गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आदिवासियों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

आदिवासियों के सम्बन्ध में 5 जनवरी, 2011 को उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी 13 मई, 1994 को महाराष्ट्र की भील आदिवासी महिला नंदा बाई के उत्पीड़न के प्रकरण पर सुनाये गये निर्णय का हिस्सा थी जिसमें अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा अपराधियों को अपर्याप्त सजा सुनाई थी। जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की खण्डपीठ ने स्पष्ट टिप्पणी दी कि ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज आदिवासी, जो कि सम्भवतया भारत के मूल निवासियों के वंशज हैं, अब देश की कुल आबादी के 8 प्रतिशत बचे हैं वे एक तरफ गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, बीमारियों और भूमिहीनता से ग्रस्त हैं वहीं दूसरी तरफ भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या जो कि विभिन्न अप्रवासी जातियों की वंशज है उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय में ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ विस्तार से इस बात की चर्चा की गई है कि भारत के असली निवासी कौन हैं - द्रविड़ या उनसे पहले से रह रहे आदिवासी! सारी बहसों को सामने रखते हुए ‘दी केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया’ (भाग-1) के माध्यम से यही साबित किया गया है कि द्रविड़ों से पहले भी यहाँ आदिवासी रहते थे और वर्तमान मुण्डा, भील आदि उनके ही वंशज हैं।

फैसले में ‘वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ माईन्योरिटीज एण्ड इण्डीजीनस पुपिल - भारतः आदिवासी (गूगल) लेख में गौरवशाली इतिहास बताया गया है कि शौर्य के धनी भीलों को 17वीं सदी में निर्दयता से कुचला गया। इनको अपराधी के रूप में पकड़ कर मार दिया जाता था इनका सफाया करने की भरपूर कोशिश की गई है। कुछ भील जहाँ-तहाँ जंगलों और कंदराओं में छिप गये। फैसले में विभिन्न प्रजातियों के बाहर से भारत में आने के सिलसिले का सन्दर्भ दिया है जिनके दबाव में मूल आदिवासियों को अपनी भाषा व संस्कृति से समझौता करना पड़ा। इसके बावजूद मुण्डारी जैसी भाषायें सबसे प्राचीन सिद्ध होती हैं।

प्रस्तुत निर्णय में उपेक्षित, वंचित आदिवासी समाज के उत्थान के लिए संविधान में किये गये प्रावधानों का जिक्र किया गया है। ‘ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों को विशेष सुरक्षा और अवसर दिये जाने चाहिए ताकि वे खुद को ऊपर उठा सकें। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 16(4ए), 46 आदि में विशेष प्रावधान किये गये हैं।’ निर्णय में जोर देकर यह कहा गया है चूँकि आदिवासी यहाँ के मूल निवासियों के वंशज हैं, इसलिए उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया जाना चाहिए। एकलव्य की घटना को रेखाकिंत करते हुए फैसले के बिन्दु क्रम सं. 38 के तहत लिखा है ‘यह द्रोणाचार्य की ओर से एक शर्मनाक कार्य था जबकि उन्‍होंने एकलव्य को सिखाया भी नहीं फिर किस आधार पर गुरू दक्षिणा मांग ली और वह भी उसके दायें हाथ का अँगूठा जिससे कि वह उनके शिष्य अर्जुन से श्रेष्ठ धर्नुधर न बन सके’। फैसले में आदिवासियों के बारे में कहा गया है कि वे सामान्यतया अन्य नागरिकों से ईमानदार, चरित्रवान होते हैं। यही वह समय है कि हम इतिहास में उनके साथ हुए अन्याय को दुरूस्त कर सकें।

नियमित रूप से आदिवासी-जन भारतीय समाज का हिस्सा हैं। परम्परा एवं संस्कृति की दृष्टि से वे भारतीय समाज से पृथक हैं। उनके लिए नीति निर्धारण पृथक से होना जरूरी है तभी उनका विकास सम्भव हो सकेगा, अन्यथा वे लुप्त होती मानव प्रजाति की श्रेणी में ही स्थान पा सकेंगे और भविष्य में ’म्यूजियम’ की वस्तु के रूप में स्मृति के स्तर पर शेष रह जावेंगे।

