बुधवार, 12 अगस्त 2009

ढकपअझयह बात है आज से कोई पन्द्रह बरस पहले की। पथिक बाबा (वी.पी.वर्मा) के द्वारा संपादित आदिवासी पत्रिका ‘अरावली उद्घोष’ में मैंने मानगढझे ऐसी घटना की जानकारी नहीं थी। जानकारी होती भी कहाँ से? मैं दक्षिणी राजस्थान के उस अँचल में इससे पहले कभी गया नहीं न वहां के किसी परिचित व्यक्ति ने मुझे ऐसी किसी घटना के बारे में बताया और न ही कहीं इतिहास की पुस्तकों में मैंने ऐसी शहादत के बारे में पढ़ा। बाद में उदयपुर कई बार जाना हुआ। जब भी वहाँ जाता पथिक बाबा से अवष्य मिलने का प्रयास करता। ऐसे अवसरों के दौरान आंचलिक बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एन.जी.ओज से जुड़े कार्यकर्ताओं व जागरूक आदिवासियों से मिलता। मानगढ़-ंउचयबलिदान के विषय में प्रमुखता से बातचीत करता। कुछ सूचना एवं संदर्भ एकत्रित करने का प्रयास करता रहा। इतिहास के स्तरीय अध्ययन से कभी जुड़ा नहीं और न ही शोधार्थी रहा। पुलिस-ंउचयकर्म से सम्बन्ध रखते हुए एक खोजी दृष्टि अवष्य विकसित हुई। अतः घटना की पुष्टि में प्रमाण जुटाता गया। व्यस्तताएं अपनी जगह थी, प्रष्न था प्राथमिकताओं का, जो तय कर ली और अंतत 2001 में जयपुर से मानगढ़ तक का सफर पूरा किया। घटना के बारे में इतनी सामग्री, संदर्भ व सूचनाएं एकत्रित हो चुकी थी कि अब कुछ लिखा जा सकता था। और लिखा ‘मानगढ़ -ंउचय आदिवासी बलिदान के तहखानों तक’ यात्रा वृत्तांत जिसे ‘पहल’-ंउचय71 (2002) में ज्ञानरंजन जी ने मन से छापा। मुझे सुखद अनुभूति हुई। मानगढ़ की वह घटना इधर-ंउचयउधर चर्चा में आयी। मैं पढताझाबुआ का टंट्या मामा, गुजरात का जोरजी भगत (दोनों को 1880 के दशक में अंग्रेजों ने फांसी दी) और मानगढ-ंउचयबलिदान का नायक गोविन्द गुरू। आदिवासी दुनिया का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानव की उत्पत्ति का। उनके नैसर्गिक व शांत जीवन में पहला त्रासद हस्तक्षेप हुआ आर्य-अनार्य संघर्ष-ंउचयश्रंृखला के युग में जब उन्हें मैदानी क्षेत्रों से विस्थापित होकर जंगलों की शरण लेनी पड़ी। वे जंगल पर आधारित जीवन को सहज रूप में जीना सीख गये। घर व परिवार की संस्था के बावजूद व्यक्ति व निजी सम्पति की अवधारणा उन अर्थो में विकसित नहीं हुई जिन अर्थो में इसे समझा जाता है। समाज संस्कृति सामूहिकता पर आधारित रहती आयी। विशेष रूप से दसवीं से बारहवीं और पश्चातवत्र्ती कालखण्ड में फिर उथल-ंउचयपुथल हुई और तत्कालीन राजस्थान के आदिवासियों की स्वायत्तता को बाहर से आये राजपूतों ने छीन लिया। विजेता कौमें हारी हुई मानवता को हेयद्ष्टि से देखती रही है। यही यहाँ हुआ। इसके बावजूद समाज व संस्कृति के स्तर पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ सका । जिस मात्रा में स्वतंत्रता छिनती है उसी मात्रा में शोषण व विपन्नता पैर फैलाती है। राज की बेगार, महाजनी सूदखोरी व मनुष्य के स्तर पर दोयम दर्जा सौगात में मिले, फिर भी जंगल से बेदखली की नौबत नहीं आयी। फिर आयी ईस्ट इंडिया कम्पनी। राजपूताना कहे जाने वाले अंचल के दक्षिणी भू-ंउचयभाग की बड़ी रियासत