गुरुवार, 5 नवंबर 2009

भीलणी

इस बहुरंगी दुनिया में
मेवाड़ी धरती
उस धरती मे विरल भीलणी
निर्मल, शुभ्र हृदय उसका
पर
तम-आच्छादित उसकी काया
किन अतीत के अभिषापों की
काली छाया
पड़ी निरन्तर
उसके तन पर
ले दोपहरी से अंगारे
धूणी रमती
वन वन फिरती
वह तपस्विनी
श्रम की देवी।

फटा घाघरा
तन से लिपटा
तार-तार चोली
लज्जा की रक्षा करती
अन्तिम साँसें रोक ओढ़नी
सर को ढकती।

अरावली पर्वतमाला की काली घाटी
काली घाटी के तल में
कँकरीली माटी
फटे खोंसड़े ही
उसके पैरों की जूती
बीच-बीच में पगतलियँा
धरती को छूती।
राह रोकते शूल झाड़ के
नागफनी के पुंज
रोकते उसके पथ को
जीवन-रथ को।
दयावान कुछ पेड़
द्रवित हो
उस वनदेवी को ज्यों देते
सूखी लकड़ी
बीन-बीन कर उनको चुनती
तोड़-तोड़ कर गठरी बुनती
उस गठरी को माथे धरती
खट-खट फट-फट
चलती ढोती।

उसके तन के
रोम-रोम के
छिद्र-छिद्र से
फूट-फूट कर
निसृत होता स्वेद-निर्झरा
टप-टप टपका
उस तपस्विनी का मन
कुछ क्षण चलते-चलते
घर जा अटका।

घर क्या होगा उस दरिद्र का-
एक डँूगरी की छाती का
लेकर सम्बल
टूटी-फूटी
रूग्ण झोंपड़ी
पर्ण-कुटी सी
कोलू मिश्रित
बीच-बीच में गगन झाँकती
मानवता का मूल्य आँकती।

उस अभाव के ही आश्रय में
नन्हंे-नन्हें उसके बालक
भील गया दूरस्थ देष
मजदूरी करने
घर की कुछ उम्मीदों को
ज्यों पूरी करने।
’’मैं रोटी लेने जाती हूँ
अभी-अभी वापस आती हँू।’’

यह कह कर
चुपचाप
क्षुधा की तृप्ति हेतु
वह अस्थि-पुंज
सूखी लतिका-सी
रोटी की ठण्डक तलाषने
निकली
वन, पर्वत, उपत्यका
उलट चली सूखी सरिता-सी।

भोर सुनहरी
उसको जैसे
पीली-पीली
मक्का की सी
रोटी दिखती
चढ़ते सूरज संग भागती
वन-प्रान्तर में
छिपती फिरती।

कहीं छिप गई
इस रोटी की ही तलाष में
जंगल की सूखी लकड़ी में
दिन-भर फिरती
वह अभागिनी
श्रम की जननी
वह तपस्विनी।

साँझ ढले
बाजार फिरे
ले लकड़ी गठरी
गंध खोजती रोटी की सी
मिली अन्त में उसे कमाई
पर थोड़ी-सी।

वह थोड़ा-सा
श्रम का प्रतिफल
घर का सम्बल
कैसे करता तृप्त
निर्धना का मरू-जीवन।

दिन-भर का श्रम भूल
दिन छिपे
वह श्रम देवी
पूरी राहें
धेनु समान ममत्व छिपाती
मन ही मन में
वह रम्भाती
फिर घर आती।

भूख सताए नन्हें बालक
हो हताष
सो जाते तब तक
ठाऽठ पड़े
श्यामल-ष्यामल
निर्बल
पर, जीवटमय
दोनों हाथों से उन्हें जगाती
वक्ष लगाती
रोती-रोती
देती रोटी
वात्सल्य का भार लिए उर
रूद्ध कण्ठ भींचे अभाव सुर
उन्हें खिलाती
उन्हें सुलाती।

अब थे बालक अंक नींद की
बीच-बीच में स्वप्न
चाँद से परी उतरती
हाथ सजा कर थाल
स्वप्न में व्यंजन देती
पर-
स्वप्नों के इस यथार्थ को
खूब जानती भील तापसी
वह थी भूखी
रोटी उस को कहँा बची थी
श्रम की बेटी
थक कर लेटी।

उधर झोंपड़ी के आँगन में
बिखर रही मधुसिक्त चाँदनी
फूले महूआ के पातों से
छान-छान दे रही यामिनी।

क्षुधा-व्यथित वह भील-सुता
निज यौवन में भी प्रौढ़ा-सी
निज प्रौढ़ आयु में वृद्धा-सी।

बाहर बिखरी चन्द्रिका
गगन मंे चन्द्र देख
(नागार्जुन बाबा तो शायद
रोटी का रूपक भूल गया
कुछ और चाँद में ढूँढ रहा)
पर-
देख भीलणी ने चंदा
आकार गोल
धवला-धवला
रोटी की ठण्डक-सा ठण्डा।

कल्पनामग्न
ज्यों चाँद ज्वार की रोटी हो
परतें कुछ मोटी-मोटी हो
उतरा
धीरे-धीरे हिय तल
कुछ शांत हुई ज्यों जठर-अनल
यह कैसी
क्षुधा-षान्ति उसकी
कैसी थी प्रबल भ्रान्ति उसकी।

था खाली पेट
अँधेर घुप्प के अन्धकूप में
स्वप्न जल रहे थे उसके
अतिक्रुद्ध धूप में।

अब-
अन्तरंग पीड़ा तरंग
वन में बिखरी
पर नहीं वेदना तनिक
सकल वन था निःस्वन
बस एकमात्र
पलाष ही को तो थी अखरी।

क्रुद्ध था पलाष
आग उगलता
शाख-षाख
फूट-फूट
रक्तवर्णी एक-एक
फूल उसका धधकता।
देख-
महुआ भी तड़पता
रूदित होता रात भर
झर-झर टपकता।

हार थक
चुपचाप
फिर वह जिन्दगी का भार ढोती
ना दिखे औरों को चाहे
पर तपः तनया के भीतर
प्रखर अग्नि धधकती
खदकते इस्पात की सी
-धार पकती।

5 टिप्‍पणियां:

Vimla Bhandari ने कहा…

सुन्दर लेखन, कविता प्रभावी एंव मेवाड़ की आदिवासी स्त्री "भिलणी" के सशक्त चित्रण में संवेदना से पूर्ण. बधाई. चित्र भी डाले.

कमलेश शर्मा ने कहा…

वन वन फिरती
वह तपस्विनी
श्रम की देवी।

बहुत सुन्‍दर, जनजाति अंचल की श्रम देवी का जीवन्‍त चिञ प्रस्‍तुत किया आपने। बधाई, आपको ब्‍लॉग पर पाकर अच्‍छा लगा ।

अजेय ने कहा…

खदकते इस्पात की सी
-धार पकती।


ताक़त वर स्त्री ! इस ताक़त का सही उपयोग कब होगा? आखिर कब तक yah भीलणी लकड़ियाँ बीनने और बोझा उठाने मे ही 'खर्च' होती रहेगी ?

shuk ने कहा…

आप् की सोच को सलाम
आनन्द शुक्ल

हरि राम मीणा Hari Ram Meena ने कहा…

Vimla ji, Kamlesh ji,Ajey Bhai avm Anand Bhai sabka abhaar tippaniyon ke liye. Deri ke liye kshama.