सोमवार, 11 जनवरी 2010

क्या जंगलों को ......


गोरे राज्य के प्रमुख ने कहलवाया है-
कि वे हमारी जमीन खरीदना चाहते हैं।
उनके सरदार ने दोस्ती और भाईचारे का संदेष भी
भिजवाया है।
यह उनका बड़प्पन है।

हम जानते हैं कि उन्हें हमारी दोस्ती की जरूरत नहीं:
लेकिन उनके प्रस्ताव पर हम विचार करेंगे, क्योंकि हम
यह भी जानते हैं कि यदि जमीन नहीं बेची तो तोपों
सहित आ सकते हैं ये गोरे लोग।
किस तरह तुम बेच या
खरीद सकते हो आकाष को ?
या पृथ्वी के स्नेह को ?
ये बात हमें समझ नहीं आती
जब हवा की ताजगी
और पानी की स्फूर्ति
हमारी मिल्कियत नहींः
तो कैसे बेच सकते हो उनको ?

पानी के कल-कल में सुनाई देती है
हमारे पूर्वजों की आवाज
नदियां हमारी दोस्त हैं, प्यास बुझाती है
इनकी लहरों पर खेलती हैं हमारी छोटी नावें
और मिटाती है हमारे बच्चों की भूख और प्यास।
तो तुम उसे वही प्यार और स्नेह देना
जो तुम अपने प्रियजन को देते हो।
गोरों को आगे बढता देख
हम आदिवासी हमेषा पीछे हटे हैं
जैसे सूर्य के उदय होते ही
भाग जाता है पर्वतों से कोहरा।
यहाँ बिखरी है हमारे पूर्वजों की राख,
और ये पेड़, ये पर्वत और धरती का यह भाग,
पवित्र है, इन्हीं पर टिकी है
हमारे पूर्वजों की समाधियां।

हम जानते हैं कि गोरे हमारे तौर तरीकों को
नहीं समझते,
उनके लिए सभी जमीन एक जैसी है।
नहीं लगाव किसी भी जमीन के टुकडे के साथ-
वे अजनबी की तरह अंधेरे में आते हैं
और ले जाते हैं वो सब, जो उन्हें चाहिए।

जमीन उनकी दोस्त नहीं, दुष्मन है
जिसे जीत कर वे आगे बढ जाते हंै
और छोड़ जाते पीछे पिता की समाधि-
इसकी भी उन्हें कोई परवाह नहीं
अपने बच्चों से छीन लेते हंै धरती
इसकी भी उन्हें परवाह नहीं।

मां समान धरती और पिता समान आकाष,
उनके लिए बेजान बाजारू चीजें हंै,
जिसे वे भेड़ों या चमकते मोतियों की तरह खरीदते-लूटते और बेच देते हंै।

एक दिन आएगा जब उनकी विषाल भूख सारी धरती
निगल लेगी
और रह जाएगी सिर्फ रेगिस्तार की बालू

मंै समझ नहीं पाया,
षायद हमारे जीने का ढंग तुमसे अलग है
तुम्हारे षहरों के नजारों को देख,
आँखों में चुभन होती है
लेकिन षायद हम आदिवासी जंगली हैं, असभ्य हैं,,
जो तुम्हारी बातें नहीं समझ पाए।
तुम्हारे षहरों में कोई गली षांत नहीं,
कोई ऐसी जगह नहीं जहां सुनाई दे
वसंत में कोपलों का खिलना,
या किसी कीट के पंखों की सरसराहट।

लेकिन मैं तो असभ्य हूं।
और इसलिए षायद नहीं समझता तुम्हारी बातें
यहां का षोर कानों को चोट पहुंचाता है
ऐसे जीवन का क्या अर्थ जहां इंसान नहीं सुन सकता
एक जानवर के अकेलेपन का रूदन ?
या रात को किसी पोखर में मेंढकों का वाद-विवाद।

मैं एक आदिवासी हूं इसलिए तुम्हारी बातें नहीं समझता
हमें तो सुहाती हैं हवा की वो मीठी धुन
जो तालाब की सतह को छूती हुई निकल जाती है
और बारिष में मिट्टी की भीनी-भीनी खुषबू,
या फिर पेड़ों की महक से भरी हुई बयार।

