी गई किताब पूर्वात्तर सीमा क्षेत्र पर लिखी गई पुस्तक के प्रस्तुति वक्तव्‍य के रूप में हुई थी । आदिवासी विकास में यह सूचना निम्न प्रकार से हैः-

1- आदिवासी का विकास उनकी मनोदशा एवं परम्पराओं के आधार पर होना चाहिये, बाहर से थोपी जाने वाली नीति के तहत नहीं, इस क्षेत्र में आदिवासी परम्परागत कला व संस्कृति पर जोर दिया जाए।

2- आदिवासियों के जंगल व जमीन पर अधिकारों का सम्मान किया जावे।

3- प्रशासनिक एवं विकास में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को महत्व दिया जाना चाहिये। तकनीकी विशेषज्ञ शुरूआत में बाहर से लाये जा सकते है अन्यथा बाहरी व्यक्तियों के हस्तक्षेप को नही के बराबर रखना चाहिये ।

4- आदिवासियों के परम्परागत समाज व सांस्कृतिक संस्थाओं के आधार पर ही आदिवासी क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिये । आदिवासी विकास का मापदण्ड, खर्च की जाने वाली राशि एवं विकास के आंकड़ों पर आधारित न होकर विकास की गुणवता के आधार पर होनी चाहिये । आदिवासी मुद्दों के विशेषज्ञ स्वयं वेरियर एलविन ने भी इस बात पर जोर दिया कि भारतीय समाज के लिए आदिवासियों का जो परम्परागत अवदान है उसका सम्मान किया जाना चाहिये एवं इस अवदान को भारतीय समाज में उत्थान के सहायक के रूप में देखना चाहिए न कि आदिवासी समाज को भारतीय समाज से पृथक ?

यह अत्यन्त उल्लेखनीय बात है कि नंदा बाई के मुकदमे के बहाने भारत के उच्चतम न्यायालय ने आदिवासियों से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों को रेखांकित करते हुए व्यवस्था को आगाह किया है कि अगर आदिवासियों की अस्मिता व उत्थान को प्राथमिकता के आधार पर नहीं लिया गया तो यह देश के लिए शर्मनाक होगा। यह निर्णय आदिवासियों के कल्याण के लिए मील का पत्थर सिद्ध होना चाहिए और वह भी उस दौर में जब देश की करीब 40 प्रतिशत प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा आदिवासीजन हजारों सालों से करते आ रहे हैं और अब उस सम्पदा को देशी-विदेशी कम्पनियों द्वारा छीनने की भरसक कोशिश की जा रही है। आदिवासियों का हित केवल आदिवासी समुदाय का हित नहीं है प्रत्युतः सम्पूर्ण देश व समाज के कल्याण का मुद्दा है जिस पर व्यवस्था से जुड़े तथा स्वतन्त्र नागरिकों को बहुत गम्भीरता से सोचना चाहिए।





शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

अंतर्राष्‍ट्रीय मूलवासी दि‍वस


’मूलवासी’ (इण्डीजीनिस) शब्द को परिभाषित करना अत्यधिक कठिन है। इस शब्द पर चर्चा करने के साथ-साथ आदिवासी (ट्राईब)ए देसी (नेटिव)ए एवं आदिम (अबोरिजनल) जैसे शब्दों की अवधारणाएं सामने आती हैं। वर्ष 1987 में ग्रेलर ने मूलवासी की व्याख्या करते हुए कहा कि यह ‘राजनैतिक दृष्टि से अधिकार- विहीन लोगों के ऐसे समुदाय हैं जो अपनी विषिष्ट नस्लगत पहचान बनाये रखते हैं और आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा के मूर्त रूप लेने के बावजूद अलग ईकाई के रूप में समाज का हिस्सा बनकर चलते हैं। इससे पूर्व वर्ष 1972 में मूलवासी जन के लिये गठित संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य समूह ने जोस माल्टीनेज कोज की परिभाषा से सहमति प्रकट करते हुए ’किसी भू-भाग पर विष्व के अन्य हिस्सों से आने वाले बाहरी मानव समूहों से पहिले वहंा प्राचीन काल से रहने वाले लोगों के वंषज’ के रूप में मूलवासी की पहचान की है। इस प्रक्रिया में बाहरी घुसपैठियों द्वारा आक्रमण एवं उस भू-भाग पर अधिकार करने तथा मूलवासियों को दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवष किया गया। परिणास्वरूप वर्चस्वकारी व्यवस्था में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाने लगा और यहीं से विष्व की सबसे बड़ी समस्या नस्ल पर आधारित भेदभाव तथा मूलवासियों से सम्बन्धित अन्य मुद्दे सामने आये।