वैश्‍वीकरण के लाभ जिन व्यक्तियों व राष्‍ट्रों को मिले हैं उनमें अमरीका, यूरोप, जापान जैसे देश धनी देश, धनाढ्य व उच्च कौशल प्राप्त व्यक्ति, व्यावसायिक प्रबंधकीय-तकनीकी लोग, लोकसेवा से पृथक जन, बड़ी फर्म, तकनीकी व पेचीदा प्रक्रिया पर आधारित-उत्पाद के विक्रेता, वैश्विक भद्र वर्ग, बाजारवादी व ब्रांडिंग फर्म एवं जिनको हानि हो रही है उनमें अनेक विकासषील देश, गरीब लोग, निम्न कौशल वाले व्यक्ति, श्रमिक, लोकसेवा पर आधारित व्यक्ति, छोटी फर्म, आधारभूत और मानक वस्तुओं के विक्रेता, वैश्विक आमजन एवं वे फर्म जिनकी बाजार में पहुंच कम होती है तथा कोई प्रचारित ब्रांड नहीं रखती। वैश्‍वीकरण से लाभान्वित होने वाली श्रेणियों में आदिवासी समाज कहीं नहीं टिकता। वह कहीं है तो नुकसान के खाते में ही शामिल दिखायी देता है।

आज आदिवासीजन जिस बड़े संकट से जूझ रहे हैं, वह है पुश्‍तैनी जमीन से विस्थापन जो वैश्‍वीकरण के इस दौर में बहुत तेजी से हो रहा है। बांध परियोजना, राष्ट्रीय उच्च मार्ग, रेल्वे लाईन, खनन-व्यवसाय, औद्योगीकरण, अभयारण्य एवं अन्य कारणों से आदिवासियों का अनिवार्य विस्थापन होता है तो एक तरह से उन्‍हें अपनी पारम्परिक जमीन व परिवेश से खदेड़ने को विवश किया जाता है। इसकी वजह से उनकी जीविका के आधार भी समाप्त होते हैं। प्रश्‍न उठता है उनके जीविकोपार्जन के विकल्प तलाश किये जाने का।

आदिवासियों का विस्थापन भारतीय संविधान की पाँचवीं सूची के प्रावधानों का खुल्लमखुल्ला उल्लघंन है, जिसके तहत आदिवासियों को उनकी पुश्‍तैनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना अधिकारों की गारन्टी दी गयी है। यही वजह रही कि आदिवासियों के लिए बनायी गयी राष्ट्रीय नीति में स्पष्ट प्रावधान रखे गये कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों का विस्थापन कम से कम किया जावे और अगर विस्थापन अति अनिवार्य है तो पुनर्वास के रूप में जीवन का बेहतर स्तर सुनिश्चित किया जावे।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया ने राहुल बहुआयामी शोध संस्थान, दिल्ली द्वारा आयोजित (दि0 12 व 13 नवंबर, 1999) कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में कहा था कि ‘‘बादशाहों के समय में कानून बादशाह बनाते थे, अंग्रेज बनाते थे, राजा बनाते थे और आज आजाद भारत में भी उसको सरकार बनाती है, पर आदिवासियों को न्याय नहीं मिला।’’ गत 26 जनवरी, 2001 के गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र के नाम प्रसारित अपने संदेश में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इस वक्त आदिवासियों पर छाये चौतरफा संकट पर गहरी चिंता जतायी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जुलाई, सन् 1997 के अपने एक निर्णय में स्पष्ट कहा कि ‘संविधान की मंशा है कि अनुसूचित क्षेत्रों की जमीन हमेशा आदिवासियों की बनी रहे, अन्यथा इन क्षेत्रों की शांति भंग होगी, प्रकारांतर से, इनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जायेगा।''

14 मार्च, सन् 2001 के जनसत्ता में डॉ0 ब्रह्मदेव शर्मा का लेख छपा। उन्होंने बताया कि ‘करीब एक करोड़ आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है।’ इस देश में करीब आठ करोड़ आदिवासी अनुसूचीबद्ध हैं। कुछ अन्य समूह भी हैं जो घूमंतू जीवन जीते हैं। वे अपनी भौम से पहले भी उखेड़े हुए हैं।

