शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

जारवा आदिवासी को स्वप्न में देखकर

तुम्हें लाल रंग क्यों पसन्द है जारवा-पुत्र,
(क्षमा करना, इस सम्बोधन में ’आर्य-पुत्र’ की
अभिजात्य अनुगूँज नहीं समझता।)
क्या यह अनुराग की व्यंजना है
या लक्षणा लाल खून की
जिससे साबित होती है जिन्दगी
-या अभी-अभी हुई मौत।
ऐसा तो नहीं जारवा-पुत्र
कि मस्तिष्क की कन्दराओं से
सुनाई देती हों-
अबेदीन की दनदनाती बन्दूकों की
                                  -धधकती आग्नेय प्र्रतिध्वनियंा

और याद आता हो
काले पानी से घिरी काली धरती का
ऊबड़-खाबड़ रूधिरस्नात रणक्षेत्र।
बनाओ जारवा-पुत्र
क्या तुम्हारा कोई वास्ता है
आदिम बनाम आक्रान्ताओं के
चतुर्युगीय संघर्षों की दास्तान से
उनके एकपक्षीय गौरवगान से
जिसे सुनकर अभी भी
चैंक पड़ते हैं-
बाली और शम्बूक के रक्त-रंजित अमुक्त प्रेत
और प्रश्न बन खड़ा होता है
द्रोणाचार्य के काँपते हाथों में
खून से लथपथ एकलव्य का
                                      -तड़पड़ाता अँगूठा ?

बोलो जारवा-पुत्र
क्या तुम परिचित हो-
दीप्तिमती रक्तवर्णा स्वर्गतनया उषाओं से
जो देती बताई संकेत

किसी नव-प्रभात के अरूणोदय का
या फिर-
लाल रंग की यह पसन्दगी
उस साँझ की सूचक तो नहीं
जो लीलती जा रही है
तुम्हारे अस्तित्व को
                                -चुपचाप ?

3 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

निःशब्द रहकर बस पढ़ सकती हूँ, महसूस कर सकती हूँ कविता को ओर उसके भावों को।
घुघूती बासूती

अजेय ने कहा…

अबेदीन की दनदनाती बन्दूकों की
-धधकती आग्नेय प्र्रतिध्वनियंा

अजेय ने कहा…

ऐसी कविता इधर दबा सी दी गयी है .... चलो, ब्लॉग पर तो ज़िन्दा है. बधाई!