वर्ष 1983 में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर ’मूलवासी’ शब्द की व्याख्या करते हुए माना कि ’किसी भू-भाग पर प्राचीन काल से रहने वाले मानव समुदाय के वंषज हैं जो नस्ल एवं संस्कृति के स्तर पर विषिष्टता रखते हों । इनमें से काफी लोग राष्ट्र-समाज की मुख्य धारा से अलग-थलग अपने पुरखों की परम्परा एवं रीति रिवाजों का संरक्षण करते हुए जीवन जीते चले आ रहे हैं और विकसित राष्ट्रीय, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेष को ये लोग बाहरी मानते हैं।’ कुल मिलाकर ’’किसी भू-भाग के ज्ञात प्राचीनतम निवासियों’’ को मूलवासी कहना उचित होगा।

आधुनिक राष्ट्र, समाज एवं सरकारों के उद्भव के साथ अपनी स्वतन्त्र ईकाई के सन्दर्भ में ऐसे मूलवासी समुदाय राजनीति के स्तर पर अपने अस्तित्व एवं अधिकारों के लिये एक विषिष्ट पहचान बनाने की प्रक्रिया से गुजरते आये हैं। काल-खण्डानुक्रम की दृष्टि से प्राचीन काल, उपनिवेषवाद काल एवं आधुनिक काल के संदर्भ में इनकी अस्मिता, पराभव एवं पुनरूत्थान की प्रक्रिया को समझना आसान होगा। इस प्रक्रिया में होने वाले नस्ल परिवर्तन, सांस्कृतिक प्रदूषण, भाषागत अर्न्तक्रिया, मूल्यगत हृास की दृष्टि से परम्परा एवं आधुनिकता का अर्न्तसंघर्ष, अर्न्तविरोध, अर्न्तक्रिया, परस्पर प्रभाव जैसी प्रमुख स्थितियां उभर कर सामने आती हैं । इस क्रम में भू-भाग विषेष महत्वपूर्ण तत्व न रहकर मानव समूहों के बिखराव एवं विस्थापन की स्थिति सामने आती है। यहां वनांचल से मुख्य भूमि, गावों से शहर और परम्परागत समाज से आधुनिक समाज की ओर अग्रसर होने की स्वाभाविकता या विवषता भी महत्वपूर्ण बन जाती है। निष्चित रूप से इतिहास एवं संस्कृति जैसे प्रमुख क्षेत्र प्रभावित होते हैं और प्राचीन ऐतिहासिकता एवं मौलिक संस्कृति के संरक्षण के प्रष्न सामने आते हैं।

विश्व मूलवासी अध्यय्न केन्द्र की स्थापना वर्ष 1984 में डा0 रूडोल्फ सी0 रायसर एवं जार्ज मेनुअल ने एक स्वतंत्र शोध एवं शैक्षिक संगठन के रूप में की। जार्ज मेनुअल राष्ट्रीय भारत मैत्री संगठन (कनाडा) के पूर्व अध्यक्ष थे जिन्होंने उपनिवेषवाद से उबरे मूलवासियों के लिये कार्य किया। उन्होंने ही संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बन्धित मूलवासियों की विष्व परिषद के गठन में महत्पूर्ण योगदान दिया।