मेवाड़ की राजधानी उदयपुर में सन् 1818 में कुपदार्पण हुआ कम्पनी सरकार के प्रतिनिधि कर्नल जेम्स टाॅड का। उसकी रणनीति के तहत दक्षिण राजपूताना की प्रमुख रियासत मेवाड़ सहित वागड़ अंचल की डूगंरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ, कुशलगढ व सीमावर्ती गुजरात की संतरामपुर व ईडर रियासतों के साथ सन्धियां की गयी जिनके प्रमुख प्रावधान थे वनोपज पर अधिकार, खनिज सम्पदा का दोहन और इसके बदले सम्भावित आदिवासी विद्रोहों को कुचलने के लिए सैन्य बल। टाॅड के उत्तराधिकारियों का सिलसिला जारी रहा और रियासती व्यवस्था मंे कम्पनी का हस्तक्षेप भी। स्वाभाविक था कि आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड़ते। सन् 1820 के दशक में विद्रोह आरंभ हो गये और यह क्रम चलता रहा । विद्रोह से निपटने के लिए कम्पनी व रियासत की फौजें असफल रहीं। विकल्प तलाशा गया कि आदिवासियों को नियन्त्रित करने के लिए उसी समाज के युवकों की फौजें तैयार की जावे। सन् 1840 के दशक में खैरवाड़ा, कोटड़ा, एरिनपुरा, देवली, नीमच आदि स्थलों पर छावनियों की स्थापना की गई। आदिवासी सैनिक और नियन्त्रक अधिकारी दूसरे तथा कमाण्डेंट कम्पनी के अंग्रेज अधिकारी । फिर भी विद्रोह नहीं थमें। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी भी पीछे नहीं रहे। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, कुषलगढ़ रियासती क्षेत्रों में भीलों की बहुलता और दूसरी बड़ी संख्या मीणा आदिवासियों की। प्रतापगढ़ रियासत मंें मुख्यतः मीणा आदिवासियों की आबादी। मानगढ़ के चारों ओर पसरा यह अंचल राजपूताना का दक्षिणाांचल था और इस दक्षिणाांचल की पूर्वी दिषा में सीमावर्ती रतलाम, सैलाना व झाबुआ रियासतें तथा पष्चिम में झालोद, सूँथ व ईडर की रियासतें। यह सारा अंचल आदिवासियों से आबाद था। लेकिन इस सारे भू-ंउचयक्षेत्र के षासक गैर आदिवासी अर्थात् राजपूतों के विभिन्न वंषों के महाराणा, महाराजा, महारावल, जागीरदार, ठिकानेदार, भौमिया व उनके अधीन कार्यरत हाकिम-ंउचयहुक्मरान थे और इन सब के ऊपर ब्रिटिष सत्ता थी, जिनके पोलिटिकल एजेण्ट, विभिन्न फौजी छावनियों के कमाण्डेंट, रेजीडेंट और अन्य अफसर ब्रिटिष क्राउन के प्रमुख प्रतिनिधि गवर्नर जनरल व वायसराय के अधीन रहकर रियासतों के सारे निर्णय लेते थे। राजा-ंउचयमहाराजा अंग्रेज हुकूमत की कठपुतली थे। कर्नल टाॅड के जमाने की ईस्ट इण्डिया कम्पनी और रियासतों के मध्य हुईं सन्धियों के सिलसिले से लेकर सन् 1857 के संग्राम के बाद भारत पर ब्रिटिष राज की सीधी दखलन्दाजी तक की प्रक्रिया में ये हालात पैदा हुए थे। रियासती सत्ता द्वारा किए जाने वाले अत्याचार, ब्रिटिष राज का हस्तक्षेप और शोषण-ंउचयदलन-ंउचयदमन और अभाव -ंउचयभुखमरी-ंउचयमहामारी के अघाये-सताये और अनेकानेक आषंकाओं, अनिष्चयों, अविष्वासों से घिरे हुए भयभीत आदिवासी। 