हमारे लिए हवा बहुत कीमती है
क्योंकि सभी -पशु, पक्षी, तरू, मानव, उसी हवा में
साँस लेते हैं,
सब उसी को बाँटते हैं
लेकिन गोरे लोग इस हवा की परवाह नहीं करते
वैसे ही जैसे षैया पर पड़ा आदमी,
सुन्न हो जाता है दुर्गन्ध के प्रति।

फिर भी अगर हम तुम्हें अपनी जमीन बेचते हैं

तो जरूर याद रखना कि ये हवा हमारे लिए बहुत
कीमती है
यह मत भूलना कि हवा जीवों का पोषण करती है,
और सबके साथ अपनी आत्मा बाँटती है
इसी हवा में हमारे पुरखों ने ली अपनी पहली
और आखिरी साँस
यही हवा देगी हमारे बच्चों को जीवनदान
अगर हम तुम्हें अपनी जमीन बेच देते हैं
तो इसे अलग रखना। पवित्र रखना।
जहां तुम गोरे भी कर सको सुगंधित बयार का अनुभव।
ठीक है, तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार करेंगे

ल्ेकिन एक षर्त है मेरी -
धरती पर बसने वाले पशुओं को
समझोगे तुम अपना बंधु
मैं जंगली हूँ और षायद नहीं जानता कोई और
जीने का तरीका।

मंैने मैदानों पर हजारों भैंसों के सड़े-गले षरीर देखे हैं,
जिन्हें गोरों ने बेवजह चलती गाड़ी से मार दिया था
मैं सभ्य नहीं और नहीं समझ पाता -
कि कैसे धुंआ उड़ाती बेजान लोहे की गाड़ी
;सिएथल ने रेल को ‘स्मोकिंग आयरन होर्स’ कहाद्ध
उस पशु की जिंदगी से ज्यादा जरूरी है।
पशुओं के बिना मुनष्य क्या रह सकता है ?
अगर पशु न रहे,
तो मनुष्य भी
अकेलेपन की पीड़ा से खत्म हो जाएगा
और वैसे भी, जो पशुओं के साथ होगा
वही मनुष्य भोगेगा एक दिन
आखिर,, सभी कुछ तो जुडा है एक दूसरे के साथ।

अपने बच्चों को जरूर सिखाना
कि जिस जमीन पर चलते हैं
वो हमारे पुरखों की राख से बनी है
उस जमीन का आदर करना सीखें
अपने बच्चों को यह भी बताना
कि ये मिट्टी हमारे पुरखों की गाथा से समृद्ध हैं
कि धरती हमारी माँ है -
यह हमने अपने बच्चों को बताया
और तुम भी यही बताना।

इंसान ने नहीं बुना जीवन का ताना-बाना
वो तो सिर्फ उसमें एक तिनका है
उसके साथ वही होगा जो वो करेगा ताने-बाने के साथ।

हम तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार करेंगे
कि उन आरक्षित स्थानों में चले जाएं,
जिसे तुमने हमारे लोगों के लिए अलग रखा है
हम अलग रहेंगे और षांति से रहेगे
इसका महत्व नहीं कि कहां बिताते हैं अपने षेष दिन

हमारे बच्चों ने हमारी पराजय को देखा है,
हमारे योद्धाओं ने लज्जा के कड़वे घूंट पिये हैं।
पराजय ने उन्हें उदासीन बना दिया है
आलस्य को षराब में डुबोते है और खत्म करते हैं वे
अपना षरीर।

अब कुछ फरक नहीं पडता कि कहां बिताते हैं हम बाकी

के दिन
वैसे भी हम गिनती में ज्यादा नहीं
चंद घंटे, कुछ और साल और फिर
उन महान कबीलों की कोई संतान षेष न रहेगी
जो कभी बेधड़क इस धरती पर घूमते थे
और अब छोटी टुकडियों में भटकते हैं
घने जंगलों के बीच -

कौन षोक मनायेगा उनके लिए
जो उतने ही ताकतवर और आषावादी थे
जितने आज तुम हो
पर क्यों करूँ मैं षोक अपने कबीलों के अंत का ?
आखिर कबीला है क्या - लोगों का एक समूह -
लोग आते हैं, चले जाते हैं,
से सागर की लहरें।