उल्लेखनीय है कि विष्व की कुल जनसंख्या करीब 6 अरब में से 3 अरब 70 करोड़ मूलवासी हैं, जो करीब 70 देषों में रह रहे हैं। भारत राष्ट्र के सन्दर्भ में मूलवासी एवं आदिवासी को एक ही माना गया है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार करीब आठ करोड़ चालीस लाख अर्थात् भारत की कुल जन संख्या का 1.2 प्रतिषत लोगों को मूलवासियों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनके कुल 461 समूह माने गये हैं। स्वतन्त्र शोध निष्कर्षो के अनुसार ऐसे कुल 635 आदिवासी घटक हैं जिनमें प्रमुख गोण्ड़, सन्थाल, उरांव, भील व नागा आदि हैं। जनगणना के मुताबिक 461 चिन्हित आदिवासी घटकों में से 220 उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहते हैं, जो कुल आदिवासियों का 12 प्रतिषत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैसे मध्य भारत में कुल आदिवासियों की करीब 50 प्रतिषत जनसंख्या निवास करती है।

वैष्विक मूलवासियों पर जब चर्चा की जाती है तो विष्व के सभी महाद्वीप विमर्ष के केन्द्र में आते हैं चूंकि मूलवासियों की जनसंख्या अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, एषिया, यूरोप आदि सभी महाद्वीपों से गहरा संबंध रखती आई हैं चाहे समस्या उत्तरी अमेरिका के रेड इंडियनस् की हो या दक्षिणी अमेरिका के ’बुष नीग्रो’ की हो या अफ्रीका के सांन की हो या मैक्सिको के माया लोगांे की हो या न्यूजीलैंड के मोरानी की हो या आस्ट्रेलिया के कुरी, नुनगा, टीवी की हो या यूरोप के खिनालुग, कोमी, सामी की हो अथवा एषिया के अडंमान टापू के सेंटेनलीज या जारवा की हो।

मूलवासियों को सर्वाधिक त्रासदी का सामना उपनिवेष-काल के दौर में करना पड़ा था जो पन्द्रहवीं शताब्दी से शुरू होकर बीसवीं सदी के मध्य पार तक चला। नव साम्राज्यवाद एवं वैष्विकीकरण के इस दौर में मूलवासियों की समस्याओं के और अधिक पेचीदा बनने की संभावनाएं सामने हैं, चूंकि वे उच्च तकनीकी, बाजारवाद एवं पूंजी की वर्तमान भूमिका से सर्वथा अपरिचित हैं। मूलवासियों का विष्व-समाज आधुनिक प्रगतिषील जगत से स्वयं को पृथक व पिछड़ा हुआ महसूस करता है और है भी।

मूलवासियों को सर्वाधिक त्रासदी का सामना उपनिवेष-काल के दौर में करना पड़ा था जो पन्द्रहवीं शताब्दी से शुरू होकर बीसवीं सदी के मध्य पार तक चला। नव साम्राज्यवाद एवं वैष्विकीकरण के इस दौर में मूलवासियों की समस्याओं के और अधिक पेचीदा बनने की संभावनाएं सामने हैं, चूंकि वे उच्च तकनीकी, बाजारवाद एवं पूंजी की वर्तमान भूमिका से सर्वथा अपरिचित हैं। मूलवासियों का विष्व-समाज आधुनिक प्रगतिषील जगत से स्वयं को पृथक व पिछड़ा हुआ महसूस करता है और है भी।
अर्न्तराष्ट्रीय मूलवासी दिवस के रूप में 09 अगस्त को मनाने की पृष्ठभूमि यह है कि वर्ष 1982 में इसी तारीख को संयुक्त राष्ट्र संघ के मूलवासी लोगों के कार्यसमूह की प्रथम बैठक सम्पन्न हुई थी। तद्नुसार संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा की दिनांक 23 दिसम्बर 1994 को हुई बैठक में इस तिथि को ’अन्तराष्ट्रीय मूलवासी दिवस’ मनाने का निर्णय लिया। विष्व के मूलवासियों के उत्थान के लिये वर्ष 1995 से 2004 तक की अवधि को ’प्रथम मूलवासी दषक’ एवं वर्ष 2005 से 2014 तक की अवधि को ’द्वितीय मूलवासी दषक’ के रूप में मनाये जाने का संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा में घोषणा की गई।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कुछ छोटी कविताएं