ये आधिकारिक वक्तव्य प्रश्‍न खड़ा करते हैं कि भविष्य में आदिवासी कहाँ होंगे ? निश्चित है कुछ आदिवासी प्रजातियां पृथ्वी से विलुप्त हो जायेंगी। जंगल-पहाड़ अब वन्य जीवों के लिए सुरक्षित-आरक्षित कर दिये गये हैं। बीच-बीच में फँसे-सिकुड़े पड़े आदिवासियों को वन संपदा के उपयोग से बाकायदा महरूम किया जा रहा है। विकास के नाम पर उनके बट में आया विस्थापन, समय और ‘सभ्यता’ की सतायी यह आदिमानवता आखिर, कहाँ जायेगी, जो न तो जंगली जानवर हैं और न ही मुख्य धारा के सभ्य इन्सान, स्पष्ट है, ये मानव समूह रोजी-रोटी की तलाश में शहर-कस्बों की ओर आयेंगे जहाँ उन्हें रोजगार की अनिश्चितता रहेगी। कड़ी मेहनत के बावजूद मिलेगी घर, दूकानों, संस्थानों की गुलामी या फिर फुटपाथी-भिखमंगा जीवन, पहले तो ये चोर-उठायीगिरे नहीं थे। अब शायद इन असोची परिस्थितियों के दबाव में अपनी गौरवशाली परंपरा को भूलकर पेट भरने के लिए यह सब भी करने लग जायें और हाँ, वैश्‍यावृति जैसे घृणित कर्म में भी अपनी बहू-बेटियों को झौंक दे। आदिवासियों की धार्मिक परंपराओं में सबसे बड़ा ईश्‍वर इनके पुरखे होते हैं। इनकी मान्यता है कि किसी भी दुख-सुख में पुरखे इनके आसपास रहते हैं। पुश्‍तैनी लीक पर चलते रहने के लिए ये लोग अपने इन्हीं पुरखों से सीख लेते रहे हैं। विकल्पहीन जीवन के इस दौर में कहीं ये अपने मासूम बच्चों को बेचने न लग जायें, चूँकि अब ये अपने पूर्वजों के देवलों से बहुत दूर पहुँचने लगे हैं।

जैसे-जैसे स्थानीय या देशज कंपनियो की खाल ओढे़ इन वन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाए वैश्‍वीकरण धंसता जा रहा है। आदिवासी को इतिहास की स्मृति बनाने का यत्न भी शुरू हो गया है। खनिज, वनोपज, जल, भूमि आदि के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति को भी उत्पाद समझ कर व्यापार के योग्य बना दिया गया है। तर्क यह है कि आदिवासियों के रहन-सहन , बोलियों, जीवनयापन, संगीत, कलाओं आदि की समुच्चय-संस्कृति विश्‍व-बाजार की नई उपभोक्ता वस्तु बना दिए जाने से आदिवासी-संस्कृति तालाब के बदले समुद्र के विस्तार का पर्याय समझी जाएगी। वह एक तरह से विश्‍व की सार्वजनिक संपत्ति बनती जाएगी।

अपनी धरती से आदिवासी की जबरिया बेदखली जमीन के एक टुकड़े से एक परिवार के विस्थापन का पर्याय भर नहीं है। यह समस्या पूरी दुनिया में आदिवासी झेल रहे हैं। एक ओर तो कल्याणकारी सरकारें बीच सड़क में बना दिए गए किसी धर्म-स्थान से घबरा कर राष्ट्रीय राजमार्ग तक को मोड़ देती हैं। दूसरी ओर वही सरकारें बड़ी आसानी से विकास का मुखोटा ओढ़ कर अंग्रेजी राज के भूअर्जन अधिनियम, 1894 के हथियार से हजारों आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल कर देती है।

यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है। पहले जमींदारों, औपनिवेशिक ताकतों और बड़े भूस्वामियों की महत्वाकांक्षाओं के कारण, अब खनिज ठेकेदारों, वन-शोषकों और बड़े कारखानों वाले उद्योगपतियों के कारण। वैसे भी आदिवासियों के भूमि संबंधी पुश्‍तैनी अधिकारों का लेखा-जोखा सरकारों के पास नहीं रहा है।

अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों के पक्षधर प्रख्यात विद्वान एवं चिन्तक लेवी स्ट्रॉस ऐसे समय दुनिया से विदा (28 नवम्बर, 2009) हुए जब भारत समेत धरती भर की जनजातियां ‘सभ्यताओं’ के परोपकार से बचने का रास्ता ढूंढ रही हैं। शायद आदिवासी अपने समय से पीछे नहीं, गैर-आदिवासी अपने समय से कुछ ज्यादा आगे (पर्यावरण के विनाश के मुहाने तक) चले गए हैं। अंतिम दिनों में लेवी स्ट्रॉस कुछ निराश थे। उन्हें लगने लगा था कि भूमंडलीकरण और सांस्कृतिक एकरूपीकरण का अजगर जल्द ही जनजातियों के छोटे-छोटे समुदायों को निगल जाएगा। (ईश्‍वर दोस्त,जनसत्ता-(29 नवम्बर, 2009)

भारत की वन नीति में स्पष्ट रूप से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के गांवों को बाकायदा ’वन्य-ग्राम’ की संज्ञा दी गई है और यह भी प्रावधान रखे गये हैं कि राजस्व गाँवों की तरह सारी सुविधाएं वन्य गांवों को उपलब्ध करायी जावे जिनमें शिक्षा, चिकित्सा, विद्युत, संचार, सड़क, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अनाज भण्डार, विकसित कृषि की सुविधाएं, पशु-चिकित्सालय, बैंक, सहकारी संस्थाएं, छुटपुट वनोत्पाद का उपभोग, बिचौलियों के शोषण से मुक्ति की व्यवस्था आदि-आदि शामिल हो।

आदिवासी विकास की समस्या अत्यन्त जटिल रही है और इसकी एक मात्र वजह यह रही है कि उनके विकास की बात उनकी जीवन शैली,सांस्कृतिक परम्पराओं एवं मनोदशा को ध्यान में रखकर नहीं की गई है । पं0 जवाहर लाल नेहरू ने आदिवासी विकास के पंचशील तय किये थे। जिन्‍हें अभिव्यक्त सर्वप्रथम वेरियर एलविन द्वारा लिखी गई किताब पूर्वात्तर सीमा क्षेत्र पर लिखी गई पुस्तक के प्रस्तुति वक्तव्‍य के रूप में हुई थी । आदिवासी विकास में यह सूचना निम्न प्रकार से हैः-

1- आदिवासी का विकास उनकी मनोदशा एवं परम्पराओं के आधार पर होना चाहिये, बाहर से थोपी जाने वाली नीति के तहत नहीं, इस क्षेत्र में आदिवासी परम्परागत कला व संस्कृति पर जोर दिया जाए।

2- आदिवासियों के जंगल व जमीन पर अधिकारों का सम्मान किया जावे।

3- प्रशासनिक एवं विकास में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को महत्व दिया जाना चाहिये। तकनीकी विशेषज्ञ शुरूआत में बाहर से लाये जा सकते है अन्यथा बाहरी व्यक्तियों के हस्तक्षेप को नही के बराबर रखना चाहिये ।

4- आदिवासियों के परम्परागत समाज व सांस्कृतिक संस्थाओं के आधार पर ही आदिवासी क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिये । आदिवासी विकास का मापदण्ड, खर्च की जाने वाली राशि एवं विकास के आंकड़ों पर आधारित न होकर विकास की गुणवता के आधार पर होनी चाहिये । आदिवासी मुद्दों के विशेषज्ञ स्वयं वेरियर एलविन ने भी इस बात पर जोर दिया कि भारतीय समाज के लिए आदिवासियों का जो परम्परागत अवदान है उसका सम्मान किया जाना चाहिये एवं इस अवदान को भारतीय समाज में उत्थान के सहायक के रूप में देखना चाहिए न कि आदिवासी समाज को भारतीय समाज से पृथक ?