19वीं सदी के अंतिम चरण में जो कुछ बुरी घटनाएँ घटित हुईं, सत्ता के स्तर पर जो कुछ राजनीतिक परिवर्तन हुए, ब्रिटिष-ंउचयषोषण के जो नये-नये तौर तरीके और रणनीतिक दाँव पेंच अपनाये गये और इन सबके विरूद्ध नाना प्रकार के दुःख-ंउचयदर्दों को झेलते रहने के साथ-ंउचयसाथ हालात के विरूद्ध विद्रोह की जो आग अंचल के आदिवासियों के भीतर सुलगती रही-ंउचय इस सबको मूक साक्षी मानगढ़ ने अपनी अदृष्य आँखों से देखा। मानगढ़ पर धूणी जमाये संपसभा के आदिवासी नायक और प्रमुख नायक गोविंद गुरू इस सारे माहौल से वाकिफ थे। आदिवासियों के दुःख-ंउचयदर्दों का उनको प्रत्यक्ष अनुभव था। ब्रिटिष सत्ता के गलियारों और देषी रियासतों के दरबारों के आसपास काफी आदिवासी लोग थे। वे ब्रिटिष फौजी छावनियों में फौजियों के रूप में भर्तीषुदा थे। छावनियों के अफसर-ंउचयमैसांे में लाँगरी व अर्दलियों के रूप में थे। रियासती दरबारों में आदिवासी लोग सेवादारों के रूप में थे। आदिवासियों के समूह के समूह दुर्गोंे, महलों, बगीचों और अन्य निर्माण-कार्यों में बेगार करने के लिए जबरन ले जाये जाते थे। अंग्रेजों और रियासती शासकांे द्वारा आदिवासियों के विरूद्ध क्या नीतियां बनायी जाती थी और क्या-क्या निर्णय लिए जाते थे -ंउचय यह सब बातें उन सेवकों और बेगारियों तक छन छन कर आ ही जाती थी। अंग्रेज चालाक, धूर्त, ठग और स्वार्थी थे। साथ ही वे षिक्षित, बुद्धिमान और दूरगामी सोच रखने वाले थे। अधिकांश देसी रियासती सत्ताधीष और उनके नुमाइंदे अत्याचारी, अय्याष और अहंकारी थे। ब्रिटिष अधिकारियों से निकटता को परम सम्मान मानते थे। खास तौर पर आयोजित दावतों के दौरान उनमें से कुछ शराब के नषे में डींग मारने लगते थे। सेवकों के सामने गोपनीय बातों को बक देते थे। उन्हें यह होष नहीं रहता था कि किस के सामने या किस की उपस्थिति में क्या बात कहनी चाहिए और क्या नहीं। कुछ राजा-ंउचयमहाराजा चाहे गम्भीर हों, लेकिन जागीरदार तो अक्सर ऐसा कर ही देते थे। उनमें दम्भ और शेखी बघारने की प्रवृत्ति अधिक दिखायी देती थी। अंग्रेज अफसरों की सोच वैज्ञानिक, विवेक व तर्क सम्मत और आधुनिक थी जबकि देसी राजा-ंउचयमहाराजाओं एवं जागीरदारों का दृष्टिकोण सामंती परम्पराओं में जकड़ा हुआ रहता था। छावनियों के आदिवासी फौजी, अर्दली, सईस और रियासती आदिवासी सेवक एवं बेगारी चाहे अनपढ़ थे, मगर जीवन का क्रूर यथार्थ और व्यापक अनुभव उनके पास था। वे अगले के चेहरे के भावों को भाँप सकने की क्षमता रखते थे। फिरंगी हुक्मरानों और राजा-ंउचयमहाराजाओं के बीच होने वाली वार्ता सफल हुई या असफल-ंउचय यह उनके आसपास सेवा कार्य में लगे रहने वाले आदिवासी-ंउचयजन उनकी मुख-ंउचयमुद्राओं को पढ़कर जान जाते थे। ब्रिटिष सत्ता-ंउचयकेंद्रों और रियासती दरबारों से निकली बातें मानगढ़ तक पहँुचती थी और मानगढ से संपसभा के कार्यकर्ताओं के माध्यम से दूर-ंउचयदराज के आदिवासी अंचलों तक। यह प्रक्रिया लंबी, धीमी और बात के असल रूप को थोड़ा बहुत तोड़ने-ंउचयमरोड़ने वाली अवष्य थी, लेकिन बात का अर्थ काफी कुछ बचा रहता था। यह सब गोविंद गुरू, संपसभा के अन्य नायकों व कार्यकत्र्ताओं और समूची आदिवासी कौम के लिए अत्याचारों के विरूद्ध जागृति व संघर्ष की भावी रणनीति बनाने के लिए काफी सार्थक और अनिवार्य था। तो इसी तरह गोविंद