सोमवार, 9 नवंबर 2009

चाँद

न जाने क्या-क्या देख लिया
तुमने चाँद में
था ही नहीं जो वहाँ

मेरे पुरखों ने देखी-
वो चरखे वाली बुढ़िया
और कतते सूत की डोरी

सच बोला करता था दादा
जैसे
वह प्यारा ‘बाबा‘ कवि
जिसने चाँद में रोटी देखी

बेषक,
चाँद में न बुढ़िया
न सम्वत
न रोटी
फिर भी-
उन्होंने जो देखा
वह मेल खाता है इस धरती से
जो जन्माती व जिन्दा रखती है
-धरती के लोगों को

2 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

चांद का यह अनोख रूप हमेशा याद रहेगा।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

चाँद भी अपने रंग दिखाता है कभी रोटी .कभी किसी का चेहरा नजर आता है ..अच्छी लगी आपकी यह रचना ने अरूप दिखा चाँद का ..