यह अत्यन्त उल्लेखनीय बात है कि नंदा बाई के मुकदमे के बहाने भारत के उच्चतम न्यायालय ने आदिवासियों से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों को रेखांकित करते हुए व्यवस्था को आगाह किया है कि अगर आदिवासियों की अस्मिता व उत्थान को प्राथमिकता के आधार पर नहीं लिया गया तो यह देश के लिए शर्मनाक होगा। यह निर्णय आदिवासियों के कल्याण के लिए मील का पत्थर सिद्ध होना चाहिए और वह भी उस दौर में जब देश की करीब 40 प्रतिशत प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा आदिवासीजन हजारों सालों से करते आ रहे हैं और अब उस सम्पदा को देशी-विदेशी कम्पनियों द्वारा छीनने की भरसक कोशिश की जा रही है। आदिवासियों का हित केवल आदिवासी समुदाय का हित नहीं है प्रत्युतः सम्पूर्ण देश व समाज के कल्याण का मुद्दा है जिस पर व्यवस्था से जुड़े तथा स्वतन्त्र नागरिकों को बहुत गम्भीरता से सोचना चाहिए।





3 टिप्‍पणियां:

bhamare bansilal ने कहा…

आदरणीय हरिरामजी,जय जोहार! आदिवासी समाज की तमाम गतिविधियों पर केंद्रित 'आदिवासी जगत' से मैं बहूत अभिभूत हूं.अबतक की सारी पोस्ट आदिवासी विमर्श की दृष्टीसे काफी महत्त्वपुर्ण है.हाल ही में प्रकाशित पोस्ट 'आदिवासियों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला' काफी पठनीय है.अब सर्वोच्च न्यायालय ने ही इसपर मुहर लगा दी है कि,आदिवासी ही इस देश के मुल निवासी है.यह एक ऐतिहासिक,क्रांतिकारी फैसला है.इसका जोरशोर स्वागत किया जाना चाहिए.

यदि बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/ Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-सम्पादक-PRESSPALIKA, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान, Mob : 98285-02666 ने कहा…

आदरणीय श्री हरिराम मीणा जी,
नमस्कार|

सुप्रीम कोर्ट ने तो नन्दाबाई के बहाने भारत के मूलनिवासियों को मूल निवासी होने का प्रमाण दे दिया| हमेशा सच्चाई को परीक्षा देनी होती है और प्रमाण पेश करने होते हैं, सो प्रमाण तो मिल गया, लेकिन आपने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बहाने अपने आलेख में गहन, गम्भीर, चिन्तन और अपने परिश्रम से परिपूर्ण संवेदनाशील अनुभव का सकारात्मक उपयोग करके इसका जो गवेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है| उसके लिये आपको हृदय से धन्यवाद और साधुवाद|

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में और आपने अपने आलेख में आदिवासी नस्ल के बद से बदतर हो रहे हालातों को रेखांकित करने के लिये संजीदगी और संवेदनाओं को जिन्दा करने का प्रयास किया है| जिसके लिये आदिवासी समाज ॠणी रहेगा| फिर भी सबसे बड़ा यख प्रश्‍न तो ये है कि इस देश में सरकार और प्रशासल द्वारा मानवीय संवेदनाओं को कितना महत्व दिया जाता है?

मेरे एक आलेख पर एक पाठक (वकील) लिखते हैं कि हमारे देश में आज ४००० से भी अधिक सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सरकार एवं प्रशासन द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है| ऐसे में प्रस्तुत प्रकरण में दिया गया निर्णय भी दफन हो जायेगा और हम केवल सन्दर्भ देने के लिये और, या ये सिद्ध करने के लिये कि इस देश के मूल निवासी कौन हैं, इस निर्णय का उपयोग करते रहेंगे| इसके अलावा इन निर्णयों का सम्भावित हश्र हम सभी जानते हैं| अन्यथा इतने महत्वपूर्ण निर्णय पर मीडिया की बेरुखी, बल्कि चुप्पी का क्या औचित्य है? इस निर्णय पर तो लगातार डिबेट करवाई जानी चाहिये थी| विचार गोस्ठियॉं होनी चाहिये थी| लेख लिखे जाने चाहिये थे| कम से कम आदिवासी वर्ग के जन प्रतिनधियों और लोक सेवक प्रतिनिधियों को तो इस मामले पर कुछ न कुछ करना चाहिये था| मगर हर ओर सिर्फ चुप्पी और सन्नाटा!