गुरू व साथियों को यह पता चला कि बांसवाड़ा के महारावल लक्षमणसिंह द्वारा अंग्रेज सरकार का खिराज समय पर नहीं दिया जाता है। ब्रिटिष सरकार ने राज्य को ऋण ग्रस्त तथा चढ़ा हुआ खिराज चुकाने में असमर्थ और दुर्भिक्ष पीड़ित देखा। तब शासन सम्बन्धी अधिकार महारावल से लेकर सहायक पोलिटिकल ऐजेंट के सुपुर्द कर दिए। एजेंट की सहायता के लिए पाँच सदस्यों की एक कौंसिल का गठन कर दिया गया। इसका महारावल ने विरोध करना चाहा लेकिन उसमें साहस की कमी थी और उसके सलाहकार भी ढीले-ंउचयढाले थे। दूसरे, वह लार्ड कर्जन के गवर्नर जनरल व वायसराय होने का समय था। उस काल में देसी रियासतों में ब्रिटिष हस्तक्षेप काफी बढ़ता जा रहा था। कौंसिल के शासनकाल में बांसवाड़ा राज्य की अर्थ व्यवस्था में काफी परिवर्तन किए गये। बजट बनाने की प्रणाली का आरम्भ किया गया ताकि आय-व्यय का व्यवस्थित लेखा-ंउचयजोखा तैयार किया जा सके। कहाँ कमी है, उसे ठीक किया जा सके। पुलिस महकमें का पुनर्गठन किया गया। आदिवासी विद्रोहों को नियन्त्रित करने और विद्रोहियों को पकड़ने के लिए महत्वपूर्ण स्थलों पर पुलिस की चैकियां स्थापित की गयी। खुफिया तंत्र को मजबूत करने के प्रयास किए गये। न्याय-ंउचयप्रषासन में भी काफी फेरबदल किया गया। नये साक्ष्य अधिनियम, दण्ड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दण्ड संहिता के कुछ प्रावधानों के आधार पर रियासती विधि-व्यवस्था में संषोधन किए गये। सायर की शुल्क दरों को नियत किया गया। किसानों से पैदा हुई फसल के हिस्से को राजकोष में लेने की प्रणाली को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर जमीन की पैमाइष के द्वारा पैदावार के अनुसार सावधिक ठेका प्रथा की शुरूआत की गयी। पुलिस व वसूली के काम के लिए अलग-ंउचयअलग हाकिम नियुक्त किए गये। जंगलात का नया महकमा खोला गया। स्वास्थ्य व सफाई के लिए राज्य की राजधानी में म्यूनिसिपल कमेटी का गठन किया गया। सारे राज्य में सालिमषाही सिक्के के प्रचलन को बंद कर उसकी जगह कलदार सिक्के का प्रचलन आरम्भ किया गया। प्रभु-ंउचयवर्ग के बच्चों को षिक्षित करने के लिए स्कूलों की व्यवस्था शुरू की गयी। सम्प्रेषण-ंउचयसुविधाएँ बढ़ाने के लिए डाक व तार के माध्यम को अपनाया गया। अंग्रेजों ने बांसवाड़ा राज की अंगुली पकड़ते-ंउचयपकड़ते कलाई को पकड़ा था। कुछ अर्सा पूर्व महारावल लक्ष्मणंिसंह और कुषलगढ़ के राव के मध्य तनातनी पैदा हो गयी थी। राजा के रूप में महारावल लक्ष्मणंिसंह की कमजोरियों के चलते कुषलगढ़ के राव ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और महारावल के आदेषों को मानने से इन्कार कर दिया था। ब्रिटिष सरकार की दखल से कुषलगढ़ के राव और महारावल बांसवाड़ा के बीच समझौता हुआ। बांसवाड़ा को कमजोर बनाने के लिए अंग्रेजों ने समझौते मंे तय करवाया कि भविष्य में कुषलगढ के आंतरिक मामलों में महारावल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। व्यापार-ंउचयशुल्क व खिराज सम्बन्धी मामले भी दोनों रियासतों के स्वतंत्र मान लिए गये। यूं कर महारावल बांसवाड़ा