ये गोरे लोग भी
बच नहीं सकते उस सांझी नियति से जो सबकी एक है
षायद इसीलिए हमारा रिष्ता बंधुओं का ही है
पर यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

एक बात हम जानते हैं - हम सबका भगवान एक है
गोरे लोग भी षायद एक दिन ये बात जान जायेंगे
क्या तुम सोचते हो कि वो सिर्फ तुम्हारी मिल्कियत है ?
हमारी जमीन की तरह ? जो तुम ले लोगे हमसे एक दिन ?
नहीं, ये मुमकिन नहीं।
क्योंकि वो हम दोनों को एक नजर से देखता है।
उसके लिए यह धरती अमूल्य है
और इस वसुंधरा को हानि पहुचाना
उसके रचयिता का तिरष्कार होगा
एक दिन गोरे लोगो का भी अन्त आयेगा,
षायद और जातियों से भी पहले।

अपने वातावरण को यदि दूषित करोगे
तो देखना, किसी रात
तुम्हारा दम उसी गंदगी में घुट जाएगा
पर अपने विनाष में भी तुम चमकोगे,
उस भगवान के दिए हुए तेज से,
जो तुम्हंे धरती पर लाया,
और किसी विषेष उद्देष्य से
धरती का और आदिवासियों का षासक बनाया।

यह नियति हमारे लिए एक रहस्य बन गई
क्योंकि जब भैसों का वध होता है,
जंगली घोड़ंांे को पालतू बनाया जाता है,
जंगल के हर वनो में घुस जाती है
इंसानी भीड़ की गंध,
और पहाडो़ं का सुंदर दृष्य ढक जाता है
टेलीफोन के तारों से
तब नियति को हम समझा नहीं पाते
कहां गई हरियाली ? कहां गए विषाल पक्षी ?
कहां गए दौड़ते घोडे, वो षिकार का खेल ?

जीने का तो अब अंत आ गया है,
 षुरू हो गई है जिंदा भर रहने की कोषिष।
बेचने के प्रस्ताव पर विचार करेंगे,
तब षायद - अपनी मर्जी से
 तुम्हारी दी गई जमीन पर काट सकें आखिरी दिन।

जब धरती पर से अंतिम आदिवासी भी मिट जाएगा
तब ये समुद्र तट और बीहड़ वन,
मेरे लोगों की आत्मा संजोकर रखेंगे
मेरे लोग इस धरती को उतना ही प्यार करते हैं,
जितना माँ की धड़कन को एक नवजात षिषु।

इसलिए अगर हम तुम्हें जमीन बेचते हैं
वो वैसे ही प्यार करना उसे जैसे हमने किया
वैसे ही संवारना, जैसे हमने संवारा
अपनी पूरी ताकत, दिलो दिमाग से
संभालकर रखना इसे अपने बच्चों के लिए
और प्यार करना उतना ..................
जितना परम पिता हमसे करता है।

एक बात हम जानते हैं - हम सबका भगवान एक है
और ये भूमि ऐसे बहुत प्यारी है
गोरे लोग भी बच नहीं सकते
उस नियति से - जो सबकी एक है।
अंततः षायद हम बंधु हैं। .......... यह समय ही बताएगा।

                                                             (साभार: ‘इतिहास बोध’ - 35)

तो यह है जंगलों के प्रति आदिवासी नजरिया।
बहुत गम्भीर होकर सोचने की जरूरत है कि पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों की हरियाली को नष्ट कर कंकरीट के जंगल उगाने वाले कम से कम आदिवासी तो नहीं रहे। भरत झुंझुनूवाला जी जिस वर्ग का मानसिक प्रतिनिधित्व करते हैं, उसी वर्ग ने प्रकृति की सत्ता के विरोध में अपनी भूमिका निभाकर कंकरीट के जंगल उगाये हैं और यही वजह है कि अब हर जागरूक इन्सान यह सोचने लगा है कि प्रकृति की ओर लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं जिससे मानवजाति, अन्य प्राणी जगत और पेड़-पौधों को बचाकर ‘इकोलोजीकल बेलेंस’ बनाये रखा जा सके।

1 टिप्पणी:

shuk ने कहा…

वाह वाह
आनन्द शुक्ल