मानव-भावनाओं के आवेग और शुद्ध विचारों के स्वाभाभाविक प्रभाव के कारण यदाकदा ऐसे निर्णय सामने आते रहते हैं, लेकिन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ही नर्बदा बॉंध की उँचाई बढाने वाले अपने पूर्ववर्ती निर्णय को पलटने में संकोच नहीं करता है| कुछ जज होते हैं, जिन्हें सच्चाई या सही या मौलिक बात न्यायिक निर्णयों में समाविष्ट करने का अपना न्यायिक धर्म याद रहना है| उनमें से एक हैं मार्कण्डेय काटजू जी| जिसका परिणाम है, यह निर्णय|

इसके विपरीत स्वयं आदिवासियों के निर्वाचित प्रतिनिधि और संविधान के अनुच्छेद १६ (४) में यथा परिभाषित शासकीय लोक सेवक प्रतिनिधि, अपने वर्ग के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करने के बजाय, कुछ और ही, बल्कि विपरीत करते नजर आते हैं| ऐसे में जहॉं अपने ही लोग, अपनों के प्रति असंवेदनशील हों तो उन आर्यों के वंशजों से जिनके कारण आदिवासी की वर्तमान दशा है, क्या आशा की जा सकती है?

इस सबके उपरान्त भी आप जैसे विद्वान और संलीदा लोगों के संवेदनशील विचारों को पढकर लगने लगता है, कि अभी आशा नहीं छोड़नी चाहिये| हालांकि अ. भा. आदिवासी विकास परिषद से लेकर डॉ. उदित राज के अजा/अजजा संगठनों के अ. भा. परिसंघ तक सर्वत्र केवल दिखावा, नाटक और लूट ही लूट नजर आती है!

आदिवासी के मामले में हर कोई समस्या का उपचार, बल्कि प्राथमिक उपचार करने की बात तो बढचढकर करता है, लेकिन मर्ज के असल कारण का निवारण कोई नहीं चाहता| सम्भवत: करना ही नहीं चाहते या कहो कि उपचार करने की इच्छाशक्ति का ही अभाव है| बेशक पं. नेहरू हो या राहुल गॉंधी| चाहे दिलीप सिंह भूरिया, जुऐल उरांव, कान्तिलाल भूरिया, अरविन्द नेताम, जसकौर मीणा, नमोनारायण मीणा या फग्गन सिंह कुलस्ते या अन्य कोई भी आदिवासी किसी भी पद पर रहा हो| कोई भी कुछ नहीं करना चाहता| सबके सब येनकेन प्रकारेण अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं, जो सम्भवत: उनकी भी व्यवस्थागत विवशता है!

इसी प्रकार से एक जनजाति का अफसर कुर्सी पर बैठने के बाद भूल जाता है कि उसे दूसरों की तुलना में कम योग्य होते हुए भी आरक्षित कोटे में इसलिये चयनित किया गया है कि वह अनुच्छेद १६ (४) की भावना के अनुसार प्रशासन में अपने वर्ग का केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं करे, बल्कि सशक्त प्रतिनित्व करे| अपवाद को छोड़कर यह भाव आरक्षित वर्ग के लोक सेवकों में लुप्त है या कहो यह भाव आज तक जगा ही नहीं|

इन हालातों में केवल फंतासी सम्भावनाओं पर जिन्दा रहने के अलावा आदिवासी के पास शेष क्या है?

शुभकामनाओं सहित|
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
सम्पादक-पेसपालिका (पाक्षिक) एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय : 7-तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
0141-2222225E 98285-02666

Rajendra Singh ने कहा…

Dr.Purushottam Ji,
Apka prayas kabile tarif hai. Adiwasi Jagat ke Jan Jagran ka jo apne shankhnad kiya hai usme aapse agrah hai ki is mission Aapke dwara sangrahit gyanarjan anusar bhartiya aadiwasi kaume kaun kaun see hai. kyonki sarkari dastavejo ke anusar to kai kaume chhodi gai hai ya vivadaspad stithi me hai.
Rajendra Singh Kewat
NAF, Jabalpur