के अधिकारों में कटौती प्रारम्भ हुई और ब्रिटिष पोलिटिकल एजेंट की सर्वोच्चता स्थापित होती गयी। पहले बांसवाड़ा रियासत के मामलों को मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट देखता था। बाद में पृथक से सहायक पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा के लिए हो गया। वही कुषलगढ का नियन्त्रक बन गया। राजपूताना के अन्य राज्यों की तरह बांसवाड़ा रियासत के क्षेत्र में भी अधिकांष भूमि पर जागीरदारों का कब्जा था। खालसा क्षेत्र की भूमि बहुत कम थी। महारावल लक्ष्मणसिंह और ठिकानेदारों के बीच अक्सर विवाद पैदा होते रहते थे। सन् 1871 में गुढा के जागीरदार हिम्मतंिसंह और गढी के ठाकुर का महारावल से विवाद हो गया। इसी दौरान औरीवाड़ा के ठिकाने से मतभेद पैदा हो गया। अंग्रेज अधिकारियों ने पहले तो विवादों को बढ़ावा देने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई और अंत में सहायक पोलिटिकल एजेंट की दखल से विवादों का निबटारा करवाया ताकि उनकी पंचायती चलती रहे। दल्ला रावत सोदलपुर इलाके के भीलों का मुखिया था। उसने महारावल के विरूद्ध बगावत कर दी। यह विवाद बोलाई व रखवाली करों को लेकर हुआ था। सहायक पोलिटिकल एजेंट के हस्तक्षेप से ही इस विवाद का निबटारा हुआ। इसी क्रम में बांसवाड़ा राज्य और निकटवर्ती डूंगरपुर , उदयपुर , प्रतापगढ़, रतलाम, सैलाना, झाबुआ, झालौद और सूँथ रियासतों के बीच सीमा विवाद चलते रहते थे। इन विवादों का निबटारा भी अंग्रेजों की दखल से होने लगा। प्रतापगढ़ रियासत मंे अधिकांष जनसंख्या मीणा व उसके बाद भील आदिवासियों की थी। उन्नीसवीं व बीसवीं सदियों के संधिकाल से पूर्व प्रतापगढझाया जाने लगा। ब्रिटिष अधिकारियों के हस्तक्षेप की वजह से प्रतापगढ़ राज्य में जनगणना, स्वास्थ्य केन्द्र , पाठषाला, स्टाम्प, कोर्ट-ंउचयफीस आदि की व्यवस्था आरम्भ की गयी। पुलिस व सेना का पुनर्गठन किया गया। बांसवाड़ा की तर्ज पर आपराधिक कानूनों में संषोधन किया गया। सन् 1890 के दषक में बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणंिसंह और प्रतापगढ़ के महारावल रघुनाथंिसंह के मध्य सीमावर्ती धार्मिक स्थल सीतामाता को लेकर विवाद पैदा हो गया था। ब्रिटिष अधिकारियों ने हस्तक्षेप कर इस विवाद को निबटाया। बांसवाड़ा राज्य से कुषलगढ़ निकल जाने के बाद बांसवाड़ा छोटी रियासत बन गयी थी। अब प्रतापगढ़ उसके टक्कर की रियासत थी। सीतामाता स्थान को सहायक पोलिटिकल एजेंट ने प्रतापगढ राज्य को दिलवा दिया। इस निर्णय से दोनों राज्यों मंे भीतर ही भीतर अनबन आरम्भ हो गयी। इस अनबन का अंग्रेजों ने खूब फायदा उठाया। ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का यह एक उदाहरण था। ब्रिटिष अधिकारियों की दखल से मथुरा निवासी पं. मोहनलाल पंड्या को प्रतापगढ़ रियासत का कामदार और अजमेर के रायबहादुर सेठ सौभागमल डढ्ढा को खजांची नियुक्त कर दिया। इन नियुक्तियों का महारावल रघुनाथ ंिसंह विरोध नहीं कर सका। प्रतापगढझ

1 टिप्पणी:

अर्शिया ने कहा…

इस प्रेरक जानकारी के लिए आभार।
( Treasurer-S. T. )