रात

टूटी फूटी
इच्छाओं का
गट्ठर समेटते
दिन के सारे पल
आते हैं
रात के शामियाने में
सपनों की बारात लेकर।








भोर

सांझ की
विदाई के साथ
दरख्तों की
टहनियों पर
रात की हवालात में
खामोश आवाजें
अंधेरे की
सलाखें तोड़कर
छेड़ेगी
द्रुतगति में
भोर का राग।

किरण

आकाश में
टिमटिमाते नक्षत्रों की जगह
बेहतर है बन जाना
सुबह की पहली किरण और मिट जाना
पसरते उजास के आगोश में।

आग

बुझ चुके अलाव के कोने में
छिपी चिंगारी
बनी जो मौन साधक सी-आग
देखो उसे तुम तो खेल रहे हो
नींद में
अवचेतन के कोलाहल से।

बृहस्पतिवार, 20 मई 2010

एकलव्य

कान पक गये सुनते सुनते - गुरू की महिमा आज्ञाकारी शिष्य दक्षिणा में अंगूठा ''मैं भी राजा का बेटा१ अधिकारी विद्या का'' एकलव्य, क्या ऐसा ही कुछ कहा नहीं तुमने आचार्य द्रोण को भोले तुम, आदिम-परंपरा में पला हुआ निर्मल मन गुरू था ''अनुबंधित'' समझाता हठ तो नहीं, विनय ही की थी घोर निरादरसने टके सा सुन जवाब उम्मीदों का ढूह ढहा छाती में जैसे तीर चुभा घर न लौट वस्तुतः गये गन चिन्ह वृक्ष तक ................................................................... १. एकलव्य निषादों के राजा (प्रमुख) हिरण्यधनु का पुत्र था। २. एकलव्य के आदिवासी कुल का गणचिह्‌न 'महुवा' का पेड़ रहा है। जहाँ- निकट नाले की गीली माटी से आचार्य द्रोण की मूर्त्ति बनायी जिसके चेहरे के भावों में - गुरूता नहीं, पक्षधरता की लघुता झलकी उस प्रतिमा को देख ''तू अनार्य तू निषाद तू शूद्र, नीच दीक्षा लेगा हमसे ?'' हाँ, यही शब्द टकराये होंगे कनपटियों से बार बार गूँजे होंगे मस्तिष्क कंदराओं के भीतर हृदय-सिंधु में उमडा होगा ज्वार घृणा का भोली आँखों के पर्दों पर खून सिमट आया होगा घनीभूत प्रतिद्गाोध-तरंगें दौडी होंगी अंग-अंग में दृष्टि टिक गयी होगी प्रतिमा के चहरे पर और स्वतः ही - बायां हाथ उठा आगे मुट्‌ठी में पकडा कसकर - धनुर्दण्ड के मध्यभाग को दाहिना हाथ गया तरकस पर बाण चढाया साधा खींची प्रत्यंचा कंधे तक ( परंपरा के आंगन में सीखा था सबकुछ चूक कहाँ, कैसे, क्यूं होती ) पहला तीर - बिंधा मस्तक '' लो, प्रणाम किया गुरू'' - कहा और कर दी बाणों की वर्षा थमी न होगी तब तक जब तक क्षत-विक्षत न हुई वह प्रतिमा यह ''दुस्साहस'' देख गुरू की आज्ञा से द्गिाष्यों ने छोड़ा होगा कुत्ता किंतु झपटने से पहले मुख बाणों से भर दिया बिन प्राण लिये भेजा वापस देखा - गुरू ने, द्गिाष्यों ने ''प्रिय श्वान ! बाण भरे तरकस सा जबडा लहूलुहान यह हाल !!'' (अद्‌भुत कोैद्गाल लेकिन दुस्साहस) एकलव्य, उस वक्त अकेले थे तुम वन में गुरू की अगुवाई में सब द्गिाष्यों ने घेरा पकडा, पटका तुम्हें धरा पर और अंगूठा......................... बर्बरता नाची होगी इर्द-गिर्द चहुँदिद्गिा में गूँजा क्रूर अट्‌टहास......... आदिम कुल-कौद्गाल का प्रतीक वह कटा अंगूठा धरती पर जब तड़पा कुछ पल उस वक्त बताओ एकलव्य, धोखे से घायल बाघ समान नहीं थे तुम चीखे-चिल्लाये नहीं दहाडे ही होंगे सुनकर दहाड बिन मौसम कड का आसमान कांपे थे सिंहों के अयाल बांसों में अंकुर फूटे थे थर्रायी खूनसनी धरती वन में आँधी भीतर भीतर दहले पर्वत, कुछ द्गिाखर ढहे होंगे - अवद्गय वह पेड हिला होगा जड तक मासूम परिंदे भौंचक्के उड भागे होंगे इधर उधर कोहराम मचा नभमंडल में ज्यों गाज गिरी हो अंचल में वह कटा अंगूठा एकलव्य, था मात्र देह का अंग नहीं कुछ था उसके पीछे जैसे - कौद्गाल की आदि-नदी अविरत श्रम का गहरा सागर संकल्पों का ऊँचा पर्वत स्वप्नों का अनन्त आसमान जन-संस्कृति की फलवती धरा उस सबको - हरने का प्रयास था छुपा हुआ उस घटना में (दो) फिर भी तुमने हार न मानी साधते रहे अपनी विद्या बिन अंगूठे का पंजा देखा बार बार घूमे वन में बदले की आग लिए मन में जैसे हो घायल बब्बर शेर सोचा, ''गुरू द्रोण नहीं दोषी प्रतिद्वंद्वी तो मेरा अर्जुन'' अनवरत काल का यात्रा पथ आ धमका अटल ''महाभारत'' देखा तुमको - दुर्योधन के दल में चौंके श्री कृष्ण खडे़ तुम अग्रभाग में ''हे अर्जुन, यह निषाद है खतरनाक धनुर्निपुण तुमसे बढ कर अब भी'' सुन अर्जुन दंग, अवाक्‌ आभा ललाट की क्षीण ज्यों, सूरज का तेज ढँका काले बादल ने एकाग्र दृष्टि तुम पर जिसको मछली की आँख दिखी उसको पूरे तुम दिखे काल जैसे दिल दहला, काँपा सारा तन आभास हुआ - चीते के आगे निरीह मृग ''दुर्भेद्‌य लक्ष्य कंपायमान है धनुर्दण्ड प्रत्यंचा खिंचती नहीं न ही सधते नाराच निस्तेज हुए दैवीय शस्त्र हे सखा-सारथी, बनों ईद्गा कुछ करो'' - कहा धीरे से गर्दन नीची कर ''मेैंने ली सौगंध - रहूँगा शस्त्रहीन यह भी कि लड़ूँगा नहीं अद्‌ृद्गय शक्ति छोडूँगा तो -ईद्गवर की छवि का क्या होगा? पर, प्रण यह भी - वर्चस्व तुम्हारा बना रहे'' वह - चौंसठ कला प्रवीण ''ईद्गा'' योगी चमत्कारी था बहुत अनुभवी जन्मों से साधन से बढ कर सदा साध्य का था साधक समझा सोचा सूझा विकल्प लीला अवतारी थाली से सूरज को ढंक सकता था उसके समक्ष छल का संबल ही था विकल्प रण-विधि विरूद्ध का कूट कृत्य वह गुप्त सुदर्द्गान चक्र बना जिसका माध्यम कितने भी महान धनुर्वीर आखिर में थे भोले निषाद सपनों में भी न देख पाये क्या होती है छल की माया ईश्वर अर्जुन अर्जुन ईद्गवर मानव-अवतारी मायावी थी शक्ति, निपुणता कई गुणी पर पुनः कपट की जीत हुई। (तीन) संघर्षों का क्रम लंबा था सतयुग से लेकर द्वापर तक आगे भी.................. द्वापर का वह महाभारत उस एक युद्ध की अल्पावधि में जाने कितने युद्ध छिड़े द्रोपदी, द्गिाखंडी कर्ण, द्रोण, अद्गवत्थामा अभिमन्यु, पितामह पांडुपुत्र, कौरव उनके साथी-संगी सबके- अपने अपने प्रण, प्रतिबद्धता, विवद्गाता सब लड े लड ाई निजी निजी तुम बिना लडे सिद्ध हुए एक महा-यौद्धा अर्जुन न लड सका तुमसे किस धर्मयुद्ध के लिए तुम्हें ''ईद्गवर'' ने मारा ? यह प्रद्गन काल के झोले में कब तक अनसुलझा ? मरते हैं व्यक्ति, न परंपरा प्रतिरोध - नदी बहती रहती घाटियां पार करतीं चट्‌टान तोड बढती - आगे चलती........ हाँ, एकलव्य - वह ईद्गवर था (अच्छा है अमर रहे, खुद्गा रहे स्वर्ग में) पर, मृत्युलोक का धर्म निभाना होता है उस महायुद्ध में जो हारे वे खत्म हुए जो जीते, वे चल दिये नियति की राहों पर (चार) अब रहा अकेला ईद्गवर कितना भटका था यहाँ-वहाँ (यह अलग बात - स्मृतियों में था पूर्वजन्म - बाली वरदान बैकुण्ठ - धाम) वह- अजर, अमर विभु, पूर्ण, द्गाांत, स्पृहाहीन - सच्चिदानंद अब - गहरा अंतर्द्वंद्व मकड़जाल स्वयं का बुना हुआ ''अरे सखा अर्जुन, एकलव्य-वध के प्रेरक, यह गहन ''द्वंद्व'' असफल ''गीता'' निस्वन यह वन बूढा पीपल जिसकी छाया में बैठा मैं अभ्यंतर पद्गचाताप सघन किस विधि प्रायद्गिचत करूँ आज -सौगंध तोड अमलिन निषाद को क्यों मारा ? सब चले गये -कौरव-पांडव, उनका दल-बल वसुदेव-देवकी नंद-यद्गाोदा रानियां नहीं हैं आसपास बलराम समाया सागर में यदुवंद्गाी ''मूसल'' ने मारे बच गया अकेला मैं एवं यह प्रद्गन ठूँठ सा - उस एकलव्य को कपट नीति से क्यों मारा ?'' निर्जन एकांत पवन स्थिर वन-प्राणी चुप वृक्षों में नहीं सरसराहट चहुँ ओर निपट नीरवरता जड़-चेतन सब द्गाांत किंतु ईद्गवर अद्गाांत (!) जिसके - कानों के पर्दों से टकराता जाता वही प्रद्गन ''बिन लडे लडाई अपनी उस यौद्धा को मैंने क्यों मारा ???'' अंततः- जीवन की कठोर धरती पर जंगल में जंगल का बदला मूर्त्तरूप जारा द्गाबर भील कुछ था तुमसे उसका रिद्गता -गुदडी के धागों सा पदमाक्ष चमकता या कि हरिण की आँख दिखी मौत का बहाना भ्रमित हुआ आखेटक या प्रतिद्गाोधातुर ? हत्या हंता प्रतिद्गाोध-बाण एवं अनंत का अंत (!)